बिहार के कृषि पिछड़ेपन के क्या कारण हैं? राज्य में कृषि विकास के लिए 'कृषि रोड मैप' की उपलब्धियों की चर्चा करें।

 Q. बिहार के कृषि पिछड़ेपन के क्या कारण हैं? राज्य में कृषि विकास के लिए 'कृषि रोड मैप' की उपलब्धियों की चर्चा करें।

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भूमिका

बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका केवल एक आर्थिक गतिविधि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने का मूलाधार है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2023-24) के अनुसार, राज्य की लगभग 76% कार्यशील आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर है, जबकि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में इसका योगदान लगभग 20% है।

गंगा के उपजाऊ मैदानी क्षेत्र और प्रचुर जल संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद, बिहार की कृषि राष्ट्रीय औसत की तुलना में पिछड़ी हुई है। राज्य में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता और कृषकों की आय में अपेक्षित वृद्धि न हो पाना एक गंभीर संरचनात्मक चिंता का विषय है। इसी गतिरोध को तोड़ने और कृषि क्षेत्र के सर्वांगीण विकास हेतु बिहार सरकार ने वर्ष 2008 में 'कृषि रोड मैप' (Agriculture Road Map) की अभिनव पहल की शुरुआत की।

बिहार में कृषि पिछड़ेपन के बहुआयामी कारण

बिहार में कृषि का पिछड़ापन किसी एकल कारक का परिणाम नहीं है, बल्कि यह भौगोलिक, संस्थागत, ढांचागत और विपणन संबंधी जटिलताओं का एक समुच्चय है:

1. भौगोलिक एवं पर्यावरणीय आपदाएँ

  • बाढ़ और सूखे का दोहरा अभिशाप: बिहार का भूगोल कृषि के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। उत्तरी बिहार (कोसी, गंडक, बागमती बेसिन) प्रतिवर्ष विनाशकारी बाढ़ की चपेट में रहता है, जिससे खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। वहीं, दक्षिणी बिहार (मगध एवं शाहाबाद क्षेत्र) अनियमित मानसून के कारण सूखे (Drought) से प्रभावित रहता है।

  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: मानसून की अनिश्चितता और असामयिक वर्षा ने कृषि चक्र को बाधित किया है, जिससे जोखिम में वृद्धि हुई है।

2. संरचनात्मक एवं संस्थागत अवरोध

  • भू-जोत का अत्यधिक विखंडन: राज्य में 91% से अधिक किसान सीमांत श्रेणी (1 हेक्टेयर से कम जोत) के अंतर्गत आते हैं। राज्य में कृषि भूमि का औसत जोत आकार मात्र 0.39 हेक्टेयर है, जो राष्ट्रीय औसत (1.08 हेक्टेयर) से बहुत कम है। इस कारण यंत्रीकरण और बड़े पैमाने की खेती (Economies of scale) संभव नहीं हो पाती।

  • अदृश्य काश्तकारी (Unrecorded Sharecropping): बिहार में बड़े पैमाने पर 'बटाईदारी' व्यवस्था व्याप्त है। बटाईदारों के पास भूमि का स्वामित्व या कानूनी दस्तावेज न होने के कारण वे संस्थागत ऋण, फसल बीमा (PMFBY) और सरकारी सब्सिडी के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

3. अवसंरचनात्मक एवं निवेशगत कमियाँ

  • सिंचाई सुविधाओं का अभाव: यद्यपि राज्य में प्रचुर भूजल और सतही जल है, लेकिन वैज्ञानिक जल प्रबंधन और सुनिश्चित सिंचाई अवसंरचना (नहर प्रणाली का जीर्ण-शीर्ण होना) के अभाव में कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर है।

  • पूंजीगत निवेश (Capital Formation) की कमी: कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक तथा निजी निवेश का स्तर अत्यंत निम्न है, जिसके कारण उन्नत बीज, आधुनिक कृषि यंत्र और अनुसंधान का पर्याप्त विस्तार नहीं हो पाया है।

4. विपणन (Marketing) और मूल्य संवर्धन की विफलता

  • APMC एक्ट का निरसन (2006): बिहार में कृषि उपज बाजार समिति अधिनियम को निरस्त कर दिया गया, किंतु इसके स्थान पर पैक्स (PACS) और व्यापार मंडलों का तंत्र पूरी तरह से पारदर्शी और सुदृढ़ नहीं हो सका। इससे किसान अपनी उपज बिचौलियों को औने-पौने दामों पर बेचने को विवश हैं।

  • कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing) का अभाव: राज्य में शीतगृहों (Cold Storages), वेयरहाउसिंग और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की भारी कमी है, जिससे बागवानी और खाद्यान्न फसलों का उचित मूल्य संवर्धन (Value Addition) नहीं हो पाता।

राज्य में कृषि विकास हेतु 'कृषि रोड मैप' की उपलब्धियाँ

कृषि की इन संरचनात्मक चुनौतियों से निपटने हेतु बिहार सरकार ने सभी संबंधित विभागों (कृषि, जल संसाधन, ऊर्जा, सहकारिता आदि) के समन्वय से एक समग्र 'कृषि रोड मैप' की रणनीति अपनाई। अब तक तीन कृषि रोड मैप पूरे हो चुके हैं तथा चतुर्थ कृषि रोड मैप (2023-2028) वर्तमान में क्रियाशील है। इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं:

1. उत्पादन एवं उत्पादकता में ऐतिहासिक वृद्धि

  • कृषि रोड मैप के रणनीतिक हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप बिहार ने खाद्यान्न उत्पादन में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। राज्य को मक्का और गेहूं के उत्कृष्ट उत्पादन हेतु भारत सरकार द्वारा कई बार 'कृषि कर्मण पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है।

  • बीज प्रतिस्थापन दर (SRR): 'मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार योजना' के माध्यम से राज्य में बीज प्रतिस्थापन दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे उत्पादकता बढ़ी है।

2. बागवानी और कृषि विविधीकरण (Agricultural Diversification)

  • पारंपरिक फसलों के स्थान पर उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों को प्रोत्साहन मिला है।

  • बिहार के विशिष्ट उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने में सफलता मिली है। वर्तमान में बिहार के शाही लीची, जर्दालु आम, कतरनी चावल, मगही पान और मिथिला मखाना को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त हो चुका है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिला है।

3. जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate Resilient Agriculture)

  • तृतीय और चतुर्थ कृषि रोड मैप के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान को कृषि से जोड़ा गया है।

  • राज्य के सभी 38 जिलों में 'क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर' कार्यक्रम लागू किया गया है। साथ ही, गंगा नदी के किनारे वाले 13 जिलों में 'जैविक कॉरिडोर' (Organic Corridor) का सफलतापूर्वक निर्माण किया गया है, जो रसायनों पर निर्भरता कम कर रहा है।

4. सिंचाई एवं ऊर्जा अवसंरचना का विस्तार

  • 'हर खेत तक सिंचाई का पानी' निश्चय योजना के माध्यम से असिंचित क्षेत्रों को लक्षित किया गया है।

  • ग्रामीण फीडर का पृथक्करण कर कृषि कार्य हेतु रियायती दर पर निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई गई है, जिससे डीजल पम्पों पर निर्भरता कम हुई है और उत्पादन लागत में भारी गिरावट आई है।

5. वानिकी एवं पर्यावरण संरक्षण

  • प्रथम कृषि रोड मैप (2008) के समय राज्य का हरित आवरण मात्र 9% था, जो सघन पौधारोपण अभियानों और कृषि वानिकी (Agro-forestry) के कारण बढ़कर अब 15% के लक्ष्य को पार कर चुका है।

आगे की राह (Way Forward)

यद्यपि कृषि रोड मैप ने बिहार की कृषि में एक नव-जागरण का संचार किया है, फिर भी राज्य को 'सब्सिस्टेंस फार्मिंग' (निर्वाह कृषि) से 'कमर्शियल फार्मिंग' (वाणिज्यिक कृषि) की ओर ले जाने के लिए कुछ सुधार अनिवार्य हैं:

  1. बटाईदारी सुधार: नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित 'आदर्श भूमि पट्टा अधिनियम' (Model Tenancy Act) को बिहार की परिस्थितियों के अनुकूल लागू कर बटाईदारों को कानूनी मान्यता और संस्थागत साख उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

  2. बाजार बुद्धिमत्ता (Market Intelligence): e-NAM के साथ राज्य के बाजारों के एकीकरण को सुदृढ़ करने के साथ-साथ ब्लॉक स्तर पर कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) का एक मजबूत नेटवर्क विकसित किया जाए।

  3. कृषि-औद्योगीकरण: मखाना, मक्का और लीची आधारित 'मेगा फूड पार्कों' की स्थापना कर रोजगार सृजन और कृषि उपज के स्थानीय मूल्य संवर्धन पर निवेश बढ़ाया जाए।

  4. डिजिटल कृषि: चतुर्थ कृषि रोड मैप के लक्ष्यों के अनुरूप ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन फार्मिंग को लघु कृषकों तक पहुँचाने हेतु 'एग्री-स्टार्टअप्स' को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष

बिहार में कृषि का पिछड़ापन नियति नहीं, बल्कि नीतिगत और संरचनात्मक अड़चनों का प्रतिफल रहा है। इस दिशा में 'कृषि रोड मैप' एक विजनरी और समेकित प्रशासनिक नीति साबित हुई है, जिसने न केवल उत्पादन के मोर्चे पर बिहार को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन (हरित आवरण) को भी पुष्ट किया है। यदि भविष्य में काश्तकारी सुधारों, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के आधुनिकीकरण और कृषि-प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित किया जाए, तो बिहार निश्चित रूप से पूर्वी भारत में 'द्वितीय हरित क्रांति' का नेतृत्वकर्ता बनकर उभरेगा, जो राज्य के समग्र आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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