जलवायु परिवर्तनः विकासशील देशों के लिए एक अस्तित्वगत संकट।
Q. जलवायु परिवर्तनः विकासशील देशों के लिए एक अस्तित्वगत संकट।
Ans -
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) आधुनिक मानव सभ्यता के समक्ष उत्पन्न सर्वाधिक जटिल और गंभीर चुनौती है। अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट (AR6) स्पष्ट रूप से चेतावनी देती है कि यद्यपि वैश्विक तापन (Global Warming) एक सार्वभौमिक परिघटना है, परंतु इसके परिणाम भौगोलिक और आर्थिक रूप से अत्यधिक असमान हैं। 'जर्मनवॉच' (Germanwatch) के वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक के अनुसार, जलवायु आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से अधिकांश 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और अल्पविकसित राष्ट्र) के हिस्से हैं। विकसित देशों के ऐतिहासिक औद्योगिकीकरण के कुपरिणामों का सर्वाधिक दंश आज उन राष्ट्रों को झेलना पड़ रहा है, जिनका कार्बन उत्सर्जन न्यूनतम रहा है। अतः, इन देशों के लिए जलवायु परिवर्तन मात्र एक पर्यावरणीय मुद्दा न होकर, एक 'अस्तित्वगत संकट' (Existential Crisis) का रूप धारण कर चुका है।
विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन का अस्तित्वगत संकट (PESTLE विश्लेषण)
विकासशील देशों की उच्च भेद्यता (Vulnerability) और सीमित अनुकूलन क्षमता (Adaptive Capacity) इस संकट को बहुआयामी बनाती है:
1. पर्यावरणीय और भौगोलिक भेद्यता (Environmental)
भौगोलिक विलोपन का खतरा: समुद्र के जलस्तर में वृद्धि (Sea-level rise) से छोटे द्वीपीय विकासशील राज्यों (SIDS) जैसे मालदीव, तुवालु और किरिबाती के पूर्णतः जलमग्न होने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
चरम मौसमी घटनाएं: चक्रवात, बाढ़ और लंबे समय तक चलने वाले सूखे की आवृत्ति में वृद्धि ने पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है।
2. आर्थिक तबाही और आजीविका का संकट (Economic)
कृषि पर निर्भरता: विकासशील देशों की बहुसंख्यक आबादी वर्षा-आधारित कृषि पर निर्भर है। मानसून की अनिश्चितता और तापमान वृद्धि से फसल उत्पादन में भारी गिरावट आ रही है, जो सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा (Food Security) को बाधित कर रही है।
आर्थिक विकास में अवरोध: विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु आपदाओं के कारण बुनियादी ढांचे की तबाही और पुनर्निर्माण का खर्च विकासशील देशों की जीडीपी (GDP) का एक बड़ा हिस्सा निगल रहा है, जिससे गरीबी निवारण कार्यक्रमों के लिए संसाधनों का अभाव हो रहा है।
3. सामाजिक संकट और जनसांख्यिकीय विस्थापन (Social)
जलवायु शरणार्थी (Climate Refugees): आजीविका के नष्ट होने और तटीय क्षेत्रों के डूबने से बड़े पैमाने पर आंतरिक और बाह्य प्रवासन हो रहा है। विश्व प्रवासन संगठन (IOM) का अनुमान है कि 2050 तक लाखों लोग जलवायु विस्थापन का शिकार होंगे।
स्वास्थ्य सुरक्षा: वैश्विक तापन के कारण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में डेंगू, मलेरिया जैसी संक्रामक और जल-जनित बीमारियों का भौगोलिक विस्तार हो रहा है।
4. भू-राजनीतिक अस्थिरता (Political & Legal)
संसाधन संघर्ष (Resource Conflicts): मीठे पानी और उपजाऊ कृषि भूमि की कमी के कारण अफ्रीका के साहेल क्षेत्र और मध्य पूर्व में हिंसक संघर्ष (Water Wars) और नागरिक अशांति बढ़ रही है।
कमजोर संस्थागत ढांचा: विकासशील देशों के पास त्वरित आपदा मोचन (Disaster Response) और विधिक सुरक्षा तंत्र का अभाव है।
जलवायु न्याय और कूटनीतिक चुनौतियाँ (Diplomatic Matrix)
| चुनौती का क्षेत्र | विकसित देशों की भूमिका | विकासशील देशों पर प्रभाव |
| ऐतिहासिक उत्तरदायित्व | ऐतिहासिक उत्सर्जन में सर्वाधिक हिस्सेदारी। | समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR-RC) के सिद्धांत का हनन। शमन (Mitigation) का अनुचित दबाव। |
| जलवायु वित्त (Climate Finance) | $100 बिलियन प्रति वर्ष का वादा अभी भी अपर्याप्त और ऋण-आधारित (Debt-based)। | 'ग्रीन तकनीक' अपनाने हेतु धन का अभाव, जिससे विकास की गति बाधित। |
| प्रौद्योगिकी हस्तांतरण | बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के नाम पर तकनीक साझा करने में अनिच्छा। | नवीकरणीय ऊर्जा और अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियों में पिछड़ना। |
सुधारात्मक रणनीतियाँ एवं समाधान (Way Forward)
इस अस्तित्वगत संकट से निपटने के लिए वैश्विक एकजुटता और संस्थागत क्षमता निर्माण की आवश्यकता है:
हानि और क्षति कोष (Loss and Damage Fund) का क्रियान्वयन: COP-28 (दुबई) में ऐतिहासिक रूप से स्थापित इस कोष का त्वरित पूंजीकरण और बिना किसी नौकरशाही बाधा के अति-संवेदनशील देशों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
अनुकूलन (Adaptation) पर विशेष ध्यान: शमन (Mitigation) के साथ-साथ, जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-resilient Agriculture), प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) और तटीय सुरक्षा पर निवेश बढ़ाना अनिवार्य है।
भारत का संस्थागत नेतृत्व: भारत द्वारा आरंभित अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI) जैसे मंच विकासशील देशों के लिए तकनीकी और ढांचागत सहयोग के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
मिशन लाइफ (LiFE): उपभोक्तावाद पर आधारित अर्थव्यवस्था के स्थान पर सतत जीवनशैली (Lifestyle for Environment) को वैश्विक जन-आंदोलन बनाना होगा।
आगे की राह
जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान विकासशील देशों के 'विकास के अधिकार' (Right to Development) की बलि देकर नहीं किया जा सकता। 'जलवायु न्याय' (Climate Justice) को वैश्विक पर्यावरण वार्ताओं के मूल में रखना अपरिहार्य है। विकसित राष्ट्रों को अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्वों को स्वीकार करते हुए तकनीकी और वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूर्ण करना होगा। जब संपूर्ण