सोशल मीडियाः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मंच या फेक न्यूज़ और नफरत का हथियार ?

 Q. सोशल मीडियाः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मंच या फेक न्यूज़ और नफरत का हथियार ?

Ans - 

विश्व आर्थिक मंच (WEF) की 'वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2024' (Global Risks Report) में भ्रामक सूचना (Misinformation) और दुष्प्रचार (Disinformation) को विश्व के शीर्ष अल्पकालिक जोखिमों में वर्गीकृत किया गया है। डिजिटल क्रांति के वर्तमान युग में सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव एक दोधारी तलवार के रूप में हुआ है। एक ओर यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' को अभूतपूर्व विस्तार देकर लोकतंत्र को जीवंत बनाता है, तो दूसरी ओर यह 'इन्फोडेमिक' (Infodemic) और सामाजिक ध्रुवीकरण का सबसे मारक अस्त्र बन चुका है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्रीकरण का सशक्त मंच

सोशल मीडिया ने सूचना के एकाधिकार को समाप्त कर एक बहु-आयामी विमर्श की नींव रखी है:

  • राजनीतिक जवाबदेही और जन-आंदोलन: 'अरब स्प्रिंग' (Arab Spring) से लेकर भारत में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तक, सोशल मीडिया ने हाशिए के नागरिकों को सत्ता से सीधे प्रश्न पूछने का मंच प्रदान किया है।

  • प्रशासनिक सुलभता (Good Governance): ई-गवर्नेंस के तहत 'माईगव' (MyGov) और विभिन्न पुलिस/प्रशासनिक विभागों द्वारा ट्विटर (X) जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग कर त्वरित जन-शिकायत निवारण (Grievance Redressal) सुनिश्चित किया जा रहा है।

  • सामाजिक समावेश और जन-पत्रकारिता (Citizen Journalism): मुख्यधारा के मीडिया से छूटे हुए मुद्दों और हाशिए के वर्गों के अधिकारों (जैसे- #MeToo अभियान) को वैश्विक पटल पर लाने में इसने उत्प्रेरक का कार्य किया है।

भ्रामक सूचना और घृणास्पद भाषण के हथियार के रूप में (PESTLE विश्लेषण)

नियामक शून्यता और एल्गोरिदम के दुरुपयोग ने इसके नकारात्मक स्वरूप को अत्यंत विकराल कर दिया है:

  • आंतरिक सुरक्षा एवं सामाजिक आयाम (Internal Security & Social): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट में 'साइबर आतंकवाद' और डिजिटल माध्यमों से फैलाई जाने वाली भ्रामक सूचनाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना है। अफवाहों के कारण मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) और सांप्रदायिक दंगों का प्रसार इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

  • राजनीतिक और विधिक आयाम (Political & Legal): 'कैम्ब्रिज एनालिटिका' (Cambridge Analytica) जैसे मामलों ने स्पष्ट किया है कि कैसे माइक्रो-टार्गेटिंग (Micro-targeting) के माध्यम से मतदाता व्यवहार को हेरफेर कर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों (अनुच्छेद 324) को प्रभावित किया जाता है। सीमा-विहीन (Border-less) प्रकृति के कारण इन प्लेटफॉर्म्स को राष्ट्रीय विधिक अधिकार क्षेत्र में लाना एक बड़ी चुनौती है।

  • तकनीकी आयाम (Technological): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) समर्थित डीपफेक (Deepfake) और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं को कट्टरपंथी विचारों की ओर धकेलते हैं। ये 'इको चैंबर्स' (Echo Chambers) और 'फिल्टर बबल' (Filter Bubbles) का निर्माण करते हैं, जहाँ व्यक्ति केवल अपने पूर्वाग्रहों की ही पुष्टि करता है।

  • आर्थिक आयाम (Economic): 'निगरानी पूंजीवाद' (Surveillance Capitalism) के तहत बिग टेक (Big Tech) कंपनियों का वित्तीय मॉडल उपयोगकर्ता के 'ध्यान' (Attention) पर केंद्रित है। यह मॉडल जानबूझकर सनसनीखेज, भ्रामक और नफरत भरे कंटेंट को बढ़ावा देता है क्योंकि इससे प्लेटफॉर्म पर 'एंगेजमेंट' बढ़ता है।

विनियामक एवं संस्थागत चुनौतियां

  • न्यायिक संतुलन: श्रेया सिंघल वाद (2015) में सर्वोच्च न्यायालय ने IT अधिनियम की धारा 66A को निरस्त कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की थी। वर्तमान चुनौती यह है कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत 'युक्तियुक्त निर्बंधन' (Reasonable Restrictions) को इस प्रकार लागू किया जाए कि वह असहमति (Dissent) को न कुचले।

  • निजता बनाम सुरक्षा का द्वंद्व: के.एस. पुट्टास्वामी वाद (2017) में स्थापित निजता के अधिकार (Right to Privacy) और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड संदेशों के 'प्रथम प्रवर्तक' (First Originator) की पहचान की मांग के बीच गहरा वैधानिक टकराव है।

आगे की राह (Way Forward)

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाने के लिए एक बहुआयामी और आनुपातिक (Proportional) दृष्टिकोण अपनाना अपरिहार्य है:

  • विधिक और संस्थागत सुदृढ़ीकरण: 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, प्रस्तावित डिजिटल इंडिया अधिनियम (Digital India Act) को त्वरित रूप से लागू कर बिग टेक कंपनियों की एल्गोरिथम जवाबदेही (Algorithmic Accountability) तय की जानी चाहिए।

  • तकनीकी और एआई (AI) समाधान: डीपफेक और प्रोपेगेंडा की त्वरित पहचान के लिए एआई-आधारित 'फैक्ट-चेकिंग' तंत्र और डिजिटल वॉटरमार्किंग (Digital Watermarking) को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

  • नागरिक सशक्तिकरण और डिजिटल साक्षरता: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के विजन के अनुरूप, स्कूली और ग्रामीण स्तर पर डिजिटल साक्षरता और आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) को बढ़ावा देना होगा, ताकि नागरिक भ्रामक सूचनाओं के उपभोक्ता बनने से बच सकें।

  • वैश्विक कूटनीतिक सहयोग: साइबर अपराधों की सीमा-विहीन प्रकृति को देखते हुए, 'क्राइस्टचर्च कॉल' (Christchurch Call) जैसी अंतरराष्ट्रीय संधियों और वैश्विक साइबर मानदंडों (Global Cyber Norms) को मजबूत करना आवश्यक है।

तकनीक अपने आप में तटस्थ होती है; इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समाज इसे किस नैतिक और विनियामक ढांचे में ढालता है। सतत विकास लक्ष्य 16 (SDG 16 - शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए एक सुरक्षित और पारदर्शी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। 'डिजिटल नागरिकता' के उच्च मानदंडों को स्थापित करके ही भारत 'विकसित भारत @2047' के अपने लक्ष्य को सुरक्षित कर सकता है और 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) के विचार को डिजिटल युग में यथार्थ स्वरूप प्रदान कर सकता है।

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