बिहार में पाश्चात्य शिक्षा (Western Education) के विकास (1813-1947) का रेखांकन करें।
Q. बिहार में पाश्चात्य शिक्षा (Western Education) के विकास (1813-1947) का रेखांकन करें।
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औपनिवेशिक भारत में पाश्चात्य शिक्षा का आरंभ मूलतः ब्रिटिश प्रशासन की साम्राज्यवादी आवश्यकताओं और एक अधीनस्थ नौकरशाही (Subordinate Bureaucracy) तैयार करने के उद्देश्य से किया गया था। यद्यपि ऐतिहासिक रूप से बिहार नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों की भूमि रहा है, किंतु आधुनिक काल (1813-1947) में यहाँ पाश्चात्य शिक्षा का विकास एक क्रमिक और सुनियोजित संस्थागत प्रक्रिया के तहत हुआ। इस पाश्चात्य शिक्षा ने न केवल राज्य के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को प्रभावित किया, बल्कि एक नए आधुनिक बुद्धिजीवी वर्ग को भी जन्म दिया, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व किया।
बिहार में 1813 से 1947 के मध्य पाश्चात्य शिक्षा के विकास को निम्नलिखित कालखंडों और संस्थागत प्रगति के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है:
आरंभिक चरण और आधारभूत विकास (1813-1854)
इस चरण में पाश्चात्य शिक्षा का स्वरूप अत्यंत सीमित था और इसका संचालन मुख्यतः ईसाई मिशनरियों तथा कुछ व्यक्तिगत प्रयासों तक सीमित रहा।
चार्टर अधिनियम 1813: इस अधिनियम के माध्यम से ब्रिटिश संसद ने पहली बार भारत में शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये का बजटीय प्रावधान किया। यद्यपि इसका प्रभाव बिहार में तुरंत परिलक्षित नहीं हुआ, किंतु इसने राज्य के दायित्व को स्थापित किया।
मैकाले का स्मरण पत्र (1835) एवं अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत (Downward Filtration Theory): लार्ड मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा नीति के परिणामस्वरूप बिहार के पूर्णिया, बिहारशरीफ, भागलपुर और छपरा में प्रारंभिक अंग्रेजी विद्यालयों की स्थापना की गई। सरकार का उद्देश्य केवल उच्च वर्ग को शिक्षित करना था, ताकि शिक्षा छनकर जनसामान्य तक पहुँचे।
मिशनरियों का योगदान: पटना और दानापुर में ईसाई मिशनरियों ने पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार में आरंभिक भूमिका निभाई।
संस्थागत विकास और उच्च शिक्षा का उद्भव (1854-1900)
चार्ल्स वुड का डिस्पैच (1854), जिसे 'भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा' कहा जाता है, ने शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किए। इसके प्रभावस्वरूप बिहार में उच्च और माध्यमिक शिक्षा का व्यवस्थित विकास आरंभ हुआ:
पटना कॉलेज की स्थापना (1863): यह बिहार में पाश्चात्य उच्च शिक्षा का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। इस संस्थान ने आधुनिक बिहार के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले कई राजनेताओं और विचारकों को गढ़ा।
निजी और सामाजिक प्रयास: 19वीं सदी के उत्तरार्ध में स्थानीय जमींदारों और समाज सुधारकों के प्रयास से मुजफ्फरपुर में भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज (1899) (वर्तमान लंगट सिंह महाविद्यालय) और भागलपुर में तेजनारायण जुबली कॉलेज (1887) की स्थापना हुई।
व्यावसायिक शिक्षा का आरंभ: पटना में लॉ (कानून) की कक्षाओं की शुरुआत हुई, जिसने न्यायिक और प्रशासनिक सेवाओं के लिए स्थानीय युवाओं को तैयार किया।
विश्वविद्यालय और तकनीकी शिक्षा का युग (1900-1947)
बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध बिहार में शिक्षा के विविधीकरण और तकनीकी/व्यावसायिक संस्थानों की स्थापना का स्वर्णिम काल रहा।
विश्वविद्यालयी शिक्षा का स्वतंत्र स्वरूप
पटना विश्वविद्यालय (1917): 1917 से पूर्व बिहार के कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन थे। सैडलर आयोग (1917) की सिफारिशों के अनुरूप और नवगठित बिहार प्रांत (1912) की आवश्यकता को देखते हुए 1917 में पटना विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। यह एक स्वतंत्र शैक्षणिक हब बन गया।
विज्ञान, चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा
विज्ञान और कला: विज्ञान के उच्च अध्ययन के लिए साइंस कॉलेज, पटना (1927) की स्थापना की गई।
चिकित्सा शिक्षा: पटना मेडिकल कॉलेज (1925) (तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज) और पटना वेटेरिनरी (पशु चिकित्सा) कॉलेज (1930) की स्थापना से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को आधार मिला।
कृषि और इंजीनियरिंग: कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में पूरे भारत में अग्रणी पूसा कृषि संस्थान (1905) की स्थापना दरभंगा महाराज के सहयोग से समस्तीपुर में हुई। इंजीनियरिंग शिक्षा के लिए बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (1924) (वर्तमान NIT पटना) स्थापित हुआ।
खनन शिक्षा: तत्कालीन अविभाजित बिहार में खनिज संपदा के दोहन और तकनीकी विशेषज्ञता के लिए इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद (1926) की स्थापना की गई।
स्त्री शिक्षा का विकास
स्त्री शिक्षा की गति अपेक्षाकृत धीमी रही, किंतु बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल (1867) और कालांतर में पटना विमेंस कॉलेज (1940) की स्थापना ने महिलाओं के बौद्धिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त किया।
पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव और सीमाएँ
सकारात्मक प्रभाव:
आधुनिक चेतना का उदय: पाश्चात्य शिक्षा (स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के विचार) ने बिहार में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सच्चिदानंद सिन्हा, मौलाना मज़हर-उल-हक़ और जयप्रकाश नारायण जैसे आधुनिक नेताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार की, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और पृथक बिहार (1912) के निर्माण का नेतृत्व किया।
पत्रकारिता का विकास: 'द बिहार हेराल्ड' (1875), 'सर्चलाइट' और 'द मदरलैंड' जैसे समाचार पत्रों ने जन-जागरूकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सीमाएँ (चुनौतियाँ):
यह शिक्षा प्रणाली अत्यधिक अभिजात्यवादी (Elitist) और शहरी-केंद्रित थी, जिससे ग्रामीण जनसामान्य और शोषित वर्ग लंबे समय तक वंचित रहे।
शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण देसी भाषाओं और स्थानीय ज्ञान परंपरा का क्षरण हुआ।
आगे की राह
औपनिवेशिक काल में पाश्चात्य शिक्षा का उद्भव भले ही ब्रिटिश साम्राज्य की प्रशासनिक सुविधा के लिए हुआ हो, किंतु इसी ने बिहार में नवजागरण, राष्ट्रीयता और बौद्धिक चेतना की आधारशिला रखी। स्वतंत्र भारत में शिक्षा का उद्देश्य साम्राज्यवादी सेवा से बदलकर 'लोककल्याण और मानव पूंजी निर्माण' हो चुका है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप बिहार को अपनी शिक्षा प्रणाली में अनुसंधान, कौशल विकास (Skill Development) और स्थानीय भाषाओं को समाहित करते हुए इसे अधिक समावेशी बनाने की आवश्यकता है, ताकि राज्य अपने जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूर्ण उपयोग कर सके।