शॉर्ट नोट्सः समान नागरिक संहिता (UCC) पर अनुच्छेद 44।
Q. शॉर्ट नोट्सः समान नागरिक संहिता (UCC) पर अनुच्छेद 44।
Ans -
भारतीय संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व - DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद 44 यह उद्घोषणा करता है कि "राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।" UCC का मूल अर्थ विवाह, तलाक, भरण-पोषण, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों (Personal matters) में सभी नागरिकों—चाहे उनका धर्म कुछ भी हो—के लिए एकसमान कानूनों का लागू होना है। हाल ही में उत्तराखंड द्वारा UCC विधेयक पारित किए जाने और 22वें विधि आयोग द्वारा इस विषय पर जनमत मांगने के कारण यह मुद्दा समकालीन प्रशासनिक और विधिक विमर्श के केंद्र में है।
समान नागरिक संहिता (UCC) की आवश्यकता
भारत में दांडिक (Criminal) और वाणिज्यिक (Commercial) कानून लगभग समान हैं, परंतु व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) धर्म और आस्था पर आधारित हैं। UCC की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से प्रासंगिक है:
1. लैंगिक न्याय और समानता की स्थापना
वर्तमान में अधिकांश व्यक्तिगत कानून (चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम) पितृसत्तात्मक (Patriarchal) स्वरूप लिए हुए हैं। UCC लागू होने से महिलाओं को विवाह, तलाक और पैतृक संपत्ति में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो वाद (1985), सरला मुदगल वाद (1995) और सायरा बानो (तीन तलाक) वाद (2017) में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु निरंतर एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया है।
2. वास्तविक धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकीकरण
संविधान निर्माता डॉ. बी. आर. अंबेडकर और के. एम. मुंशी का मानना था कि धर्म को व्यक्तिगत कानूनों से अलग करना एक धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के लिए अपरिहार्य है।
एक देश, एक कानून की अवधारणा अलगाववादी प्रवृत्तियों को कम कर राष्ट्रीय एकता (National Integration) को सुदृढ़ करेगी।
बिहार के विशेष संदर्भ में UCC का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
बिहार जैसे जनसांख्यिकीय रूप से विविध और बहुलवादी राज्य में UCC के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:
महिला सशक्तिकरण का विधिक विस्तार: बिहार सरकार की नीतियों (जैसे- पंचायतों में 50% महिला आरक्षण, मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना) का मुख्य लक्ष्य लैंगिक समानता है। UCC लागू होने से ग्रामीण बिहार की महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार में एकसमान कानूनी सुरक्षा (Legal Safety Net) प्राप्त होगी, जो उनके आर्थिक सशक्तिकरण को नई दिशा प्रदान करेगा।
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: बिहार के दूरदराज के क्षेत्रों में अभी भी बाल विवाह या बहुविवाह जैसी प्रथाएं (विभिन्न समुदायों में) अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में पनपती हैं। एक समान कानून प्रशासन (Administration) और न्यायपालिका को इन कुरीतियों के विरुद्ध कठोर और एकरूप कार्रवाई करने में सक्षम बनाएगा।
UCC के समक्ष प्रमुख चुनौतियां
UCC को लागू करने में कई संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक जटिलताएं विद्यमान हैं:
1. मौलिक अधिकारों में अंतर्निहित टकराव
मुख्य विवाद अनुच्छेद 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता और अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) तथा अनुच्छेद 14 और 21 (समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) के मध्य वैचारिक टकराव का है। अल्पसंख्यक समुदायों को यह आशंका है कि बहुसंख्यक वर्ग के कानून उन पर थोपे जा सकते हैं।
2. भारतीय समाज की विविधता
भारत में केवल विभिन्न धर्मों के बीच ही नहीं, बल्कि एक ही धर्म (जैसे हिंदुओं में उत्तर और दक्षिण भारत की वैवाहिक प्रथाएं, या पूर्वोत्तर की जनजातीय प्रथाएं) के भीतर भी भारी विविधता है। संविधान की छठी अनुसूची और अनुच्छेद 371 (A-I) जनजातियों को उनके प्रथागत कानूनों (Customary Laws) के संरक्षण की विशेष गारंटी देते हैं, जिससे एक राष्ट्रव्यापी एकरूपता स्थापित करना कठिन हो जाता है।
3. विधि आयोग का दृष्टिकोण
21वें विधि आयोग (2018) ने अपने परामर्श पत्र में स्पष्ट किया था कि "समान नागरिक संहिता इस स्तर पर न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय (Neither necessary nor desirable at this stage)।" आयोग ने इसके बजाय सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और उन्हें संहिताबद्ध करने की वकालत की थी।
आगे की राह
संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि UCC वांच्छनीय है, परंतु इसे आरंभ में स्वैच्छिक रखा जाना चाहिए। आज के परिदृश्य में एक आदर्श दृष्टिकोण यह होगा कि राज्य 'कट्टर एकरूपता' (Rigid Uniformity) के बजाय 'लैंगिक न्याय और मानवाधिकारों' को प्राथमिकता दे।
UCC को किसी एक धर्म के कानूनों को दूसरे पर थोपने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि नीति आयोग और विधि आयोग के नेतृत्व में सभी हितधारकों, धार्मिक नेताओं और नागरिक समाज के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर एक 'प्रगतिशील संहिता' (Progressive Code) का मसौदा तैयार किया जाए, जो भारत की बहुलवादी संस्कृति का सम्मान करते हुए संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) की कसौटी पर खरा उतरे।