शॉर्ट नोट्स: बिहार का जीविका (JEEVIKA) मॉडल ।

 Q. शॉर्ट नोट्स: बिहार का जीविका (JEEVIKA) मॉडल ।

Ans - 

ग्रामीण निर्धनता उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण की दिशा में, बिहार सरकार द्वारा विश्व बैंक (World Bank) की सहायता से वर्ष 2006 में 'बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन परियोजना' (BRLP), जिसे 'जीविका' (JEEViKA) के नाम से जाना जाता है, का शुभारंभ किया गया। वर्तमान में यह राज्य में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के नोडल अभिकरण के रूप में कार्य कर रहा है।

जीविका केवल एक सूक्ष्म-वित्त (Micro-finance) कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह 1.30 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं और 10 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को संगठित करने वाला बिहार का सबसे बड़ा सामाजिक-आर्थिक आंदोलन है।

जीविका मॉडल का संस्थागत ढांचा और कार्यप्रणाली

जीविका का मॉडल 'सामाजिक पूंजी' (Social Capital) के निर्माण और त्रिस्तरीय संस्थागत ढांचे पर आधारित है:

  • संस्थागत संरचना: जमीनी स्तर पर 10-15 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह (SHG), ग्राम स्तर पर ग्राम संगठन (Village Organization - VO), और पंचायत/प्रखंड स्तर पर क्लस्टर लेवल फेडरेशन (CLF)। यह ढांचा महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वायत्तता प्रदान करता है।

  • वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion): प्रारंभिक चरण में चक्रीय निधि (Revolving Fund) और सामुदायिक निवेश कोष (Community Investment Fund) प्रदान किया जाता है। इसके पश्चात् समूहों की बैंक लिंकेज (Bank Linkage) सुनिश्चित की जाती है, जिसने ग्रामीण महिलाओं को साहूकारों (Moneylenders) के ऋण-जाल से मुक्त किया है।

  • क्षमता निर्माण: महिलाओं को कृषि, पशुपालन, और गैर-कृषि आजीविका (Non-farm Livelihoods) के लिए तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

बिहार के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य पर जीविका का प्रभाव

1. आर्थिक सशक्तिकरण और आजीविका विविधीकरण

  • दीदी की रसोई: राज्य के जिला अस्पतालों और सरकारी संस्थानों में जीविका दीदियों द्वारा संचालित कैंटीन, जो उन्हें संस्थागत आय प्रदान कर रही है।

  • कृषि और मूल्यवर्धन: 'श्री विधि' (SRI Method) तकनीक के माध्यम से कृषि उत्पादकता में वृद्धि। इसके अतिरिक्त, मखाना प्रसंस्करण और 'नीरा' (Neera) उत्पादन जैसे गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में महिलाओं का प्रवेश।

  • उद्यमिता विकास: ग्रामीण हाट और सरस मेलों के माध्यम से स्थानीय हस्तशिल्प (जैसे- सिक्की ग्रास, सुजनी कला) को बाजार उपलब्ध कराना।

2. सामाजिक परिवर्तन और नीतिगत हस्तक्षेप

  • निर्णय क्षमता में वृद्धि: पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं का घर की चारदीवारी से निकलकर वित्तीय निर्णय लेना एक क्रांतिकारी बदलाव है।

  • सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: राज्य में शराबबंदी (Prohibition) को सफल बनाने, बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ राज्यव्यापी अभियानों में जीविका ग्राम संगठनों ने 'फ्रंटलाइन वारियर्स' के रूप में कार्य किया है।

  • स्वास्थ्य और पोषण: 'स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता (HNW)' हस्तक्षेप के माध्यम से मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) को कम करने में योगदान।

चुनौतियाँ

  • सूक्ष्म-वित्त से सूक्ष्म-उद्यम (Micro-finance to Micro-enterprise): यद्यपि ऋण तक पहुंच बढ़ी है, किंतु समूहों को टिकाऊ और लाभकारी छोटे उद्योगों में बदलना अब भी एक बड़ी चुनौती है।

  • डिजिटल और विपणन विभाजन: उत्पादित वस्तुओं के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच और ब्रांडिंग की कमी।

आगे की राह और रणनीतिक विस्तार

जीविका मॉडल ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि महिलाओं को संस्थागत और वित्तीय समर्थन प्रदान किया जाए, तो वे राज्य की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बन सकती हैं।

इस मॉडल की अभूतपूर्व सफलता को देखते हुए, अब इसके द्वितीय पीढ़ी के सुधारों (Second Generation Reforms) की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जीविका के तहत स्थापित किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और कृषि-उद्यमिता नेटवर्कों का सघन विस्तार केवल कुछ विशिष्ट ग्रामीण क्लस्टरों तक सीमित न रहे। महिला उद्यमिता और आपूर्ति श्रृंखला के इस सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र को पटना और बिहार के सभी जिलों में समान और व्यापक रूप से विस्तारित किया जाना चाहिए। जीविका उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर 'Ondc' (Open Network for Digital Commerce) और 'GeM' पोर्टल से जोड़कर, बिहार सतत विकास लक्ष्यों (SDG-1: गरीबी समाप्ति और SDG-5: लैंगिक समानता) को सफलतापूर्वक प्राप्त कर 'आत्मनिर्भर बिहार' के संकल्प को साकार कर सकता है।

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