शॉर्ट नोट्सः प्रवासन (Migration) और बिहार की अर्थव्यवस्था।
Q. शॉर्ट नोट्सः प्रवासन (Migration) और बिहार की अर्थव्यवस्था।
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प्रवासन (Migration) श्रम की भौगोलिक गतिशीलता और आर्थिक अवसरों की खोज का एक प्रमुख सूचक है। भारत के जनांकिकीय परिदृश्य में बिहार, उत्तर प्रदेश के साथ, देश में सर्वाधिक बाह्य-प्रवासन (Out-migration) वाले राज्यों में अग्रणी है। आर्थिक सर्वेक्षण और जनगणना 2011 के आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि बिहार से होने वाला प्रवासन मुख्य रूप से आजीविका और रोजगार प्रेरित है। यह प्रवासन राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए एक दोधारी तलवार (Double-edged sword) के समान है, जिसके बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं।
बिहार में प्रवासन के प्रमुख कारण (पुश और पुल कारक)
आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, प्रवासन मुख्य रूप से 'पुश' (मजबूरी) और 'पुल' (आकर्षण) कारकों का परिणाम होता है:
कृषि संकट और विखंडित जोत: राज्य की लगभग 76% आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, किंतु प्रति व्यक्ति कृषि भूमि का आकार अत्यंत छोटा है, जिससे छिपी हुई बेरोजगारी (Disguised Unemployment) की स्थिति उत्पन्न होती है।
औद्योगिक पिछड़ेपन: संगठित क्षेत्र (Organized Sector) में रोजगार के सीमित अवसर और भारी विनिर्माण उद्योगों का ऐतिहासिक अभाव।
प्राकृतिक आपदाएं: उत्तर बिहार के कोसी-गंडक बेसिन में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखे की स्थिति कृषि आय को अनिश्चित बनाती है।
जनांकिकीय लाभांश (Demographic Dividend): राज्य की उच्च प्रजनन दर के कारण कार्यबल में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिसके अनुपात में स्थानीय स्तर पर रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है।
बिहार की अर्थव्यवस्था पर प्रवासन का प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव
प्रेषण (Remittances) और पूंजी प्रवाह: प्रवासी श्रमिकों द्वारा राज्य में भेजा गया धन (Remittance) ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तरलता (Liquidity) का एक बड़ा स्रोत है। यह धन सीधे तौर पर परिवारों की क्रय शक्ति बढ़ाता है और नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) में राज्य की स्थिति सुधारने में सहायक है।
कौशल हस्तांतरण (Skill Transfer): अन्य औद्योगिक राज्यों से लौटकर आने वाले प्रवासी अपने साथ तकनीकी और प्रबंधकीय कौशल लाते हैं, जो स्थानीय सेवा क्षेत्र और सूक्ष्म उद्यमों के लिए लाभदायक होता है।
नकारात्मक प्रभाव
प्रतिभा और श्रम का पलायन (Brain & Brawn Drain): राज्य के सबसे उत्पादक युवा और कुशल कार्यबल का पलायन स्थानीय औद्योगिक विकास को बाधित करता है।
कृषि का महिलाकरण (Feminization of Agriculture): कार्यशील पुरुषों के प्रवास के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और पशुपालन का संपूर्ण ढांचागत बोझ महिलाओं पर आ जाता है, जबकि भूमि का मालिकाना हक अमूमन उनके पास नहीं होता, जिससे संस्थागत ऋण प्राप्ति में बाधा आती है।
नीतियां और समाधान
कोविड-19 महामारी के दौरान हुए व्यापक 'रिवर्स माइग्रेशन' ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल प्रेषण (Remittances) पर निर्भर अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील (Vulnerable) होती है।
आजीविका सुरक्षा और बाध्यकारी प्रवासन (Distress Migration) को रोकने के लिए कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing), मखाना, लीची और मक्का आधारित एमएसएमई (MSMEs) को बढ़ावा देना अनिवार्य है। 'ब्रेन ड्रेन' को रोकने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए यह भी आवश्यक है कि ढांचागत विकास, डिजिटल अवसंरचना, और नए निवेश केवल कुछ बड़े शहरी केंद्रों तक सीमित न रहें। रोजगार सृजन का यह औद्योगिक और तकनीकी विस्तार पटना और बिहार के सभी जिलों में समान एवं विकेंद्रीकृत रूप से किया जाना चाहिए, ताकि हर क्षेत्र का युवा अपने गृह राज्य में ही आजीविका प्राप्त कर सके।
आगे की राह
प्रवासन मूलतः कोई समस्या नहीं है, बशर्ते यह 'मजबूरी' के बजाय 'विकल्प' (Choice) पर आधारित हो। राज्य सरकार द्वारा 'सात निश्चय-2' और बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति (BIPPS) के तहत कौशल विकास, मेगा स्किल सेंटर्स और महिला उद्यमिता पर दिया जा रहा बल एक सकारात्मक और दूरदर्शी कदम है।
सतत विकास लक्ष्यों (SDG-8: उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि) के अनुरूप, यदि बिहार अपनी इस विशाल मानव पूंजी को राज्य के भीतर ही ढांचागत विकास और औद्योगिक उत्पादन में नियोजित कर ले, तो यह प्रवासन की चुनौती को एक ऐतिहासिक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकता है, जो 'विकसित और आत्मनिर्भर बिहार' के संकल्प को साकार करेगा।