बिहार में तकनीकी शिक्षा (Technical Education) के विकास पर एक संक्षिप्त निबंध लिखें।
Q. बिहार में तकनीकी शिक्षा (Technical Education) के विकास पर एक संक्षिप्त निबंध लिखें।
Ans -
किसी भी राष्ट्र या राज्य के आर्थिक सशक्तिकरण और औद्योगिक विकास का मूल आधार उसकी तकनीकी शिक्षा प्रणाली होती है। जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का वास्तविक दोहन केवल कुशल, नवोन्मेषी और तकनीकी रूप से दक्ष मानव पूंजी के माध्यम से ही संभव है। बिहार में तकनीकी शिक्षा का विकास औपनिवेशिक काल की सीमित प्रशासनिक आवश्यकताओं से प्रारंभ होकर वर्तमान में 'ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' (Knowledge Economy) के निर्माण तक एक लंबी और क्रमिक यात्रा रही है।
बिहार में तकनीकी शिक्षा के विकास-क्रम, इसकी वर्तमान स्थिति और चुनौतियों का विश्लेषण निम्नलिखित उप-शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है:
1. औपनिवेशिक काल में तकनीकी शिक्षा की नींव (1813-1947)
ब्रिटिश काल में तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य भारत का औद्योगिक विकास करना नहीं था, बल्कि सार्वजनिक निर्माण (Public Works), स्वास्थ्य और राजस्व विभागों के लिए मध्य-स्तरीय और अधीनस्थ तकनीकी कर्मचारियों की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। इसके बावजूद, इस दौर में कुछ उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना हुई:
कृषि और पशु चिकित्सा तकनीक: कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में संपूर्ण एशिया में अग्रणी पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान (1905) की स्थापना समस्तीपुर में की गई। इसी प्रकार, पटना वेटेरिनरी कॉलेज (1930) ने पशुपालन और शल्य चिकित्सा तकनीक को बढ़ावा दिया।
इंजीनियरिंग और आधारभूत संरचना: वर्ष 1924 में स्थापित बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (वर्तमान NIT पटना) राज्य में इंजीनियरिंग शिक्षा का प्रथम प्रमुख केंद्र बना।
खनन और भू-विज्ञान: खनिज संपदा के दोहन के लिए तत्कालीन अविभाजित बिहार में 1926 में इंडियन स्कूल ऑफ माइंस (ISM), धनबाद की स्थापना की गई।
चिकित्सा विज्ञान: 1925 में प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज (वर्तमान पटना मेडिकल कॉलेज - PMCH) की स्थापना ने आधुनिक चिकित्सा तकनीक और अनुसंधान की नींव रखी।
2. स्वतंत्रता पश्चात का विस्तार और विभाजन का आघात (1947-2000)
स्वतंत्रता के पश्चात पंचवर्षीय योजनाओं के तहत तकनीकी शिक्षा का विस्तार किया गया, किंतु वर्ष 2000 में राज्य के विभाजन ने एक बड़ा ढांचागत संकट उत्पन्न कर दिया:
संस्थागत विस्तार: 1954 में मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) और 1960 में भागलपुर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (BCE) जैसे संस्थानों की स्थापना हुई। अविभाजित बिहार में BIT सिंदरी (1949) और RIIT जमशेदपुर (अब NIT) तकनीकी शिक्षा के प्रमुख स्तंभ बने।
विभाजन का प्रभाव: 15 नवंबर 2000 को झारखंड के निर्माण के परिणामस्वरूप अधिकांश बड़े औद्योगिक, खनन और तकनीकी संस्थान (जैसे ISM धनबाद, BIT सिंदरी, NIT जमशेदपुर) नवगठित राज्य के हिस्से में चले गए। इससे शेष बिहार की तकनीकी शिक्षा के बुनियादी ढांचे और औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को भारी क्षति पहुँची।
3. 21वीं सदी में तकनीकी शिक्षा का पुनरुत्थान (2000 के बाद)
विभाजन के झटके से उबरते हुए, पिछले दो दशकों में राज्य और केंद्र सरकार के समन्वय से बिहार में उच्च तकनीकी शिक्षा का एक नया युग आरंभ हुआ है:
राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की स्थापना: वर्ष 2004 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग को उन्नत कर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) का दर्जा दिया गया। 2008 में IIT पटना की स्थापना एक ऐतिहासिक कदम था। तदोपरांत AIIMS पटना, NIFT पटना (फैशन तकनीक) और IIM बोधगया (प्रबंधन और तकनीकी प्रशासन) ने राज्य को राष्ट्रीय शैक्षणिक मानचित्र पर पुनः स्थापित किया।
आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (AKU): वर्ष 2010 में स्थापित यह विश्वविद्यालय राज्य के सभी इंजीनियरिंग, मेडिकल और तकनीकी संस्थानों को विनियमित करने, पाठ्यक्रम को अद्यतन करने और शोध (Research & Development) को बढ़ावा देने का एक सफल प्रयास है।
विकेंद्रीकरण और समावेशी नीतियाँ: बिहार सरकार के महत्वाकांक्षी 'सात निश्चय' कार्यक्रम के तहत तकनीकी शिक्षा को हर जिले तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
प्रत्येक जिले में इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक और ITI की स्थापना की जा रही है।
वित्तीय बाधाओं को दूर करने हेतु 'बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना' लागू की गई है, जिसने ग्रामीण युवाओं की तकनीकी शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित की है।
4. वर्तमान चुनौतियाँ और समाधान की आवश्यकता
यद्यपि संस्थागत विस्तार तेजी से हुआ है, किंतु राज्य में तकनीकी शिक्षा कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है:
गुणवत्ता बनाम मात्रा: नए इंजीनियरिंग कॉलेजों और पॉलिटेक्निक संस्थानों में आधुनिक प्रयोगशालाओं, अद्यतन उपकरणों और योग्य संकाय (Qualified Faculty) का भारी अभाव है।
उद्योग-अकादमिक अंतराल (Industry-Academia Gap): बिहार में वृहद् विनिर्माण उद्योगों और IT हब के अभाव के कारण छात्रों को व्यावहारिक औद्योगिक प्रशिक्षण (Internship) और कैंपस प्लेसमेंट (Campus Placement) में कठिनाई होती है।
प्रतिभा पलायन (Brain Drain): उचित अवसरों के अभाव में राज्य के मेधावी तकनीकी छात्र अन्य राज्यों या विदेशों की ओर पलायन कर जाते हैं।
समाधान: तकनीकी संस्थानों को स्थानीय उद्योगों, MSME सेक्टर, कृषि-प्रसंस्करण और आईटी पार्कों (जैसे बिहटा आईटी पार्क) से जोड़ना होगा। बिहार स्टार्टअप पॉलिसी और परिसरों में 'इनक्यूबेशन सेंटर' (Incubation Centers) की स्थापना के माध्यम से स्वरोजगार और उद्यमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
तकनीकी शिक्षा किसी भी समाज को मात्र उपभोग-केंद्रित से उत्पादन-केंद्रित (Production-centric) अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने का सबसे सशक्त माध्यम है। ऐतिहासिक झटकों और अवसंरचनात्मक बाधाओं के बावजूद बिहार ने IIT, NIT और जिला-स्तरीय तकनीकी संस्थानों के जाल के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है।
आगे की राह: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के दृष्टिकोण के अनुरूप, अब समय आ गया है कि बिहार के तकनीकी पाठ्यक्रम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स और डेटा साइंस जैसी 21वीं सदी की उभरती तकनीकों (Emerging Technologies) को प्रमुखता से शामिल किया जाए। गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना और औद्योगिक इंटरेक्शन के अभिसरण से ही बिहार अपने विशाल युवा वर्ग को एक उत्पादक 'वैश्विक कार्यबल' (Global Workforce) में ढालकर राज्य की प्रगति को नई दिशा दे सकेगा।