'जिस समाज में महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वह समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता।'
Q. 'जिस समाज में महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वह समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता।'
Ans -
स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट रूप से कहा था कि "जिस प्रकार एक पक्षी केवल एक पंख के सहारे उड़ान नहीं भर सकता, उसी प्रकार कोई भी राष्ट्र महिलाओं की स्थिति में सुधार किए बिना समग्र विकास के शिखर तक नहीं पहुंच सकता।" यह विचार प्राचीन भारतीय दर्शन 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' (जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है) की समकालीन प्रतिध्वनि है। महिलाओं का सम्मान केवल एक नैतिक या सामाजिक आदर्श नहीं है, बल्कि यह किसी भी राष्ट्र की आर्थिक सुदृढ़ता, राजनीतिक परिपक्वता और सभ्यतागत प्रगति की अनिवार्य शर्त है। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जैसे सूचकांक भी यह प्रमाणित करते हैं कि जिन देशों में लैंगिक समानता और महिलाओं का सम्मान उच्च स्तर पर है, वे मानव विकास और आर्थिक प्रगति में अग्रणी हैं।
महिलाओं के सम्मान और समाज की प्रगति के अंतर्संबंध (PESTLE विश्लेषण)
समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान का अभाव विकास के हर आयाम को किस प्रकार अवरुद्ध करता है, इसे निम्नलिखित बहुआयामी दृष्टिकोण से समझा जा सकता है:
सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयाम (Social & Cultural)
अंतर-पीढ़ीगत कुपोषण और स्वास्थ्य: महिलाओं के प्रति असम्मान उनके पोषण और स्वास्थ्य की उपेक्षा के रूप में सामने आता है। एक अस्वस्थ और कुपोषित मां (एनीमिया से ग्रसित) एक कमजोर पीढ़ी को जन्म देती है, जिससे राष्ट्र की मानव पूंजी (Human Capital) नष्ट होती है।
जनसांख्यिकीय असंतुलन: कन्या भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं समाज में महिलाओं के दोयम दर्जे को दर्शाती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का 'मिसिंग वुमेन' (Missing Women) का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि कैसे सामाजिक उपेक्षा के कारण लाखों महिलाओं का जीवन समाप्त हो जाता है, जो एक जनसांख्यिकीय आपदा है।
आर्थिक आयाम (Economic)
श्रमबल में भागीदारी (FLFPR) में कमी: जब समाज महिलाओं की क्षमता का सम्मान नहीं करता, तो उन्हें केवल 'केयर इकॉनमी' (Care Economy) या अवैतनिक घरेलू कार्यों तक सीमित कर दिया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, यदि भारत में महिला कार्यबल भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो भारत की जीडीपी में 27% की वृद्धि हो सकती है।
वित्तीय समावेशन का अभाव: महिलाओं के संपत्ति अधिकारों (Property Rights) को मान्यता न देना उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर बनाता है, जिससे उद्यमशीलता (Women Entrepreneurship) का विकास बाधित होता है।
राजनीतिक एवं प्रशासनिक आयाम (Political & Administrative)
नीति-निर्माण में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व: एक लोकतांत्रिक समाज तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक कि उसकी आधी आबादी की आवाज को नीति-निर्माण में शामिल न किया जाए। यद्यपि 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने स्थानीय स्तर पर महिलाओं को सशक्त किया है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व में 'कांच की छत' (Glass Ceiling) अब भी मौजूद है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन): यह अधिनियम संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण सुनिश्चित कर महिलाओं के राजनीतिक सम्मान और भागीदारी को संस्थागत रूप देने का एक ऐतिहासिक प्रयास है।
विधिक एवं न्यायिक आयाम (Legal & Judicial)
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), और अनुच्छेद 51A(e) (महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करने का मौलिक कर्तव्य) लैंगिक न्याय के स्तंभ हैं। महिलाओं के प्रति अपराध (जैसे- घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न) सीधे तौर पर संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन हैं।
विशाखा गाइडलाइंस (Vishaka Guidelines): सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए दिए गए ये दिशा-निर्देश महिलाओं के गरिमापूर्ण रोजगार के अधिकार (अनुच्छेद 21) की रक्षा करते हैं।
तकनीकी एवं नवोन्मेषी आयाम (Technological)
STEM में कम भागीदारी: विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) क्षेत्रों में महिलाओं की कम भागीदारी यह दर्शाती है कि समाज उनकी बौद्धिक और तकनीकी क्षमताओं पर पूर्ण विश्वास (सम्मान) नहीं करता। इससे नवोन्मेष (Innovation) के क्षेत्र में राष्ट्र अपनी आधी प्रतिभाओं के योगदान से वंचित रह जाता है।
महिलाओं के सम्मान को सुनिश्चित करने में प्रमुख चुनौतियां
पितृसत्तात्मक मानसिकता (Patriarchal Mindset): कानून बन जाने के बावजूद समाज की गहरी पैठी पितृसत्ता और 'सांस्कृतिक विलंबना' (Cultural Lag) के कारण महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती।
डिजिटल डिवाइड और साइबर हिंसा: आधुनिक युग में महिलाओं के प्रति असम्मान का नया रूप साइबर बुलिंग, डीपफेक (Deepfake) और ऑनलाइन उत्पीड़न के रूप में सामने आ रहा है, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक भागीदारी को बाधित करता है।
सुरक्षा का अभाव: सार्वजनिक स्थानों और सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा की कमी उनके स्वतंत्र आवागमन और आर्थिक भागीदारी को सीमित कर देती है।
आगे की राह (Way Forward)
सभ्यतागत प्रगति के लिए महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके प्रति सम्मान केवल विधिक ढांचे से नहीं, बल्कि संस्थागत और व्यवहारगत बदलावों से ही संभव है:
व्यवहारगत परिवर्तन (Nudge Theory): आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' (Beti Bachao Beti Padhao) जैसी पहलों के माध्यम से समाज की मानसिकता में बदलाव (BADLAV - Beti Aapki Dhan Lakshmi Aur Vijay Lakshmi) लाने की निरंतर आवश्यकता है।
जेंडर बजटिंग (Gender Budgeting): सरकारी नीतियों और बजटीय आवंटन में महिलाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं (स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा) को प्राथमिकता देनी होगी ताकि लैंगिक समानता को वित्तीय आधार मिल सके।
संस्थागत क्षमता निर्माण: कानून प्रवर्तन एजेंसियों, न्यायपालिका और प्रशासनिक ढांचे को महिलाओं के मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील (Gender Sensitive) बनाया जाना चाहिए।
कोई भी समाज केवल गगनचुंबी इमारतों या उच्च जीडीपी से महान नहीं बनता, बल्कि उसकी महानता की कसौटी उसके सबसे कमजोर और हाशिए के वर्गों, विशेषकर महिलाओं, के प्रति उसका दृष्टिकोण होता है। सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5 - लैंगिक समानता) की प्राप्ति के बिना अन्य सभी लक्ष्य अर्थहीन हैं। जब हम महिलाओं को केवल 'लाभार्थी' (Beneficiary) मानने के बजाय उन्हें विकास का 'सक्रिय अभिकर्ता' (Active Agent of Change) मानकर उनका सम्मान करेंगे, तभी 'नारी शक्ति' के नेतृत्व में 'विकसित भारत @2047' का संकल्प पूर्ण होगा। एक ऐसा समाज जहां महिलाएं सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त हैं, वही समाज सच्चे अर्थों में 'वसुधैव कुटुंबकम' के आदर्शों का विश्व गुरु बन सकता है।