जयप्रकाश नारायण (JP) और 'संपूर्ण क्रांति' के राजनीतिक एवं सामाजिक प्रभाव की चर्चा करें।
Q. जयप्रकाश नारायण (JP) और 'संपूर्ण क्रांति' के राजनीतिक एवं सामाजिक प्रभाव की चर्चा करें।
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अप्रतिम योद्धा और सर्वोदय नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) द्वारा 1970 के दशक में प्रवर्तित 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक युगांतरकारी अध्याय है। 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से उद्घोषित यह आंदोलन मात्र एक सत्ता परिवर्तन की मांग नहीं था, बल्कि भारतीय समाज और व्यवस्था के आमूलचूल रूपांतरण का शंखनाद था। यह आंदोलन ऐसे समय में उभरा जब देश बढ़ते भ्रष्टाचार, बेलगाम महंगाई, व्यापक बेरोजगारी और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा था।
जयप्रकाश नारायण का यह विज़न सात आयामों—राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक—पर आधारित था। इस आंदोलन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित है:
राजनीतिक प्रभाव (सत्ता और व्यवस्था का रूपांतरण)
जेपी आंदोलन ने भारतीय राजनीति के स्वरूप और दिशा को स्थायी रूप से परिवर्तित कर दिया, जिसका प्रभाव आज भी परिलक्षित होता है:
लोकतंत्र की रक्षा एवं अधिनायकवाद का प्रतिरोध: 1975 में लगाए गए आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान नागरिक अधिकारों के हनन और प्रेस की सेंसरशिप के विरुद्ध जेपी का आंदोलन एक अजेय सुरक्षा कवच सिद्ध हुआ। इसने स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय जनमानस किसी भी प्रकार के सत्तावाद (Authoritarianism) को स्वीकार नहीं करेगा।
गठबंधन और गैर-कांग्रेसी राजनीति का प्रादुर्भाव: जेपी के नैतिक नेतृत्व ने वैचारिक रूप से भिन्न विपक्षी दलों को एकजुट कर 'जनता पार्टी' के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। इसके परिणामस्वरूप 1977 में केंद्र में पहली बार एक गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ, जिसने भारत में एकदलीय प्रभुत्व (One-party dominance) को समाप्त कर दिया।
संवैधानिक सुधार और नागरिक अधिकार: जनता पार्टी की सरकार ने जेपी के लोकतांत्रिक आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए 44वां संविधान संशोधन अधिनियम (1978) पारित किया। इसके माध्यम से आपातकाल के दौरान हुए अलोकतांत्रिक बदलावों (42वें संशोधन) को निरस्त किया गया और अनुच्छेद 20 व 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) को आपातकाल में भी निलंबित न किए जाने का ऐतिहासिक प्रावधान किया गया।
बिहार में नए क्षेत्रीय नेतृत्व का उदय: इस आंदोलन ने राजनीति का लोकतंत्रीकरण किया और इसे कुलीन ड्राइंग-रूम से निकालकर आम आदमी तक पहुँचाया। वर्तमान बिहार की राजनीति के शीर्ष नेता और सामाजिक न्याय के पैरोकार इसी 'बिहार छात्र आंदोलन (1974)' की भट्टी में तपकर निकले हैं।
सामाजिक प्रभाव (चेतना और समतामूलक समाज का निर्माण)
'संपूर्ण क्रांति' का उद्देश्य केवल राजनीतिक सत्ता बदलना नहीं था, बल्कि समाज के आंतरिक अंतर्विरोधों का समाधान करना भी था:
युवा और छात्र शक्ति का जागरण: जेपी ने 'छात्र युवा संघर्ष वाहिनी' का गठन किया। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे केवल डिग्री-उन्मुख शिक्षा के मोहपाश से बाहर निकलें और कम से कम एक वर्ष राष्ट्र-निर्माण, रचनात्मक कार्यों और व्यवस्था परिवर्तन में समर्पित करें।
जातिवाद पर प्रहार और सामाजिक समानता: बिहार के कठोर और पदानुक्रमित जातीय ढांचे पर यह आंदोलन एक वैचारिक प्रहार था। जेपी ने युवाओं से 'जनेऊ' (पवित्र धागा) तोड़ने, अंतर्जातीय विवाह करने और अपने नाम के आगे से जातिसूचक उपनाम हटाने का आह्वान किया, जिसने सामाजिक समानता के बीज बोए।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामाजिक लामबंदी: जेपी ने भ्रष्टाचार को केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सामाजिक बुराई माना। इस आंदोलन ने आम जनता, विशेषकर ग्रामीण और वंचित वर्गों में अपने अधिकारों और सार्वजनिक जवाबदेही (Public Accountability) के प्रति अभूतपूर्व जागरूकता उत्पन्न की।
शैक्षणिक प्रणाली में सुधार की मांग: जेपी तत्कालीन मैकालेवादी शिक्षा पद्धति के कटु आलोचक थे। उन्होंने ऐसी शिक्षा प्रणाली की मांग की जो केवल क्लर्क पैदा न करे, बल्कि व्यावहारिक, रोजगारपरक (Vocational) और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो।
मूल्यांकन एवं आगे की राह
जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' मात्र एक ऐतिहासिक घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सुधारात्मक तंत्र (Self-correcting mechanism) थी। यद्यपि उनके जीवनकाल में इस क्रांति का पूर्ण यूटोपियाई (Utopian) लक्ष्य साकार नहीं हो सका और जनता पार्टी की सरकार अंतर्कलह का शिकार हो गई, किंतु सत्ता को जन-जवाबदेह बनाने और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा का जो मानक इस आंदोलन ने स्थापित किया, वह अजर-अमर है।
आगे की राह: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जब भारतीय राजनीतिक व्यवस्था धनबल, बाहुबल (Criminalization of Politics), संस्थागत क्षरण और चुनावी भ्रष्टाचार जैसी समकालीन चुनौतियों का सामना कर रही है, जेपी का दर्शन हमें सचेत करता है। सुशासन की स्थापना, चुनावी सुधारों (State Funding of Elections), और संविधान के अनुच्छेद 38 (लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था) के वास्तविक क्रियान्वयन के माध्यम से ही 'संपूर्ण क्रांति' के अधूरे स्वप्न को पूर्ण किया जा सकता है। नीति-निर्माताओं और युवा वर्ग को जेपी के "लोक-शक्ति" (People's Power) के सिद्धांत को पुनर्जीवित कर एक सहभागी और पारदर्शी लोकतंत्र के निर्माण की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।