गठबंधन की राजनीति (Coalition Politics) के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं का भारत और बिहार के संदर्भ में मूल्यांकन करें।

 Q. गठबंधन की राजनीति (Coalition Politics) के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं का भारत और बिहार के संदर्भ में मूल्यांकन करें।

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भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में गठबंधन की राजनीति (Coalition Politics) एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिघटना है, जिसने केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर शासन की प्रकृति को मौलिक रूप से परिवर्तित किया है। राजनीतिक विज्ञानी रजनी कोठारी द्वारा वर्णित 'एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली' (कांग्रेस प्रणाली) के अवसान के पश्चात्, 1989 (केंद्र में) और 1990 के दशक (बिहार में) से गठबंधन सरकारों का युग ठोस रूप से स्थापित हुआ। यह बहुलवादी भारतीय समाज की विविधता का राजनीतिक प्रकटीकरण है, जिसके बहुआयामी प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं।

गठबंधन राजनीति के सकारात्मक पहलू

गठबंधन सरकारों ने भारतीय राजनीति के लोकतंत्रीकरण और शक्तियों के विकेंद्रीकरण में निम्नलिखित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है:

1. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सशक्त प्रतिनिधित्व

  • राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: गठबंधन सरकारों के कारण क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय पटल पर नीति-निर्माण में भागीदारी का अवसर मिला। इससे केंद्र सरकार की नीतियों में क्षेत्रीय विकास और विविधता को उचित स्थान प्राप्त हुआ।

  • बिहार का संदर्भ: 1990 के दशक में 'मंडल आयोग' की सिफारिशों के लागू होने के पश्चात, बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति का उदय हुआ। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रीय दलों (जैसे- राजद, जदयू, लोजपा आदि) का प्रभाव बढ़ा। इन गठबंधनों ने पिछड़े, दलित और अति-पिछड़े वर्गों (EBCs) को सत्ता संरचना में प्रत्यक्ष भागीदारी प्रदान की।

2. सत्ता के एकाधिकार पर अंकुश

  • किसी एक दल को पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में सत्तावादी और एकतरफा निर्णयों (Authoritarianism) पर स्वाभाविक रूप से रोक लगती है।

  • सहयोगियों के दबाव के कारण सरकारें मनमाने ढंग से अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग करने से बचती हैं, जिससे सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बल मिलता है।

3. सर्वसमावेशी नीतियों का निर्माण

  • गठबंधन सरकारें न्यूनतम साझा कार्यक्रम (Common Minimum Programme - CMP) के आधार पर कार्य करती हैं। इससे नीतियों में अतिवाद के बजाय मध्यमार्ग और आम सहमति (Consensus) को प्राथमिकता मिलती है।

गठबंधन राजनीति के नकारात्मक पहलू और चुनौतियां

इसके विपरीत, अवसरवादी गठबंधनों ने शासन की स्थिरता और गुणवत्ता के समक्ष गंभीर चुनौतियां भी उत्पन्न की हैं:

1. राजनीतिक अस्थिरता और नीतिगत लकवा (Policy Paralysis)

  • राष्ट्रीय अनुभव: 1996 से 1999 के मध्य केंद्र में लगातार सरकारों के पतन ने आर्थिक निर्णयों और विदेशी निवेश को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। सहयोगी दलों के अनुचित दबाव के कारण कड़े आर्थिक सुधारों को लागू करने में कठिनाई होती है।

  • बिहार का अनुभव: बिहार में पिछले एक दशक में राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार गठबंधन बदलने (राजग से महागठबंधन और पुनः वापसी) की प्रवृत्ति देखी गई है। सरकार के स्वरूप में इस निरंतर परिवर्तन से नौकरशाही की स्थिरता बाधित होती है और 'सात निश्चय' जैसी दीर्घकालिक विकासात्मक परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति प्रभावित होती है।

2. अवसरवादिता और दल-बदल (Horse-Trading)

  • गठबंधन में सत्ता प्राप्ति के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता (Ideological Commitment) को त्याग कर अक्सर बेमेल गठबंधन बनाए जाते हैं।

  • यद्यपि 52वें संविधान संशोधन (10वीं अनुसूची) के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया था, परंतु छोटे दलों के विलय और विभाजन के नाम पर अभी भी राजनीतिक सौदेबाजी देखने को मिलती है।

3. राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय हितों का टकराव

  • कई बार क्षेत्रीय दल संकीर्ण वोट-बैंक की राजनीति के कारण विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा या अंतर-राज्यीय जल विवादों (जैसे कावेरी जल विवाद) पर राष्ट्रीय हितों को बाधित करते हैं।

आगे की राह और संस्थागत सुधार

गठबंधन की राजनीति एक लोकतांत्रिक यथार्थ है, इसे सुशासन के अनुकूल बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं:

  • पुंछी आयोग की अनुशंसा: चुनाव-पूर्व गठबंधनों को एक 'एकल राजनीतिक इकाई' (Single Political Entity) माना जाना चाहिए और चुनाव पश्चात के गठबंधनों की तुलना में इन्हें सरकार बनाने के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

  • दल-बदल कानून को कठोर बनाना: दिनेश गोस्वामी समिति की सिफारिशों के अनुरूप, अयोग्य ठहराने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के बजाय निर्वाचन आयोग की सलाह पर राज्यपाल/राष्ट्रपति को दिया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।

  • न्यूनतम साझा कार्यक्रम को कानूनी आधार: चुनाव पूर्व घोषित न्यूनतम साझा कार्यक्रम को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए ताकि जनता के जनादेश के साथ धोखा न हो।

गठबंधन सरकारें अपने आप में न तो अच्छी हैं और न ही बुरी; उनकी सफलता राजनीतिक परिपक्वता और संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) पर निर्भर करती है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) के अनुसार, जब गठबंधन का आधार सत्ता-लोलुपता के बजाय सुशासन और विकास होता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को अधिक समावेशी और गहरा बनाता है।

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