शॉर्ट नोट्सः ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA)।
Q. शॉर्ट नोट्सः ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA)।
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शॉर्ट नोट्स: ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA)
भूमिका
नई दिल्ली में आयोजित G-20 शिखर सम्मेलन (2023) के दौरान भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राजील के संयुक्त नेतृत्व में ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA) का शुभारंभ वैश्विक ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) की दिशा में एक युगांतरकारी कूटनीतिक कदम है। वर्तमान में ये तीनों संस्थापक राष्ट्र वैश्विक एथेनॉल उत्पादन के लगभग 85% और खपत के 81% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह गठबंधन 'अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन' (ISA) के बाद ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन शमन के क्षेत्र में भारत के नेतृत्व वाली दूसरी सबसे बड़ी बहुपक्षीय पहल है, जो वर्ष 2070 तक भारत के 'शुद्ध शून्य उत्सर्जन' (Net Zero Emissions) लक्ष्य के साथ पूर्णतः संरेखित है।
ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA) के प्रमुख उद्देश्य एवं रणनीतिक महत्व
यह गठबंधन केवल एक पर्यावरणीय पहल नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी भू-आर्थिक रणनीति है, जिसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण: GBA सदस्य देशों के मध्य उन्नत जैव-ईंधन (जैसे 2G और 3G एथेनॉल) के उत्पादन के लिए तकनीकी साझीदारी और सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) के आदान-प्रदान को सुगम बनाएगा।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का मानकीकरण: वर्तमान में जैव-ईंधन के प्रमाणीकरण और व्यापार के लिए कोई एकसमान वैश्विक मानक नहीं है। GBA एक सार्वभौमिक 'मानक-निर्धारण' (Standard-setting) निकाय के रूप में कार्य करेगा, जिससे सुचारु अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सुनिश्चित होगा।
ऊर्जा सुरक्षा और आयात बिल में कटौती: राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति, 2018 (2022 में संशोधित) के तहत भारत ने वर्ष 2025-26 तक पेट्रोल में 20% एथेनॉल सम्मिश्रण (E20) का लक्ष्य रखा है। GBA के माध्यम से इस लक्ष्य की प्राप्ति से कच्चे तेल के आयात बिल में भारी विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को प्रोत्साहन: कृषि अपशिष्ट (पराली), नगरपालिका ठोस अपशिष्ट और उपयोग किए गए खाना पकाने के तेल (UCO) को जैव-ईंधन में परिवर्तित कर यह गठबंधन अपशिष्ट प्रबंधन और धन-सृजन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करता है।
बिहार के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक एवं कृषि-औद्योगिक निहितार्थ
कृषि प्रधान राज्य होने के कारण, GBA द्वारा सृजित वैश्विक मांग और तकनीकी नवाचार का सर्वाधिक संरचनात्मक लाभ बिहार को प्राप्त होने की संभावना है:
एथेनॉल उत्पादन का हब: बिहार देश का पहला राज्य है जिसने अपनी 'एथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति, 2021' लागू की है। GBA की तकनीकी सहायता से पटना और बिहार के सभी जिलों में मक्का, गन्ना और टूटे चावल पर आधारित नए एथेनॉल संयंत्रों की स्थापना को तकनीकी और वित्तीय गति प्राप्त होगी।
कृषि-अपशिष्ट का मुद्रीकरण: राज्य में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कृषि अवशेषों को ऊर्जा में परिवर्तित करने से किसानों को उनकी फसल के लिए अतिरिक्त मूल्य प्राप्त होगा, जो ग्रामीण औद्योगीकरण और रोजगार सृजन का एक प्रमुख आधार बनेगा।
विद्यमान चुनौतियां
'खाद्य बनाम ईंधन' (Food vs Fuel) विवाद: पहली पीढ़ी (1G) के जैव-ईंधन मुख्य रूप से खाद्य फसलों (गन्ना, मक्का) से बनते हैं। यदि कृषि भूमि का उपयोग खाद्य उत्पादन के बजाय ईंधन के लिए अधिक किया गया, तो भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में खाद्य सुरक्षा और मुद्रास्फीति का संकट उत्पन्न हो सकता है।
तकनीकी एवं अवसंरचनात्मक बाधाएं: दूसरी और तीसरी पीढ़ी (2G/3G - लिग्नोसेल्युलोसिक और शैवाल आधारित) के जैव-ईंधन का वाणिज्यिक उत्पादन वर्तमान में अत्यधिक खर्चीला और तकनीकी रूप से जटिल है।
लॉजिस्टिक और आपूर्ति श्रृंखला: कृषि अपशिष्ट (Biomass) के एकत्रीकरण, भंडारण और एथेनॉल संयंत्रों तक परिवहन के लिए सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला का अभाव एक बड़ी व्यावहारिक बाधा है।
आगे की राह (Way Forward)
2G और 3G जैव-ईंधन पर R&D निवेश: 'खाद्य बनाम ईंधन' के संकट से बचने के लिए, सरकार और निजी क्षेत्र (PPP मॉडल) को उन्नत गैर-खाद्य जैव-ईंधन प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान पर भारी निवेश करना चाहिए।
अंतर-मंत्रालयी समन्वय: नीति आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप कृषि, पेट्रोलियम और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयों के बीच एक 'एकीकृत बायो-एनर्जी टास्क फोर्स' का गठन किया जाना चाहिए।
वित्तीय तंत्र का विकास: वैश्विक स्तर पर GBA को विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे बहुपक्षीय संस्थानों के साथ मिलकर विकासशील देशों के लिए एक 'बायोफ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर फंड' स्थापित करना चाहिए।
अंतिम विचार
ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (GBA) भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम' की विदेश नीति और न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण की प्रतिबद्धता का एक जीवंत उदाहरण है। जीवाश्म ईंधन पर वैश्विक निर्भरता को कम करने में यह पहल 'ग्लोबल साउथ' को उपभोक्ता से ऊर्जा के उत्पादक में परिवर्तित करने की क्षमता रखती है, जो 21वीं सदी में एक संवहनीय और आत्मनिर्भर विश्व व्यवस्था की नींव रखेगा।
क्या आप मानते हैं कि इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के तेजी से बढ़ते बाजार के बीच, बायोफ्यूल (विशेषकर फ्लेक्स-फ्यूल इंजन) भारत के ऊर्जा संक्रमण के लिए एक दीर्घकालिक समाधान है, या यह केवल पूर्ण विद्युतीकरण (Full Electrification) तक की एक अल्पकालिक 'संक्रमणकालीन' (Transitional) व्यवस्था मात्र है?