न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) और न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) में क्या अंतर है? भारतीय लोकतंत्र पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन करें।

 Q. न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) और न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) में क्या अंतर है? भारतीय लोकतंत्र पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन करें।

Ans - 

भूमिका: न्यायपालिका की बदलती भूमिका और शक्तियों का पृथक्करण

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 50 के तहत राज्य की शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत निहित है। एक आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपने-अपने निर्धारित क्षेत्रों में कार्य करते हैं। ऐतिहासिक रूप से, जब विधायिका या कार्यपालिका जनहित के मुद्दों पर उदासीन हो जाती हैं या अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में विफल रहती हैं, तो न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु आगे आती है; इसे न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) कहा जाता है। परंतु, जब यही सक्रियता अपनी संवैधानिक सीमाओं को लांघकर नीति-निर्माण या प्रशासनिक कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप करने लगती है, तो यह न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) में परिवर्तित हो जाती है।

न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिरेक में मूलभूत अंतर

यद्यपि दोनों अवधारणाएं न्यायपालिका की बढ़ी हुई भूमिका को दर्शाती हैं, इनके उद्देश्यों और कार्यप्रणाली में स्पष्ट सैद्धांतिक और व्यावहारिक अंतर है:

1. न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)

  • परिभाषा: यह न्यायपालिका का वह दृष्टिकोण है जिसमें वह संविधान के रक्षक के रूप में मौलिक अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 32 और 226 के तहत) को सुनिश्चित करने के लिए कानूनों की नवीन और उदार व्याख्या करती है।

  • साधन: जनहित याचिका (PIL) इसका सबसे प्रमुख उपकरण है, जिसे न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और वी. आर. कृष्ण अय्यर द्वारा संस्थागत रूप दिया गया।

  • उद्देश्य: इसका मुख्य लक्ष्य विधायी शून्यता (Legislative Vacuum) को भरना, हाशिए पर मौजूद वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना और शासन में पारदर्शिता लाना है।

  • उदाहरण: विशाखा दिशा-निर्देश (कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकना), त्वरित न्याय का अधिकार आदि।

2. न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach)

  • परिभाषा: जब न्यायपालिका कार्यपालिका के प्रशासनिक कार्यों या विधायिका के विशुद्ध नीति-निर्माण के अधिकार क्षेत्र (Domain) में अतिक्रमण करने लगती है, तो उसे न्यायिक अतिरेक माना जाता है।

  • आधार: यह प्रायः अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय का अधिकार) के अत्यधिक या अनुचित प्रयोग के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है।

  • उद्देश्य/प्रकृति: यह शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है, जहाँ न्यायालय उन विषयों पर निर्देश जारी करता है जिनमें उसके पास विशेषज्ञता (Expertise) नहीं होती।

  • उदाहरण: राष्ट्रीय राजमार्गों पर शराब की दुकानों पर प्रतिबंध लगाना, या क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) के प्रशासन को अपने हाथों में लेना।

भारतीय लोकतंत्र पर प्रभाव का मूल्यांकन

न्यायिक सक्रियता और अतिरेक ने भारतीय लोकतांत्रिक ताने-बाने को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है, जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं:

सकारात्मक प्रभाव (सशक्त लोकतंत्र की दिशा में)

  • मौलिक अधिकारों का विस्तार: न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की उदार व्याख्या कर इसमें स्वच्छ पर्यावरण, निजता का अधिकार (के. एस. पुट्टास्वामी मामला), और आजीविका के अधिकार को शामिल कर आम नागरिक के जीवन को गरिमापूर्ण बनाया है।

  • चुनावी सुधार: राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए प्रत्याशियों की आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रकटीकरण और 'नोटा' (NOTA) का विकल्प न्यायिक सक्रियता की ही देन हैं।

  • प्रशासनिक जवाबदेही: 2G स्पेक्ट्रम और कोयला ब्लॉक आवंटन जैसे मामलों में न्यायपालिका की निगरानी ने कार्यपालिका की मनमानी पर अंकुश लगाया है।

नकारात्मक प्रभाव (लोकतांत्रिक ढांचे के समक्ष चुनौतियां)

  • जवाबदेही का संकट: लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुए प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा नहीं होती, अतः नीतिगत विफलता की स्थिति में उनकी कोई सार्वजनिक जवाबदेही नहीं होती।

  • विशेषज्ञता का अभाव: आर्थिक, वैज्ञानिक या कूटनीतिक नीतियों के निर्माण के लिए गहन शोध और प्रशासनिक अनुभव की आवश्यकता होती है, जो न्यायालय के पास उपलब्ध नहीं होता।

  • नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis): कार्यपालिका के दैनिक कार्यों में निरंतर हस्तक्षेप से अधिकारियों का मनोबल गिरता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित होती है।

बिहार के संदर्भ में न्यायिक हस्तक्षेप का प्रभाव

न्यायिक सक्रियता का उद्गम और उसका व्यापक प्रभाव बिहार के ऐतिहासिक और समकालीन परिदृश्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:

  • ऐतिहासिक हुसैनारा खातून मामला (1979), जिसने पूरे देश में 'त्वरित न्याय' को एक मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया, मूल रूप से बिहार की जेलों में वर्षों से बंद विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा पर ही आधारित था।

  • वर्तमान समय में भी, जन स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना और पर्यावरणीय संरक्षण से संबंधित उच्च न्यायालय के निर्देश केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहते। इन न्यायिक आदेशों का अनुपालन पटना और बिहार के सभी जिलों में समान रूप से सुनिश्चित किया जाता है, जो राज्य मशीनरी को अधिक उत्तरदायी और जनोन्मुखी बनाने का कार्य करता है।

निष्कर्ष और आगे की राह

एक परिपक्व लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और सतर्क न्यायपालिका एक अनिवार्य आवश्यकता है, परंतु इसे विधायिका या कार्यपालिका का 'सुपर-चेंबर' नहीं बनना चाहिए। न्यायिक सक्रियता एक 'दवा' के समान है, जिसका उपयोग विधायी शून्यता की स्थिति में जनहित की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए; यदि यह दैनिक 'आहार' बन जाए, तो यह न्यायिक अतिरेक में बदलकर संस्थागत संतुलन को बिगाड़ सकती है।

आगे की राह (Way Forward): न्यायपालिका को 'न्यायिक संयम' (Judicial Restraint) के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। प्रशासनिक और नीतिगत विषयों को जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की सफलता इसी में निहित है कि राज्य के तीनों अंग अपनी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें और एक-दूसरे के प्रति संस्थागत सम्मान (Institutional Respect) बनाए रखते हुए 'सबका साथ, सबका विकास' के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कार्य करें।

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