बिहार में उद्योगों के पिछड़ेपन के कारणों की विवेचना करें। राज्य में कृषि आधारित उद्योगों (Agro-based industries) की क्या संभावनाएं हैं?

 Q. बिहार में उद्योगों के पिछड़ेपन के कारणों की विवेचना करें। राज्य में कृषि आधारित उद्योगों (Agro-based industries) की क्या संभावनाएं हैं?

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भूमिका

किसी भी अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक परिवर्तन (Structural Transformation) में औद्योगिकीकरण एक प्रेरक शक्ति की भूमिका निभाता है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2023-24) के अनुसार, राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में द्वितीयक (औद्योगिक) क्षेत्र का योगदान मात्र लगभग 19-20% है, जो राष्ट्रीय औसत (~30%) की तुलना में काफी कम है।

ऐतिहासिक रूप से समृद्ध और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद, बिहार तीव्र औद्योगिकीकरण की दौड़ में पीछे छूट गया। वर्ष 2000 में राज्य के विभाजन के बाद अधिकांश खनिज संपदा और भारी उद्योग झारखंड के हिस्से में चले गए। इस परिप्रेक्ष्य में, उपजाऊ गंगा के मैदान और समृद्ध जैव-संसाधनों से परिपूर्ण बिहार के पास अपने आर्थिक पुनरुद्धार के लिए कृषि आधारित उद्योग (Agro-based Industries) एक स्वाभाविक और अत्यधिक संभावनाशील विकल्प प्रस्तुत करते हैं।

बिहार में उद्योगों के पिछड़ेपन के बहुआयामी कारण

बिहार में औद्योगिक विकास की गति धीमी रहने के पीछे ऐतिहासिक, संरचनात्मक, ढांचागत और वित्तीय कारणों का एक जटिल संजाल रहा है:


1. ऐतिहासिक एवं नीतिगत कारण (Historical and Policy Distortions)

  • माल भाड़ा समानीकरण नीति (Freight Equalization Policy, 1952-1993): इस नीति ने बिहार के खनिज संसाधनों को देश के अन्य तटीय राज्यों के लिए समान परिवहन मूल्य पर सुलभ बना दिया। फलस्वरूप, राज्य अपने ही प्राकृतिक संसाधनों के निकट उद्योग स्थापित करने के प्रतिस्पर्धात्मक लाभ (Comparative Advantage) से वंचित रह गया।

  • वर्ष 2000 का राज्य पुनर्गठन: अविभाजित बिहार का अधिकांश खनिज भंडार (कोयला, लोहा, बॉक्साइट, अभ्रक) और भारी इंजीनियरिंग उद्योग (जैसे- HEC, TISCO, बोकारो स्टील) झारखंड में चले गए, जिससे बिहार मुख्यतः एक 'खनिज-विहीन कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था' बनकर रह गया।

2. भौतिक एवं लॉजिस्टिक अवसंरचना का अभाव

  • भूमि अधिग्रहण की जटिलता: उच्च जनसंख्या घनत्व (1,106 व्यक्ति/वर्ग किमी) और अति-विखंडित जोत संरचना के कारण औद्योगिक गलियारों या विनिर्माण संयंत्रों के लिए बड़े और निर्विवाद भूखंडों का अभाव रहा है।

  • तटीय संपर्कता (Port Proximity) का अभाव: लैंडलॉक्ड (Landlocked) राज्य होने के कारण निर्यात-उन्मुख विनिर्माण इकाइयों को बंदरगाहों तक पहुँचने में उच्च लॉजिस्टिक लागत उठानी पड़ती है।

3. वित्तीय बाधाएँ एवं कम संस्थागत साख

  • निम्न ऋण-जमा अनुपात (Credit-Deposit Ratio): बिहार का सीडी रेशियो मात्र लगभग 53-55% के आसपास है, जो राष्ट्रीय औसत (~75-80%) से काफी कम है। इसका तात्पर्य यह है कि राज्य के बैंकों में जमा जनता की पूँजी का बड़ा हिस्सा राज्य के भीतर औद्योगिक निवेश में परिवर्तित नहीं हो पाता।

  • निजी पूंजी निवेश की कमी: ऐतिहासिक रूप से कानून-व्यवस्था की चुनौतियाँ और सुदृढ़ 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' तंत्र के विलंब से लागू होने के कारण बड़े कॉर्पोरेट घरानों का निवेश सीमित रहा।

4. भौगोलिक एवं प्राकृतिक चुनौतियाँ

  • उत्तरी बिहार में प्रतिवर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ औद्योगिक संपत्तियों और सड़क-रेल कनेक्टिविटी को क्षति पहुँचाती है, जिससे उद्योगपतियों के लिए जोखिम लागत (Risk Premium) बढ़ जाती है।

बिहार में कृषि आधारित उद्योगों (Agro-based Industries) की संभावनाएँ

बिहार की कृषि विविधता, अनुकूल जलवायु और विशाल कार्यशील जनसंख्या इसे देश के प्रमुख 'एग्रो-प्रोसेसिंग हब' के रूप में विकसित करने के लिए आदर्श आधार प्रदान करती है:


1. मक्का आधारित उद्योग (Maize Processing & Feed Mills)

  • बिहार का कोसी-सीमांचल क्षेत्र (खगड़िया, कटिहार, पूर्णिया, सहरसा) देश का 'मक्का का कटोरा' कहलाता है।

  • मक्के की उच्च उत्पादकता के कारण यहाँ स्टार्च निर्माण, कॉर्न ऑयल, पशु एवं पोल्ट्री फीड तथा औद्योगिक अल्कोहल उत्पादन की असीम संभावनाएँ हैं।

2. मखाना प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन (Makhana Sector)

  • भारत और विश्व के कुल मखाना उत्पादन का 85-90% हिस्सा बिहार के मिथिला क्षेत्र (दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, पूर्णिया) से आता है।

  • मिथिला मखाना (GI Tag) को वैश्विक सुपरफूड के रूप में पहचान मिली है। इसके रोस्टिंग, ग्रेडिंग, फ्लेवरिंग और पैकेजिंग उद्योग ग्रामीण युवाओं के लिए उच्च रोजगार अवसर सृजित कर सकते हैं।

3. बागवानी एवं फल प्रसंस्करण उद्योग (Horticulture & Fruits)

  • शाही लीची (मुजफ्फरपुर, वैशाली - GI Tag): लीची पल्प, जैम, जूस और डिब्बाबंदी उद्योग।

  • जर्दालु आम (भागलपुर - GI Tag) एवं केला (हाजीपुर, नवगछिया): फ्रूट पल्पिंग और रेडी-टू-ड्रिंक पेय उद्योग।

  • सब्जी प्रसंस्करण: आलू, टमाटर और प्याज के लिए डिहाइड्रेशन प्लांट्स और कोल्ड चेन अवसंरचना की प्रचुर संभावना।

4. एथेनॉल एवं जैव-ऊर्जा क्षेत्र (Ethanol & Bio-Energy)

  • बिहार एथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति (2021) लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना।

  • गन्ने के शीरे (Molasses) और अधिशेष मक्के/चावल से एथेनॉल उत्पादन हेतु राज्य में कई निजी संयंत्र (जैसे पूर्णिया, गोपालगंज, आरा) क्रियाशील हो चुके हैं, जिससे किसानों को निश्चित बाजार मिल रहा है।

5. जूट एवं प्राकृतिक रेशा उद्योग (Jute & Natural Fibers)

  • पूर्णिया और कटिहार में प्रचुर जूट उत्पादन के आधार पर इको-फ्रेंडली पैकेजिंग बैग, जियो-टेक्सटाइल्स और हस्तशिल्प इकाइयों का विस्तार किया जा सकता है।

6. डेयरी एवं पशुधन मूल्य श्रृंखला

  • बिहार राज्य दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (COMFED - सुधा ब्रांड) के सफल मॉडल के आधार पर चीज, मक्खन, स्किम्ड मिल्क पाउडर और पैकेज्ड मीट/मत्स्य प्रसंस्करण का और अधिक औद्योगिकीकरण संभव है।

सरकार द्वारा उठाए गए नीतिगत कदम

  1. बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति (BIIPP, 2016 एवं संशोधित 2022): इसमें खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र (High Priority Sector) में रखा गया है, जिसके तहत पूंजीगत सब्सिडी, ब्याज अनुदान और स्टांप शुल्क में शत-प्रतिशत छूट दी जाती है।

  2. बिहार एथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति (2021): जैव-ईंधन क्षेत्र में रिकॉर्ड निजी पूंजी निवेश को आकर्षित करने में सफल।

  3. प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PM-FME): 'एक जिला, एक उत्पाद' (ODOP) के तहत स्थानीय कृषि उत्पादों के क्लस्टर आधारित प्रसंस्करण को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता।

  4. प्लग एंड प्ले (Plug and Play) शेड: राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों (BIADA) में उद्योगों को तुरंत संचालन शुरू करने हेतु तैयार शेड और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

आगे की राह (Way Forward)

  • मेगा फूड पार्कों और कोल्ड-चेन नेटवर्क का विस्तार: कृषि उत्पादों के कटाई उपरांत होने वाले नुकसान (Post-Harvest Losses ~20-25%) को रोकने हेतु खेत से लेकर फैक्ट्री तक 'कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स' और प्राइमरी प्रोसेसिंग सेंटरों का निर्माण।

  • कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) का उद्योगों से सीधा जुड़ाव: छोटे किसानों के समूहों को सीधे प्रोसेसिंग इकाइयों और रिटेल चेन के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से जोड़ना।

  • कौशल विकास एवं कृषि-उद्यमिता: राज्य के ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों में फूड पैकेजिंग, गुणवत्ता परीक्षण और एग्री-लॉजिस्टिक्स से संबंधित विशिष्ट पाठ्यक्रमों का संचालन।

  • ब्रांडिंग एवं निर्यात प्रोत्साहन: बिहार के GI टैग प्राप्त उत्पादों (शाही लीची, कतरनी चावल, मखाना) के लिए राज्य समर्थित वैश्विक मार्केटिंग और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणन प्रयोगशालाओं की स्थापना।

निष्कर्ष

खनिज संपदा के अभाव के बावजूद, बिहार की वास्तविक आर्थिक शक्ति उसकी उपजाऊ भूमि, विविध कृषि-जलवायु और परिश्रमी श्रमशक्ति में निहित है। भारी विनिर्माण के स्थान पर कृषि-प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन आधारित औद्योगिकीकरण बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने का सबसे व्यावहारिक मॉडल है।

यदि राज्य सरकार की प्रगतिशील औद्योगिक नीतियां, 'चतुर्थ कृषि रोड मैप' (2023-2028) के विजन और निजी निवेश के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित किया जाए, तो बिहार न केवल 'कच्चे माल के निर्यातक' से 'प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के वैश्विक केंद्र' के रूप में रूपांतरित होगा, बल्कि राज्य में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और किसानों की आय में गुणात्मक वृद्धि भी सुनिश्चित होगी।

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