स्वामी सहजानंद सरस्वती और बिहार में किसान सभा आंदोलन की भूमिका का मूल्यांकन करें।

 Q. स्वामी सहजानंद सरस्वती और बिहार में किसान सभा आंदोलन की भूमिका का मूल्यांकन करें।

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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में कृषक वंचना और सामंती शोषण के विरुद्ध उठी सबसे सशक्त आवाज़ों में स्वामी सहजानंद सरस्वती और उनके द्वारा नेतृत्व प्रदान किया गया किसान सभा आंदोलन सर्वोच्च स्थान रखता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता और शोषक जमींदारी व्यवस्था के दोहरे पाटों के बीच पिस रहे बिहार के किसानों को इस आंदोलन ने न केवल एक संगठित मंच प्रदान किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से भी जोड़ दिया। इतिहासकार सुमित सरकार के अनुसार, 1930 के दशक में बिहार का किसान आंदोलन पूरे भारत में सबसे सुदृढ़ और उग्र था, जिसका निर्विवाद श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती के करिश्माई नेतृत्व को जाता है।

किसान सभा आंदोलन की पृष्ठभूमि और कारण

बिहार में किसान आंदोलन के उद्भव के मूल में स्थायी बंदोबस्त (1793) से उत्पन्न ढांचागत विषमताएं थीं:

  • जमींदारी उत्पीड़न और 'अबवाब': जमींदारों द्वारा अत्यधिक लगान वसूली, बेगारी (बलात श्रम) और विभिन्न प्रकार के अवैध करों (अबवाब) ने किसानों को भुखमरी के कगार पर पहुँचा दिया था।

  • 1929 की वैश्विक आर्थिक मंदी: कृषि उत्पादों के मूल्यों में भारी गिरावट आई, जिससे किसानों के लिए नकद लगान चुकाना असंभव हो गया।

  • बकाश्त भूमि की समस्या: लगान न चुका पाने के कारण जमींदारों ने किसानों की जोत वाली जमीनों (बकाश्त भूमि) पर बलपूर्वक कब्ज़ा कर लिया, जिससे हजारों किसान रातों-रात भूमिहीन हो गए।

स्वामी सहजानंद सरस्वती का नेतृत्व और संस्थागत विकास

स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसानों के बिखरे हुए असंतोष को एक वैचारिक और संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। उनके नेतृत्व में किसान सभा का विकास निम्न चरणों में हुआ:

1. आरंभिक प्रयास और बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929)

  • स्वामी जी ने 1927 में पटना के बिहटा में आश्रम की स्थापना की और किसानों को संगठित करना शुरू किया।

  • नवंबर 1929 में सोनपुर मेले के ऐतिहासिक अवसर पर 'बिहार प्रांतीय किसान सभा' (BPKS) की विधिवत स्थापना की गई। इसके प्रथम अध्यक्ष स्वयं स्वामी सहजानंद सरस्वती और सचिव श्री कृष्ण सिंह चुने गए।

2. अखिल भारतीय किसान सभा (1936)

  • बिहार में आंदोलन की अभूतपूर्व सफलता को देखते हुए, अप्रैल 1936 में लखनऊ में 'अखिल भारतीय किसान सभा' (AIKS) का गठन किया गया।

  • स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष तथा एन.जी. रंगा इसके महासचिव निर्वाचित हुए। इसने बिहार के कृषक मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित कर दिया।

3. वैचारिक प्रसार और साहित्य

  • स्वामी जी ने अपने विचारों के प्रसार के लिए 'हुंकार' (हिंदी पत्रिका) का प्रकाशन किया। उनके द्वारा रचित 'किसान क्या करें?' और 'मेरा जीवन संघर्ष' जैसी पुस्तिकाओं ने किसानों में वर्गीय चेतना का संचार किया। उनका नारा "डंडा मेरा पीर है" जमींदारी लठैतों के विरुद्ध किसानों के उग्र प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।

आंदोलन के प्रमुख कार्य और संघर्ष (स्वरूप)

किसान सभा ने केवल याचिका या याचिकाओं (Petitions) का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि प्रत्यक्ष जन-कार्रवाई पर बल दिया:

  • बकाश्त भूमि आंदोलन (1937-1939): मुंगेर के बड़हिया टाल (कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में), गया (यदुनंदन शर्मा), और सारण (राहुल सांकृत्यायन) में बकाश्त भूमि की वापसी के लिए उग्र सत्याग्रह हुए। किसानों ने जमींदारों को बेदखल कर अपनी जमीनों पर पुनः अधिकार जताया।

  • नहर-कर (Canal Tax) का विरोध: शाहाबाद (भोजपुर) क्षेत्र में नहरों की सिंचाई दरों में वृद्धि के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाए गए।

  • जमींदारी उन्मूलन का प्रस्ताव: 1935 के हाजीपुर अधिवेशन में किसान सभा ने पहली बार स्पष्ट रूप से 'जमींदारी प्रथा के पूर्ण उन्मूलन' का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।

किसान सभा आंदोलन का मूल्यांकन और प्रभाव

भारतीय राजनीति और समाज पर इस आंदोलन के प्रभाव अत्यंत गहरे और दूरगामी रहे:

  • कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन: किसान सभा के दबाव के कारण ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपने फैजपुर अधिवेशन (1936) में एक स्पष्ट कृषि कार्यक्रम (Agrarian Program) अपनाना पड़ा।

  • विधायी सुधार (Legislative Reforms): 1937 में जब बिहार में श्री कृष्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की पहली सरकार बनी, तो किसान सभा के नैतिक दबाव में सरकार को बिहार काश्तकारी (संशोधन) अधिनियम और बकाश्त भूमि वापसी अधिनियम (1938) पारित करना पड़ा, जिससे लगान में कमी आई और रैयतों को सुरक्षा मिली।

  • राष्ट्रीय आंदोलन का समावेशन: स्वामी सहजानंद ने स्पष्ट किया कि "किसानों की लड़ाई ही असल में आज़ादी की लड़ाई है।" इससे सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन को एक व्यापक जनाधार (Mass Base) प्राप्त हुआ।

  • सीमाएँ: यद्यपि यह आंदोलन अत्यधिक सफल रहा, किंतु इसके नेतृत्व में मुख्य रूप से मध्यम वर्गीय किसानों (कोयरी, कुर्मी, यादव, भूमिहार) का वर्चस्व रहा। सबसे निचले पायदान के खेतिहर मजदूरों और दलितों के मुद्दों को उस अनुपात में प्राथमिकता नहीं मिल सकी।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

स्वामी सहजानंद सरस्वती भारतीय कृषक चेतना के 'दधीचि' थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शोषित वर्ग के उत्थान के लिए होम कर दिया। किसान सभा आंदोलन के अथक संघर्षों का ही यह परिणाम था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बिहार जमींदारी उन्मूलन अधिनियम (1947) पारित करने वाला देश का प्रथम राज्य बना।

आगे की राह: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जब भारतीय कृषि जलवायु परिवर्तन, अलाभकारी मूल्य और विखंडित जोत (Fragmented Holdings) जैसी ढांचागत चुनौतियों का सामना कर रही है, तब किसान सभा का संगठनात्मक अनुशासन और नीतिगत वकालत (Policy Advocacy) आज भी प्रासंगिक है। नीति आयोग के 'किसानों की आय दोगुनी करने' और समावेशी कृषि विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए स्वामी सहजानंद सरस्वती के 'किसान-केंद्रित नीति निर्माण' के दर्शन को आधुनिक कृषि सुधारों का आधार बनाया जाना चाहिए।

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