लोकतंत्र में सोशल मीडिया की भूमिकाः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम फेक न्यूज़।

 Q. लोकतंत्र में सोशल मीडिया की भूमिकाः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम फेक न्यूज़।

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लोकतंत्र में सोशल मीडिया की भूमिका: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम फेक न्यूज़

भूमिका

लोकतंत्र मूलतः संवाद, असहमति और सूचना के मुक्त प्रवाह पर आधारित एक जीवंत व्यवस्था है। वर्तमान डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने एक नए 'ग्लोबल पब्लिक स्फीयर' (Global Public Sphere) का निर्माण किया है, जिसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। परंतु, इसके समानांतर 'फेक न्यूज़' (Fake News), भ्रामक सूचनाओं (Misinformation) और दुष्प्रचार (Disinformation) के प्रसार ने एक गंभीर 'इन्फोडेमिक' (Infodemic) को जन्म दिया है। हाल ही में विश्व आर्थिक मंच (WEF) की 'वैश्विक जोखिम रिपोर्ट' ने दुष्प्रचार को आगामी वर्षों के सबसे बड़े वैश्विक खतरों में से एक माना है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की शुचिता के लिए एक सीधी चुनौती है।

लोकतंत्र में सोशल मीडिया की सकारात्मक भूमिका: अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण

सोशल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया के एकाधिकार को समाप्त कर आम नागरिक को सशक्त किया है:

  • हाशिए के वर्गों का सशक्तिकरण: सोशल मीडिया ने उन वर्गों को आवाज़ दी है जो मुख्यधारा की मीडिया से बाहर थे। अब एक आम नागरिक भी सीधे नीति-निर्माताओं से सवाल कर सकता है।

  • प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन: सरकारी विभागों द्वारा ट्विटर (X) और फेसबुक का उपयोग शिकायत निवारण तंत्र के रूप में किया जा रहा है। यह प्रशासन को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाता है।

  • नागरिक पत्रकारिता (Citizen Journalism): किसी भी घटना की त्वरित रिपोर्टिंग और सामाजिक मुद्दों (जैसे- भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन) पर जनमत तैयार करने में सोशल मीडिया एक उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।

फेक न्यूज़ का बढ़ता संकट और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर कुप्रभाव

अभिव्यक्ति की इसी स्वतंत्रता की आड़ में फेक न्यूज़ ने लोकतंत्र के मूल ढांचे पर कई प्रहार किए हैं:

  • चुनावी शुचिता को खतरा: मतदाताओं के ध्रुवीकरण और उनके व्यवहार को प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ और 'डीपफेक' (Deepfake) का उपयोग किया जा रहा है। यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों (Free and Fair Elections) के संवैधानिक आदर्श को बाधित करता है।

  • सामाजिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा: फेक न्यूज़ के कारण मॉब लिंचिंग (Mob Lynching), सांप्रदायिक दंगे और नफरत फैलाने वाले भाषणों (Hate Speech) में वृद्धि हुई है, जो कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।

  • इको-चैम्बर (Echo Chambers) का निर्माण: सोशल मीडिया के एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं को केवल वही जानकारी दिखाते हैं जो उनकी पूर्व-मान्यताओं की पुष्टि करती है। इससे समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ता है और तार्किक संवाद समाप्त हो जाता है।

विधिक एवं संवैधानिक दृष्टिकोण

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। फेक न्यूज़ और असहमति के बीच की सीमा रेखा को संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत समझना आवश्यक है:

  • युक्तियुक्त निर्बंधन (Reasonable Restrictions): संविधान का अनुच्छेद 19(2) राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और शालीनता के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है। फेक न्यूज़ जो सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ती है, वह इस संरक्षण के दायरे में नहीं आती।

  • सर्वोच्च न्यायालय का रुख: श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की, लेकिन साथ ही प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही पर भी बल दिया।

  • आईटी नियम, 2021: सरकार द्वारा लागू 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' सोशल मीडिया कंपनियों (Intermediaries) की जवाबदेही तय करते हैं, जिसमें शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति और आपत्तिजनक सामग्री को त्वरित रूप से हटाना शामिल है।

बिहार के विशेष संदर्भ में सोशल मीडिया की भूमिका और चुनौतियाँ

डिजिटल इंडिया के विस्तार के साथ पटना और बिहार के सभी ज़िलों में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुँच में क्रांतिकारी वृद्धि हुई है। इसके प्रशासनिक और सामाजिक निहितार्थ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

  • प्रशासनिक संवाद का माध्यम: पटना से लेकर राज्य के सभी ज़िलों में पुलिस और जिला प्रशासन सोशल मीडिया का उपयोग अफवाहों के खंडन, यातायात अपडेट और आपदा प्रबंधन (जैसे बाढ़ के दौरान सूचना प्रसार) के लिए सक्रिय रूप से कर रहे हैं।

  • फेक न्यूज़ और कानून-व्यवस्था: डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण बिहार के विभिन्न ज़िलों में 'बच्चा चोरी' की अफवाहों या प्रतियोगी परीक्षाओं (BPSC/सिपाही भर्ती) के प्रश्न-पत्र लीक होने की भ्रामक खबरों का तेज़ी से प्रसार होता है। इससे कई बार हिंसक प्रदर्शन होते हैं और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, जिससे प्रशासन के समक्ष गंभीर संकट उत्पन्न होता है।

आगे की राह एवं समग्र मूल्यांकन (Way Forward)

लोकतंत्र में सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए फेक न्यूज़ से निपटने के लिए एक संतुलित और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  1. संस्थागत फैक्ट-चेकिंग (Fact-Checking): सरकार के 'PIB फैक्ट चेक' की तर्ज पर राज्य स्तर पर भी त्वरित खंडन तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।

  2. डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy): राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप स्कूली पाठ्यक्रम में डिजिटल नागरिकता और मीडिया साक्षरता को शामिल किया जाए, ताकि नागरिक स्वयं सूचनाओं की सत्यता परख सकें।

  3. एल्गोरिथम पारदर्शिता: टेक कंपनियों (Big Tech) को अपने एल्गोरिदम को अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए और फेक न्यूज़ को हतोत्साहित करने वाले तकनीकी उपाय (जैसे- लेबलिंग) लागू करने चाहिए।

लोकतंत्र का अस्तित्व सत्य और विश्वास पर टिका है। सोशल मीडिया को एक रचनात्मक लोकतांत्रिक उपकरण बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि कानूनी ढांचे, तकनीकी नवाचार और नागरिक ज़िम्मेदारी का त्रिवेणी संगम स्थापित किया जाए, ताकि यह मंच विमर्श का केंद्र बने, न कि भ्रामक सूचनाओं का हथियार।

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