सिविल सेवाओं की भारतीय लोकतंत्र में क्या भूमिका है? 'लेटरल एंट्री' (Lateral Entry) के पक्ष और विपक्ष में तर्क दें।

 Q. सिविल सेवाओं की भारतीय लोकतंत्र में क्या भूमिका है? 'लेटरल एंट्री' (Lateral Entry) के पक्ष और विपक्ष में तर्क दें।

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सरदार वल्लभभाई पटेल ने ऐतिहासिक रूप से भारतीय सिविल सेवा को देश का 'इस्पाती ढांचा' (Steel Frame) करार दिया था। भारतीय संविधान के भाग XIV (अनुच्छेद 308-323) के तहत स्थापित यह प्रशासनिक तंत्र, लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार और आम नागरिक के मध्य का सबसे महत्वपूर्ण सेतु है। बदलते वैश्विक परिदृश्य और सुशासन (Good Governance) की बढ़ती मांगों के बीच, नौकरशाही को अधिक उत्तरदायी और विशेषज्ञता-पूर्ण बनाने के लिए नीति आयोग और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) द्वारा 'लेटरल एंट्री' (पार्श्व प्रवेश) की अनुशंसा की गई है, जो वर्तमान प्रशासनिक विमर्श का केंद्र बिंदु है।

भारतीय लोकतंत्र में सिविल सेवाओं की भूमिका

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सिविल सेवकों की भूमिका केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बहुआयामी है:

  • नीति-निर्माण और कार्यान्वयन: मंत्रीगण जहां राजनीतिक दृष्टि और जनादेश का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं सिविल सेवक अपने तकनीकी और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर नीतियों का मसौदा तैयार करते हैं और उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करते हैं।

  • निरंतरता और स्थिरता (Continuity and Stability): सरकारों के परिवर्तन (राजनीतिक अस्थिरता) के दौरान भी प्रशासन का चक्र अबाध रूप से चलता रहता है। यह नौकरशाही की संस्थागत स्मृति (Institutional Memory) के कारण ही संभव है।

  • राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration): अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाएं (All India Services) केंद्र और राज्यों के मध्य एक प्रशासनिक कड़ी के रूप में कार्य करती हैं, जो भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) को शक्ति प्रदान करती हैं।

  • कल्याणकारी राज्य की स्थापना: नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के लक्ष्यों को प्राप्त करने और गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य तथा शिक्षा संबंधी योजनाओं (जैसे- आयुष्मान भारत, मनरेगा) को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का दायित्व इसी तंत्र पर है।

लेटरल एंट्री (Lateral Entry): अवधारणा और आवश्यकता

लेटरल एंट्री से तात्पर्य संयुक्त सचिव, निदेशक या उप-सचिव स्तर पर निजी क्षेत्र, शिक्षाविदों या सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) से सीधे विशेषज्ञों की नियुक्ति से है, जो पारंपरिक सिविल सेवा परीक्षा (UPSC) के मार्ग से नहीं आते।

लेटरल एंट्री के पक्ष में तर्क (सकारात्मक पहलू)

  • विशिष्ट डोमेन विशेषज्ञता (Domain Expertise): 21वीं सदी का प्रशासन अत्यंत जटिल है। साइबर सुरक्षा, फिनटेक (FinTech), जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे क्षेत्रों में सामान्यज्ञों (Generalists) के स्थान पर विशेषज्ञों (Specialists) की तत्काल आवश्यकता है।

  • अधिकारियों की कमी की पूर्ति: बास्वान समिति (Baswan Committee) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रशासनिक अधिकारियों की भारी कमी है। लेटरल एंट्री इस रिक्ति को पाटने का एक त्वरित माध्यम है।

  • प्रतिस्पर्धा और कार्य-संस्कृति में सुधार: निजी क्षेत्र से आए पेशेवर अपने साथ कॉर्पोरेट दक्षता, लक्ष्य-उन्मुख दृष्टिकोण (Target-oriented approach) और नवाचार लाते हैं, जो पारंपरिक नौकरशाही की 'लाल फीताशाही' (Red-tapism) को चुनौती देता है।

लेटरल एंट्री के विपक्ष में तर्क और चुनौतियां

  • सामाजिक न्याय और आरक्षण नीति की अनदेखी: लेटरल एंट्री का सबसे बड़ा आलोचनात्मक पहलू यह है कि इसमें अनुच्छेद 16(4) के तहत प्रदत्त आरक्षण (SC/ST/OBC/EWS) के प्रावधानों को लागू करना तकनीकी रूप से कठिन हो जाता है, क्योंकि ये नियुक्तियां प्रायः 'सिंगल पोस्ट कैडर' के रूप में होती हैं।

  • जमीनी अनुभव का पूर्ण अभाव: एक पारंपरिक IAS/BPSC अधिकारी अपने करियर के आरंभिक दशकों में उप-मंडल (SDM) और जिला (DM) स्तर पर कार्य करते हुए ग्रामीण भारत की जिस कठोर वास्तविकता और सामाजिक गतिशीलता को समझता है, वह वातानुकूलित कॉर्पोरेट कार्यालयों से आए विशेषज्ञों में नहीं होती।

  • 'स्पॉइल्स सिस्टम' (Spoils System) का भय: चयन प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता न होने पर यह व्यवस्था राजनीतिक संरक्षण और भाई-भतीजावाद (Nepotism) का शिकार हो सकती है, जिससे नौकरशाही की राजनीतिक तटस्थता (Political Neutrality) समाप्त हो जाएगी।

  • संस्थागत टकराव: बाहर से आए विशेषज्ञों और प्रणाली के भीतर पदोन्नत हुए अधिकारियों के मध्य वैचारिक और कार्यप्रणालीगत टकराव (Friction) की प्रबल संभावना रहती है।

बिहार के विकास के संदर्भ में प्रासंगिकता

बिहार की जनसांख्यिकीय और भौगोलिक वास्तविकताओं को देखते हुए कुशल प्रशासनिक तंत्र अपरिहार्य है:

  • समान प्रशासनिक दक्षता की आवश्यकता: राज्य के समेकित विकास के लिए यह आवश्यक है कि केवल राजधानी तक नीतियां सीमित न रहें, बल्कि पटना और बिहार के सभी जिलों में ढांचागत परियोजनाओं (जैसे- कृषि रोड मैप, सात निश्चय योजना-2) का कार्यान्वयन समान दक्षता के साथ हो।

  • विशेषज्ञता आधारित विकास: बिहार में बाढ़ प्रबंधन (कोसी-गंडक बेसिन), कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्रों को विकसित करने के लिए राज्य स्तरीय आयोगों और बोर्डों में सीमित और पारदर्शी लेटरल एंट्री लाभदायक सिद्ध हो सकती है, जो स्थानीय अधिकारियों के जमीनी अनुभव के साथ मिलकर कार्य करे।

आगे की राह

प्रशासनिक सुधार समय की मांग है। सिविल सेवाओं को 'जनरल' (General) से 'स्पेशलाइज्ड' (Specialized) बनाने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा:

  • पारदर्शी चयन तंत्र: चयन प्रक्रिया पूर्णतः UPSC या BPSC जैसी संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से एक पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ मानदंड पर आधारित होनी चाहिए।

  • सामाजिक न्याय का समावेश: नियुक्तियों को इस प्रकार क्लस्टर या समूह में किया जाना चाहिए ताकि रोस्टर प्रणाली (Roster System) और आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों का पूर्णतः पालन किया जा सके।

  • आंतरिक विशेषज्ञता का विकास: लेटरल एंट्री पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय, वर्तमान अधिकारियों को ही मिड-करियर ट्रेनिंग और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से फेलोशिप के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

भारतीय सिविल सेवा को अब केवल एक 'विशिष्ट वर्ग' के रूप में नहीं, बल्कि एक परिणाम-उन्मुख (Result-oriented) संस्था के रूप में कार्य करना होगा। पारंपरिक प्रशासनिक अनुभव और बाहरी डोमेन विशेषज्ञता का संतुलित समन्वय ही 'न्यू इंडिया' और 'विकसित बिहार' की प्रशासनिक आधारशिला रख सकता है।

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