शिक्षा का बाजारीकरण और इसके सामाजिक प्रभाव।

 Q. शिक्षा का बाजारीकरण और इसके सामाजिक प्रभाव।

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शिक्षा का बाजारीकरण और इसके सामाजिक प्रभाव: एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

भूमिका

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, "शिक्षा मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।" एक कल्याणकारी राज्य में शिक्षा को एक मौलिक सार्वजनिक वस्तु (Public Good) और सामाजिक समता का सबसे सशक्त उपकरण माना गया है। परंतु, 1991 के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) सुधारों के पश्चात, भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक ढांचागत परिवर्तन आया है। 'शिक्षा का बाजारीकरण' वह प्रक्रिया है जिसमें शिक्षा का स्वरूप एक सेवा या लोक-कल्याणकारी साधन से बदलकर एक व्यावसायिक उत्पाद (Commodity) और लाभ कमाने के साधन में तब्दील हो जाता है। वर्तमान में कुकुरमुत्ते की तरह उगते निजी विद्यालय, कोचिंग संस्थान और अरबों डॉलर का एड-टेक (EdTech) उद्योग इसी बाजारीकरण के ज्वलंत प्रमाण हैं।

शिक्षा के बाजारीकरण के प्रमुख कारण

इस प्रवृत्ति के उद्भव के पीछे कई आर्थिक और संस्थागत कारक उत्तरदायी हैं:

  • मांग और आपूर्ति में अंतराल: बढ़ती जनसंख्या और युवाओं की आकांक्षाओं के अनुपात में गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षण संस्थानों की भारी कमी।

  • वैश्वीकरण और रोजगार की प्रकृति: बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के आगमन से बाज़ार-उन्मुख (Market-oriented) कौशल और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की मांग में वृद्धि हुई, जिसे भुनाने के लिए निजी क्षेत्र आगे आया।

  • सार्वजनिक निवेश की कमी: कोठारी आयोग (1964-66) ने शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने की अनुशंसा की थी, जो लक्ष्य आज तक पूर्णतः प्राप्त नहीं किया जा सका है।

बाजारीकरण के बहुआयामी सामाजिक प्रभाव

शिक्षा के व्यावसायीकरण ने समाज के ताने-बाने पर गहरे और अक्सर चिंताजनक प्रभाव डाले हैं:

1. सामाजिक और आर्थिक असमानता में वृद्धि (Social Stratification)

  • शिक्षा अब 'योग्यता' के बजाय 'क्रय शक्ति' (Purchasing Power) पर निर्भर हो गई है। महंगी फीस के कारण उच्च और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल साधन-संपन्न वर्ग तक सीमित रह गई है, जिससे समाज में 'हैव्स' (Haves) और 'हैव्स-नॉट' (Have-nots) के बीच की खाई चौड़ी हो रही है।

  • यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 (संसाधनों का समान वितरण) और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के सीधे विरोधाभास में है।

2. मनोवैज्ञानिक दबाव और तनाव

  • शिक्षा को सफलता (पैकेज/नौकरी) का एकमात्र पैमाना मान लेने से छात्रों पर अकल्पनीय दबाव बढ़ा है। 'कोचिंग संस्कृति' ने एक अंधी दौड़ को जन्म दिया है, जिसके परिणामस्वरूप छात्रों में अवसाद और आत्महत्या की दर में वृद्धि हुई है (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो - NCRB के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं)।

3. मानवीय और नैतिक मूल्यों का पतन

  • प्राचीन भारतीय 'गुरु-शिष्य परंपरा' अब 'सेवा प्रदाता और उपभोक्ता' (Service Provider and Consumer) के संबंधों में बदल गई है। शिक्षण संस्थान अब छात्रों के चरित्र निर्माण के बजाय 'प्रतिफल' (Return on Investment - ROI) और 'प्लेसमेंट' पर केंद्रित हैं।

4. विधिक और संवैधानिक दृष्टिकोण का उल्लंघन

  • सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य (1992) और उन्नी कृष्णन वाद (1993) में स्पष्ट किया था कि शिक्षा का अधिकार जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है, और 'कैपिटेशन फीस' (Capitation Fee) वसूलना असंवैधानिक है। इसके बावजूद, प्रच्छन्न रूप से डोनेशन और भारी फीस का चलन जारी है।

बिहार के विशेष संदर्भ में शिक्षा का बाजारीकरण

बिहार एक युवा आबादी वाला राज्य है, जहाँ शिक्षा ही सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता (Socio-economic mobility) का प्राथमिक साधन है। यहाँ बाजारीकरण के प्रभाव अत्यंत स्पष्ट हैं:

  • कोचिंग हब और पलायन: संसाधनों के केंद्रीकरण के कारण पटना और बिहार के सभी ज़िलों से छात्रों का एक बड़ा वर्ग प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़े शहरों या राजधानी की ओर पलायन करता है।

  • कृषक परिवारों पर आर्थिक बोझ: राज्य की अधिकांश अर्थव्यवस्था कृषि-आधारित है। जब ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा या कोचिंग के लिए महानगरों का रुख करते हैं, तो उनके परिवारों को भारी ऋण लेना पड़ता है या अपनी कृषि भूमि तक बेचनी पड़ती है।

  • विकेंद्रीकृत शिक्षा की आवश्यकता: इस असमानता को दूर करने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर केवल एक शहर तक सीमित न रहकर, पटना और बिहार के सभी ज़िलों में समान रूप से विकसित और सुदृढ़ किए जाएं, ताकि ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच का यह विभेद समाप्त हो सके।

आगे की राह (Way Forward) एवं समग्र मूल्यांकन

शिक्षा का बाजारीकरण पूर्णतः नकारात्मक नहीं है; इसने बुनियादी ढांचे के विकास और वैश्विक मानकों को अपनाने में भी मदद की है। आवश्यकता इस बात की है कि निजी क्षेत्र की ऊर्जा का उपयोग मुनाफे के बजाय लोकोपकार (Philanthropy) के लिए किया जाए।

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रावधानों के अनुरूप, शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगाने के लिए एक सशक्त विनियामक ढांचा (जैसे भारतीय उच्च शिक्षा आयोग - HECI) स्थापित किया जाना चाहिए जो फीस का निर्धारण (Fee Capping) कर सके।

  • सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों (जैसे- बिहार में विश्वविद्यालयों के सत्र नियमितीकरण और बुनियादी ढांचे) में भारी सार्वजनिक निवेश किया जाना चाहिए।

अंततः, शिक्षा कोई ऐसा बाज़ारू उत्पाद नहीं है जिसे मुनाफे के तराजू पर तौला जाए। यह राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला है। राज्य का यह सर्वोच्च प्रशासनिक और संवैधानिक दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि कोई भी प्रतिभा केवल इसलिए पीछे न छूट जाए क्योंकि उसके पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा खरीदने के लिए संसाधन नहीं थे।

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