खाद्य सुरक्षा से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) 2013 और PDS प्रणाली की चुनौतियों की चर्चा करें।

 Q. खाद्य सुरक्षा से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) 2013 और PDS प्रणाली की चुनौतियों की चर्चा करें।

Ans - 

भूमिका

किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए अपने नागरिकों को भुखमरी और कुपोषण से मुक्त रखना उसका प्राथमिक संवैधानिक और नैतिक दायित्व है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, खाद्य सुरक्षा की स्थिति तब मानी जाती है, जब "सभी लोगों की हर समय पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन तक भौतिक, सामाजिक और आर्थिक पहुँच हो, जो उनके सक्रिय और स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक आहार संबंधी जरूरतों को पूरा करता हो।"

भारत में खाद्य सुरक्षा केवल एक नीतिगत लक्ष्य नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय ने 'पीयूसीएल बनाम भारत संघ (2001)' ऐतिहासिक वाद में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार) के अंतर्गत 'गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार' का अभिन्न अंग माना है। इसी अधिकार-आधारित (Rights-based) दृष्टिकोण को विधिक मान्यता प्रदान करने हेतु भारत सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 पारित किया।

खाद्य सुरक्षा के मूलभूत आयाम (Pillars of Food Security)

एक सुदृढ़ खाद्य सुरक्षा तंत्र निम्नलिखित चार स्तंभों पर आधारित होता है:

  • उपलब्धता (Availability): देश की भौगोलिक सीमा के भीतर घरेलू उत्पादन या आयात के माध्यम से पर्याप्त खाद्यान्न की निरंतर भौतिक उपस्थिति।

  • पहुँच (Accessibility): भौगोलिक एवं तार्किक रूप से खाद्यान्न वितरण तंत्र (जैसे- PDS) की समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुलभता।

  • वहनीयता (Affordability): खाद्यान्न का मूल्य इतना न्यूनतम हो कि समाज का सबसे वंचित वर्ग भी अपनी क्रय क्षमता (Purchasing Power) के भीतर उसे खरीद सके।

  • अवशोषण एवं पोषण (Absorption & Utilization): केवल कैलोरी नहीं, बल्कि स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से शरीर द्वारा पोषक तत्वों का उचित अवशोषण।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013: एक संरचनात्मक बदलाव

NFSA, 2013 ने भारत की खाद्य सुरक्षा नीति को 'कल्याण-उन्मुख' (Welfare-driven) दृष्टिकोण से हटाकर 'अधिकार-आधारित' (Rights-based) बना दिया। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:

  • व्यापक कवरेज: यह अधिनियम देश की लगभग 75% ग्रामीण और 50% शहरी आबादी (कुल 81.35 करोड़ लोग) को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के तहत कवर करता है।

  • रियायती खाद्यान्न: इसके तहत 'प्राथमिकता वाले परिवारों' (PHH) को 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति तथा 'अंत्योदय अन्न योजना' (AAY) के तहत अति-गरीब परिवारों को 35 किलोग्राम प्रति परिवार खाद्यान्न अत्यंत रियायती दर— चावल ₹3, गेहूं ₹2, और मोटे अनाज ₹1 प्रति किलो की दर से प्रदान किया जाता है।

  • महिला सशक्तिकरण: राशन कार्ड जारी करने के उद्देश्य से परिवार की 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की सबसे बड़ी महिला को 'परिवार का मुखिया' माना गया है।

  • मातृत्व एवं बाल पोषण: गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को ₹6,000 का मातृत्व लाभ (प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के साथ एकीकृत) तथा 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन (Mid-day Meal / PM POSHAN) का विधिक अधिकार।

PDS प्रणाली और NFSA के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ

यद्यपि NFSA ने 'भूख से होने वाली मौतों' को काफी हद तक नियंत्रित किया है, परंतु इसकी कार्यान्वयन एजेंसी—सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)—गंभीर ढांचागत और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना कर रही है:

1. लक्षणीकरण की त्रुटियां (Targeting Errors)

  • समावेशन और अपवर्जन की त्रुटि (Inclusion and Exclusion Errors): नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों के अनुसार, कई अपात्र लोग (Ghost Beneficiaries) PDS का लाभ ले रहे हैं, जबकि वास्तविक गरीब (अस्थायी प्रवासी, बेघर) राशन कार्ड न होने या आधार विसंगतियों के कारण बाहर रह जाते हैं।

2. आपूर्ति श्रृंखला में रिसाव (Leakages in Supply Chain)

  • खाद्यान्न का भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों से उचित दर दुकानों (Fair Price Shops) तक पहुँचने के बीच बड़े पैमाने पर कालाबाजारी (Black Marketing) और 'डायवर्जन' होता है।

3. भंडारण और लॉजिस्टिक्स का अभाव (Infrastructural Deficit)

  • शांता कुमार समिति (2015) ने रेखांकित किया था कि FCI के पास वैज्ञानिक भंडारण क्षमता का भारी अभाव है। कवर एंड प्लिंथ (CAP) स्टोरेज जैसी अवैज्ञानिक पद्धतियों के कारण प्रतिवर्ष हजारों टन अनाज बारिश और चूहों के कारण सड़ जाता है।

4. पारिस्थितिक और कृषि असंतुलन

  • PDS में मुख्य रूप से धान और गेहूं की खरीद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी ने देश के जल-संसाधनों (विशेषकर पंजाब, हरियाणा में) पर भारी दबाव डाला है और दलहन एवं तिलहन के उत्पादन को हतोत्साहित किया है।

5. पोषण सुरक्षा बनाम कैलोरी सुरक्षा ('Hidden Hunger')

  • वर्तमान PDS मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट (गेहूं-चावल) प्रदान करता है। इसमें प्रोटीन (दालें) और सूक्ष्म पोषक तत्वों का अभाव है, जिसके कारण भारत 'छिपी हुई भूख' (Hidden Hunger) और कुपोषण का सामना कर रहा है।

बिहार के विशेष संदर्भ में खाद्य सुरक्षा: चुनौतियां और प्रासंगिकता

नीति आयोग के 'राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (National MPI) के अनुसार, बिहार भारत के सर्वाधिक निर्धन राज्यों में से एक है। राज्य की लगभग 85% से अधिक आबादी NFSA के दायरे में आती है।

  • प्रवासन और ONORC का महत्व: बिहार देश के सबसे बड़े श्रम-निर्यातक (Labor-exporting) राज्यों में से एक है। ऐसे में 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' (ONORC) योजना बिहार के प्रवासी श्रमिकों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है, जिससे वे देश के किसी भी हिस्से में अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं।

  • आपदा जनित आपूर्ति बाधाएं: कोसी, गंडक और बागमती नदियों में प्रतिवर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ के दौरान उत्तरी बिहार के कई जिलों में PDS आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हो जाती है।

  • पोषण का संकट: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, बिहार में महिलाओं में एनीमिया और बच्चों में स्टंटिंग (Stunting) की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जो PDS प्रणाली में फोर्टिफाइड (Fortified) अनाज को शामिल करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

आगे की राह (Way Forward)

PDS प्रणाली को अधिक पारदर्शी, लक्षित और पोषण-उन्मुख बनाने हेतु निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं:

  1. पारदर्शिता एवं डिजिटलीकरण: 'एंड-टू-एंड' कंप्यूटरीकरण, उचित दर दुकानों (FPS) पर e-PoS मशीनों का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन और 'स्मार्ट कार्ड' के माध्यम से रिसाव (Leakage) को शून्य किया जाए।

  2. शांता कुमार समिति की अनुशंसाओं का अनुपालन: शहरी और आर्थिक रूप से संपन्न क्षेत्रों में भौतिक अनाज के स्थान पर प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer - DBT) को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, ताकि सरकार का लॉजिस्टिक बोझ कम हो।

  3. आहार विविधीकरण (Dietary Diversification): PDS बास्केट में पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाजों (श्री अन्न/Millets), दालों और खाद्य तेलों को शामिल किया जाना चाहिए।

  4. बायो-फोर्टिफिकेशन (Bio-fortification): कुपोषण और रक्ताल्पता (Anemia) से निपटने के लिए बिहार सहित पूरे देश में PDS के माध्यम से फोर्टिफाइड चावल (आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी-12 युक्त) के वितरण को तीव्र गति प्रदान की जाए।

निष्कर्ष

सतत विकास लक्ष्य-2 (SDG-2: Zero Hunger) की प्राप्ति के लिए केवल पेट भरना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक पोषण सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने भारत को भुखमरी के विरुद्ध एक मजबूत कानूनी कवच प्रदान किया है। यदि प्रशासनिक दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ PDS प्रणाली की तकनीकी खामियों और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं को दूर कर लिया जाए, तो यह तंत्र न केवल भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के निर्माण हेतु एक स्वस्थ, सक्षम और उत्पादक 'मानव पूंजी' (Human Capital) का निर्माण भी करेगा।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1