भारत में वस्तु एवं सेवा कर (GST) के कार्यान्वयन की सफलता और विफलताओं का आलोचनात्मक परीक्षण करें।
Q. भारत में वस्तु एवं सेवा कर (GST) के कार्यान्वयन की सफलता और विफलताओं का आलोचनात्मक परीक्षण करें।
Ans -
भूमिका
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के अप्रत्यक्ष कर ढांचे में सबसे परिवर्तनकारी संरचनात्मक सुधार के रूप में 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के माध्यम से 1 जुलाई 2017 को वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया।
विभिन्न केंद्रीय (उत्पाद शुल्क, सेवा कर) और राज्य स्तरीय (वैट, चुंगी) करों को समाहित करते हुए, GST ने भारत को 'एक राष्ट्र, एक कर, एक बाजार' के सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। यह एक उद्गम-आधारित (Origin-based) कर प्रणाली से गंतव्य-आधारित उपभोग कर (Destination-based Consumption Tax) की ओर एक ऐतिहासिक प्रस्थान था। इसके कार्यान्वयन के सात वर्षों के बाद, इसके समष्टिगत आर्थिक (Macro-economic) प्रभावों की सफलता और विफलताओं का एक तटस्थ और आलोचनात्मक परीक्षण अत्यंत प्रासंगिक है।
GST कार्यान्वयन की प्रमुख सफलताएं (Successes)
1. 'कैस्केडिंग प्रभाव' (Cascading Effect) की समाप्ति
पूर्ववर्ती कर प्रणाली में 'कर पर कर' (Tax on Tax) लगने की गंभीर समस्या थी। GST ने संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला में 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' (ITC) की निर्बाध व्यवस्था स्थापित कर उत्पादन लागत को युक्तिसंगत बनाया है, जिससे भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि हुई है।
2. राजस्व में ऐतिहासिक उछाल (Revenue Buoyancy)
आरंभिक हिचकिचाहट के बाद, GST संग्रह में उल्लेखनीय स्थिरता और वृद्धि देखी गई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में औसत मासिक GST संग्रह ₹1.6 लाख करोड़ से ₹1.7 लाख करोड़ के स्तर को पार कर गया है, जो अर्थव्यवस्था के बढ़ते औपचारिकीकरण (Formalization) का स्पष्ट संकेत है।
3. सहकारी संघवाद का अभूतपूर्व मॉडल (Cooperative Federalism)
संविधान के अनुच्छेद 279A के तहत गठित GST परिषद (GST Council) सहकारी संघवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां केंद्र (1/3 वेटेज) और राज्य (2/3 वेटेज) राजकोषीय नीति पर सर्वसम्मति से निर्णय लेते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने 'मोहित मिनरल्स बनाम भारत संघ' (2022) वाद में स्पष्ट किया है कि GST परिषद की सिफारिशें सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने के लिए हैं, जो केंद्र और राज्यों दोनों के विधायी अधिकारों का सम्मान करती हैं।
4. लॉजिस्टिक्स दक्षता और 'ई-वे बिल' (E-Way Bill)
राज्य की सीमाओं पर चेक-पोस्ट समाप्त होने से ट्रकों के आवागमन के समय (Turnaround time) में लगभग 20-30% की कमी आई है। ई-वे बिल और ई-इनवॉयसिंग (e-invoicing) ने कर-वंचना (Tax Evasion) को रोककर कर-आधार (Tax Base) को व्यापक किया है।
GST कार्यान्वयन की विफलताएं और विद्यमान चुनौतियां (Failures and Challenges)
1. अत्यंत जटिल कर संरचना (Multi-slab Structure)
विश्व के अधिकांश देशों (जैसे सिंगापुर, न्यूजीलैंड) में GST की एक एकल दर (Single Rate) है। इसके विपरीत, भारत में चार मुख्य स्लैब (5%, 12%, 18%, 28%) के साथ-साथ शून्य दर और उपकर (Cess) की व्यवस्था है, जो वर्गीकरण विवादों (Classification Disputes) को जन्म देती है।
2. महत्वपूर्ण वस्तुओं का अपवर्जन (Exclusion of Key Sectors)
अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से—जैसे पेट्रोलियम उत्पाद, मानव उपभोग के लिए शराब, और रियल एस्टेट (स्टाम्प ड्यूटी)—को अभी भी GST के दायरे से बाहर रखा गया है। इसके कारण इन क्षेत्रों में ITC की श्रृंखला टूट जाती है, जो GST के मूल उद्देश्य को ही आंशिक रूप से विफल करता है।
3. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर अनुपालन बोझ
यद्यपि GST पोर्टल (GSTN) में तकनीकी सुधार हुए हैं, फिर भी छोटे व्यापारियों के लिए मासिक/त्रैमासिक रिटर्न दाखिल करना, चालान का मिलान करना और जटिल ऑडिट प्रक्रियाओं का पालन करना एक बड़ा वित्तीय और प्रशासनिक बोझ (Compliance Burden) बना हुआ है।
4. संघीय तनाव और मुआवजा विवाद
कोविड-19 महामारी के दौरान राज्यों को GST मुआवजे के भुगतान में देरी के कारण केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ। यद्यपि अब इसकी अवधि बढ़ा दी गई है, किंतु राज्यों में अपने राजस्व स्वायत्तता (Revenue Autonomy) के छिनने की चिंताएं अभी भी विद्यमान हैं।
बिहार के संदर्भ में GST का प्रभाव और प्रासंगिकता
बिहार एक सघन आबादी वाला और मुख्य रूप से उपभोक्ता राज्य (Consuming State) है। सैद्धांतिक रूप से, 'गंतव्य-आधारित कर' होने के कारण GST ने विनिर्माता राज्यों (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र) की तुलना में बिहार जैसे राज्यों के राजकोषीय आधार को मजबूत किया है।
हालाँकि, व्यावहारिक धरातल पर कुछ विशिष्ट चुनौतियां हैं:
राज्य में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का आकार बड़ा है। पटना और बिहार के सभी जिलों में फैले कृषि-प्रसंस्करण, मखाना पैकेजिंग, और पारंपरिक खुदरा व्यापार से जुड़े सूक्ष्म उद्यमों के लिए डिजिटल रिकॉर्ड रखना और GSTIN के तहत अनुपालन करना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो रहा है।
यदि पेट्रोल और डीजल को GST के दायरे में लाया जाता है, तो राज्य सरकार को अल्पावधि में अपने वाणिज्यिक कर राजस्व में गिरावट की आशंका का समाधान केंद्र के साथ मिलकर खोजना होगा।
आगे की राह (Way Forward)
कर दरों का युक्तिकरण: केलकर कार्यबल (Kelkar Task Force) और नीति आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप, वर्तमान कई स्लैब को धीरे-धीरे तीन दरों (Standard, Merit, and Demerit rates) में विलय करने की दिशा में कार्य होना चाहिए।
पेट्रोलियम का समावेश: कच्चे तेल और विमानन टर्बाइन ईंधन (ATF) को चरणबद्ध तरीके से GST के दायरे में लाया जाना चाहिए, ताकि परिवहन और विनिर्माण क्षेत्र को ITC का लाभ मिल सके।
विवाद समाधान तंत्र: लंबे समय से लंबित जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण (GSTAT) की राज्य पीठों को तत्काल पूर्ण रूप से कार्यशील किया जाए, ताकि उच्च न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ कम हो।
निष्कर्ष
वस्तु एवं सेवा कर (GST) केवल एक कर-सुधार नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को एकीकृत करने का एक महा-अभियान है। आरंभिक तकनीकी बाधाओं और संरचनात्मक जटिलताओं के बावजूद, इसने भारत को एक सुदृढ़ और पारदर्शी वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान किया है।
इसे एक 'संपूर्ण' प्रणाली के बजाय एक 'विकासशील' (Evolving) प्रणाली के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि GST परिषद के माध्यम से कर स्लैब का युक्तिकरण, MSMEs के लिए अनुपालन का सरलीकरण, और पेट्रोलियम उत्पादों का समावेश सुनिश्चित किया जाता है, तो GST निश्चित रूप से भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और 'विकसित भारत @ 2047' के लक्षित विकास को गति देने वाला सबसे शक्तिशाली राजकोषीय उपकरण सिद्ध होगा।