'वसुधैव कुटुम्बकम': भारतीय विदेश नीति का मूल आधार।

 Q.  'वसुधैव कुटुम्बकम': भारतीय विदेश नीति का मूल आधार।

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'वसुधैव कुटुम्बकम': भारतीय विदेश नीति का मूल आधार

भूमिका

महोपनिषद का श्लोक, "अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥", केवल एक दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि यह भारत के नागरिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण का मूलाधार है। समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, जहाँ राष्ट्र प्रायः 'शून्य-योग खेल' (Zero-Sum Game) और यथार्थवादी (Realist) नीतियों पर कार्य करते हैं, वहीं भारत ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' (विश्व एक परिवार है) के माध्यम से एक मानवीय और समावेशी कूटनीति का प्रतिमान स्थापित किया है। हाल ही में संपन्न G20 शिखर सम्मेलन की थीम 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' (One Earth, One Family, One Future) ने वैश्विक पटल पर इस प्राचीन भारतीय मूल्य को आधुनिक विदेश नीति के एक सशक्त उपकरण (Strategic Tool) के रूप में पुनर्स्थापित किया है।

ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि

भारतीय विदेश नीति के मूल तत्व रातों-रात विकसित नहीं हुए हैं, बल्कि इनका एक गहरा ऐतिहासिक अनुक्रम है। स्वतंत्रता के पश्चात्, अनुच्छेद 51 (अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि) के तहत संवैधानिक दिशा-निर्देशों से लेकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) और पंचशील सिद्धांत (1954) तक, भारतीय कूटनीति ने सदैव सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान को प्राथमिकता दी है।

बिहार का ऐतिहासिक संदर्भ: भारत की इस कूटनीतिक और शांतिवादी विरासत के तार सीधे तौर पर बिहार की ऐतिहासिक भूमि से जुड़े हैं। प्राचीन काल में पटना (पाटलिपुत्र) से संचालित मौर्य साम्राज्य की कूटनीति और कलिंग युद्ध के पश्चात् सम्राट अशोक का 'भेरीघोष' के स्थान पर 'धम्मघोष' (धम्म विजय) का सिद्धांत 'वसुधैव कुटुम्बकम' का ही प्रारंभिक व्यावहारिक प्रयोग था। इसके अतिरिक्त, नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों के माध्यम से पटना और बिहार के सभी ज़िलों की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक गूंज पूरे पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैली। इसी ऐतिहासिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान (Cultural Exchange) ने आज भारत की वैश्विक 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) की ठोस नींव रखी है।

विदेश नीति में 'वसुधैव कुटुम्बकम' का व्यावहारिक अनुप्रयोग (Why and How)

आधुनिक भारतीय कूटनीति में इस सिद्धांत को केवल आदर्शवाद तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसे यथार्थवादी वैश्विक चुनौतियों के समाधान में सक्रिय रूप से लागू किया जा रहा है:

  • वैश्विक स्वास्थ्य और मानवीय सहायता (HADR):

    • कैसे: कोविड-19 महामारी के दौरान, भारत ने 'वैक्सीन मैत्री' (Vaccine Maitri) पहल के तहत 100 से अधिक देशों को टीके उपलब्ध कराए।

    • क्यों: यह इस बात का प्रमाण है कि भारत संकट के समय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर एकाधिकार स्थापित करने के बजाय उसे साझा करने में विश्वास रखता है। तुर्की-सीरिया भूकंप में 'ऑपरेशन दोस्त' इसी पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वहन है।

  • ग्लोबल साउथ की आवाज़ (Voice of Global South):

    • कैसे: भारत ने विकासशील देशों के मुद्दों (ऋण संकट, खाद्य सुरक्षा) को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रखरता से उठाया है। G20 में अफ्रीकी संघ (African Union) को स्थायी सदस्यता दिलाना इसका सबसे बड़ा कूटनीतिक साक्ष्य है।

    • क्यों: विकास के लाभों का समान वितरण सुनिश्चित करने और नव-उपनिवेशवाद (Neo-colonialism) का मुकाबला करने के लिए।

  • पर्यावरणीय कूटनीति और वैश्विक संपदा (Global Commons):

    • कैसे: भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI) की स्थापना का नेतृत्व किया है। 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE) पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने का वैश्विक आह्वान है।

    • क्यों: जलवायु परिवर्तन जैसी सीमा-विहीन (Borderless) चुनौतियों का समाधान केवल एक एकजुट वैश्विक परिवार ही कर सकता है।

आदर्शवाद और यथार्थवाद (Realpolitik) के मध्य संतुलन की चुनौतियाँ

'वसुधैव कुटुम्बकम' का अर्थ राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उदासीनता या कमज़ोरी नहीं है। भारतीय नीति-निर्माताओं के समक्ष मुख्य चुनौती इस आदर्शवाद को कठोर भू-राजनीतिक यथार्थ (Geopolitical Realities) के साथ संतुलित करने की है:

  • रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): भारत विश्व को एक परिवार मानता है, इसलिए वह किसी भी सैन्य गुटबाजी (Military Alliances) का हिस्सा बनने से बचता है। पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से ऊर्जा आयात जारी रखना इस स्वायत्तता का परिचायक है।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि: सीमा पार आतंकवाद और विस्तारवादी नीतियों (जैसे- चीन के साथ सीमा विवाद) के विरुद्ध भारत की 'ज़ीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति यह स्पष्ट करती है कि परिवारवाद का सिद्धांत राष्ट्रीय संप्रभुता (Sovereignty) की कीमत पर लागू नहीं हो सकता।

आगे की राह एवं समग्र मूल्यांकन

वर्तमान बहुध्रुवीय (Multipolar) और संघर्षरत विश्व (रूस-यूक्रेन एवं मध्य-पूर्व संकट) में 'वसुधैव कुटुम्बकम' की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। भारत को 2047 के 'अमृत काल' तक एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ-साथ एक नैतिक महाशक्ति के रूप में भी अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी होगी।

भारत की विदेश नीति अब केवल राष्ट्रीय हितों की रक्षा (National Interest) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'विश्व मित्र' (Vishwa Mitra) के रूप में एक सुरक्षित, न्यायपूर्ण और समावेशी विश्व व्यवस्था (World Order) के निर्माण की दिशा में अग्रसर है। यह दर्शन ही वह शक्ति है जो भारत को एक उभरती हुई शक्ति (Emerging Power) से एक ज़िम्मेदार वैश्विक शक्ति (Responsible Global Power) में रूपांतरित करता है।

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