शॉर्ट नोट्सः अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण और इसके प्रभाव।

 Q. शॉर्ट नोट्सः अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण और इसके प्रभाव।

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भारतीय संविधान के भाग XXI में शामिल अनुच्छेद 370 दशकों तक जम्मू और कश्मीर को विशेष स्वायत्तता (Special Status) प्रदान करता था। 5 अगस्त 2019 को, भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी 'संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश, 2019' तथा संसद द्वारा पारित 'जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019' के माध्यम से इस विशेष दर्जे को निष्प्रभावी कर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर (विधानसभा के साथ) और लद्दाख (बिना विधानसभा)—में विभाजित कर दिया गया। यह निर्णय भारत के 'एक राष्ट्र, एक संविधान' (One Nation, One Constitution) के लक्ष्य की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

संवैधानिक प्रक्रिया और सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

इस जटिल संवैधानिक बदलाव को अनुच्छेद 367 (व्याख्या खंड) के माध्यम से 'संविधान सभा' के स्थान पर 'विधानसभा' शब्द को प्रतिस्थापित करके किया गया था।

  • ऐतिहासिक न्यायिक मुहर: दिसंबर 2023 में, सर्वोच्च न्यायालय की 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से इस निरस्तीकरण की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 370 केवल एक 'अस्थायी प्रावधान' (Temporary Provision) था और जम्मू-कश्मीर के पास भारत में विलय के बाद कोई अवशिष्ट संप्रभुता (Residual Sovereignty) नहीं थी।

निरस्तीकरण के बहुआयामी प्रभाव

अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A की समाप्ति ने जम्मू-कश्मीर के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में गहरे और दूरगामी परिवर्तन किए हैं:

1. विधिक और राजनीतिक एकीकरण

  • केंद्रीय कानूनों का सीधा अनुप्रयोग: पहले जो कानून वहां लागू नहीं होते थे, अब सूचना का अधिकार (RTI) 2005, शिक्षा का अधिकार (RTE) 2009 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित सभी 100+ केंद्रीय कानून पूर्णतः लागू हो गए हैं।

  • लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण: पहली बार राज्य में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप त्रि-स्तरीय पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और जिला विकास परिषदों (DDC) का सफल गठन और चुनाव संपन्न हुआ है।

2. सामाजिक न्याय और समानता की स्थापना

  • वंचित वर्गों का सशक्तिकरण: अनुच्छेद 35A के हटने से दशकों से भेदभाव का शिकार रहे पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों, वाल्मीकि समुदाय और गोरखाओं को निवास प्रमाण पत्र (Domicile), मतदान और रोजगार का समान अधिकार प्राप्त हुआ है।

  • लैंगिक समानता: अब जम्मू-कश्मीर की महिलाओं को राज्य के बाहर विवाह करने पर भी पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

3. आर्थिक विकास और सुरक्षा परिदृश्य

  • आतंकवाद पर प्रहार: गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पत्थरबाजी (Stone-pelting) और संगठित अलगाववादी गतिविधियों में भारी गिरावट आई है।

  • निवेश और पर्यटन: वैश्विक निवेश को बढ़ावा मिला है। 2023 में श्रीनगर में G20 पर्यटन कार्य समूह की सफल बैठक और प्रतिवर्ष 2 करोड़ से अधिक पर्यटकों का आगमन राज्य में लौटती सामान्य स्थिति (Normalcy) का प्रमाण है।

वर्तमान चुनौतियां और बिहार का संदर्भ

सकारात्मक परिणामों के बावजूद, इस परिवर्तन के मार्ग में कुछ गंभीर चुनौतियां अभी भी विद्यमान हैं, जिनका सीधा प्रभाव बिहार जैसे राज्यों पर भी पड़ता है:

  • लक्षित हत्याएं (Targeted Killings) और बिहार के श्रमिक: अनुच्छेद 370 हटने के पश्चात, कश्मीर घाटी में बुनियादी ढांचे के निर्माण और कृषि क्षेत्र में कार्यरत प्रवासी मजदूरों (विशेषकर बिहार के असंगठित कामगारों) पर आतंकी हमले एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं। बिहार के श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खुफिया तंत्र (Intelligence Grid) को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

  • लोकतांत्रिक शून्यता (Democratic Deficit): लंबे समय तक केंद्र का सीधा शासन रहने से स्थानीय जनता में प्रशासनिक अलगाव (Alienation) की भावना उत्पन्न हो सकती है।

आगे की राह

अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण राष्ट्रीय अखंडता के दृष्टिकोण से एक साहसिक और आवश्यक नीतिगत निर्णय था। अब नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता घाटी के लोगों के साथ 'दिल की दूरी' कम करने पर होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप पारदर्शी विधानसभा चुनावों का आयोजन और उचित समय पर राज्य का दर्जा (Statehood) बहाल करना अति आवश्यक है। तभी जम्मू और कश्मीर के नागरिक सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की मुख्यधारा में शामिल होकर विकसित भारत के निर्माण में अपना पूर्ण योगदान दे सकेंगे।

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