दबाव समूहों (Pressure Groups) की भारतीय राजनीति में भूमिका और उनके काम करने के तरीकों की विवेचना करें।

 Q. दबाव समूहों (Pressure Groups) की भारतीय राजनीति में भूमिका और उनके काम करने के तरीकों की विवेचना करें।

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लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में दबाव समूह (Pressure Groups) ऐसे संगठित हित-समूह होते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से चुनाव नहीं लड़ते और न ही राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करने की आकांक्षा रखते हैं। इसके विपरीत, उनका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक नीतियों, विधायिका और प्रशासनिक निर्णयों को अपने सदस्यों के हितों के अनुकूल प्रभावित करना होता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) (संगठन या संघ बनाने की स्वतंत्रता) इन समूहों के अस्तित्व और कार्यप्रणाली को एक सुदृढ़ संवैधानिक आधार प्रदान करता है। एक परिपक्व होते लोकतंत्र में ये सहभागी शासन (Participatory Governance) के अपरिहार्य अंग बन चुके हैं।

दबाव समूहों के काम करने के तरीके (Methodology)

दबाव समूह अपनी मांगों को मनवाने के लिए विभिन्न पारंपरिक और आधुनिक साधनों का प्रयोग करते हैं:

  • लॉबिंग (Lobbying) और अनुनय: नीति-निर्माताओं, सांसदों और शीर्ष नौकरशाहों के साथ निरंतर संवाद स्थापित कर अनुकूल नीतियां बनवाना। (उदा: औद्योगिक और व्यापारिक समूहों द्वारा बजट पूर्व चर्चा)।

  • जन-आंदोलन और प्रदर्शन: हड़ताल, घेराव, सविनय अवज्ञा और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से जनमत (Public Opinion) तैयार करना और सरकार पर नैतिक दबाव बनाना।

  • न्यायिक सक्रियता का उपयोग: अनुच्छेद 32 और 226 के तहत जनहित याचिकाओं (PIL) का उपयोग कर अपने हितों की रक्षा करना, विशेषकर पर्यावरण और मानवाधिकार समूहों द्वारा।

  • चुनावी राजनीति में अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप: मतदान के रुझान को प्रभावित करना, अपने समर्थकों को लामबंद करना और राजनीतिक दलों का चुनाव-वित्तपोषण (Election Funding) करना।

भारतीय राजनीति में दबाव समूहों की भूमिका

भारतीय परिदृश्य में दबाव समूहों ने नीति-निर्माण और सत्ता-नियंत्रण में बहुआयामी भूमिका निभाई है:

  • हितों का समूहन (Interest Aggregation): समाज के हाशिए पर स्थित या विशिष्ट वर्गों (जैसे- मजदूर, किसान, छात्र, महिलाएं) की असंगठित मांगों को एक स्पष्ट रूप देकर सरकार तक पहुंचाना।

  • नीति-निर्माण में तकनीकी विशेषज्ञता: फिक्की (FICCI), CII और एसोचैम (ASSOCHAM) जैसे व्यापारिक समूह आर्थिक नीतियों और औद्योगिक सुधारों में सरकार को महत्वपूर्ण विशेषज्ञता प्रदान करते हैं।

  • सत्ता पर नियंत्रण और संतुलन: निरंकुश प्रशासनिक निर्णयों का विरोध कर लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करना। मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) के निरंतर दबाव ने ही सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की नींव रखी।

बिहार के परिप्रेक्ष्य में दबाव समूहों का प्रभाव

बिहार की राजनीतिक-सामाजिक भूमि पर दबाव समूहों का ऐतिहासिक और समकालीन प्रभाव अत्यंत गहरा रहा है:

  • छात्र राजनीति और जन-आंदोलन: 1974 का 'जेपी आंदोलन' (संपूर्ण क्रांति), जो पटना विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों के विरोध-प्रदर्शन से प्रारंभ हुआ था, उसने न केवल राज्य बल्कि संपूर्ण भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। यह छात्र दबाव समूहों की शक्ति का चरमोत्कर्ष था।

  • कृषक एवं खेतिहर मजदूर संघ: स्वामी सहजानंद सरस्वती की अखिल भारतीय किसान सभा की ऐतिहासिक विरासत के प्रभाव में आज भी राज्य में किसान संगठन भूमि सुधार, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और कृषि नीतियों को प्रभावित करते हैं।

  • शिक्षक और कर्मचारी संघ: हाल के वर्षों में नियोजित शिक्षक संघों के निरंतर और संगठित दबाव के परिणामस्वरूप ही बिहार सरकार को 'राज्यकर्मी का दर्जा' देने और BPSC के माध्यम से शिक्षकों की नियुक्ति की पारदर्शी नीति लानी पड़ी, जिसने राज्य के शैक्षिक प्रशासन को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।

  • जातिगत और सामाजिक मंच: विभिन्न जाति-आधारित संगठन राज्य में राजनीतिक दलों के टिकट वितरण, आरक्षण नीतियों और कल्याणकारी योजनाओं की दिशा तय करने में एक अनौपचारिक लेकिन शक्तिशाली दबाव समूह की तरह कार्य करते हैं।

दबाव समूहों से संबंधित चुनौतियां

सकारात्मक भूमिका के बावजूद, इनकी कार्यप्रणाली में कई विसंगतियां दृष्टिगोचर होती हैं:

  • राष्ट्रीय हित बनाम संकुचित हित: कई बार ये समूह व्यापक राष्ट्रीय हित के बजाय केवल अपने वर्ग, जाति या क्षेत्र के क्षुद्र हितों को ही सर्वोपरि रखते हैं।

  • असंवैधानिक साधनों का प्रयोग: हिंसक प्रदर्शनों, चक्का-जाम और बंद के माध्यम से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और अर्थव्यवस्था को बाधित करना।

  • विदेशी वित्तपोषण का दुरुपयोग: खुफिया ब्यूरो (IB) की रिपोर्टों के अनुसार, कुछ गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा FCRA नियमों का उल्लंघन कर विदेशी वित्तपोषण के माध्यम से देश की महत्वपूर्ण विकासात्मक और ढांचागत परियोजनाओं को बाधित करने का प्रयास किया गया है।

आगे की राह

दबाव समूह एक जीवंत लोकतंत्र के 'सुरक्षा वाल्व' (Safety Valve) के रूप में कार्य करते हैं। इनकी नकारात्मक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने और सकारात्मक क्षमता का दोहन करने के लिए संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है। पश्चिमी देशों की तर्ज पर भारत में भी लॉबिंग को कानूनी और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि पर्दे के पीछे होने वाले भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके। साथ ही, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की अनुशंसाओं के अनुरूप नागरिक समाज संगठनों (CSOs) की कार्यप्रणाली और वित्तपोषण में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिससे वे बिना किसी अनुचित प्रभाव के सहभागी शासन को सुदृढ़ कर सकें।

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