स्वामी विवेकानंद के 'दरिद्र नारायण' के सिद्धांत की वर्तमान कल्याणकारी राज्य में प्रासंगिकता बताएं।

 Q.  स्वामी विवेकानंद के 'दरिद्र नारायण' के सिद्धांत की वर्तमान कल्याणकारी राज्य में प्रासंगिकता बताएं।

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स्वामी विवेकानंद का 'दरिद्र नारायण' (दरिद्र ही ईश्वर है) का सिद्धांत केवल एक दार्शनिक या आध्यात्मिक विचार नहीं है, बल्कि यह आधुनिक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) और सुशासन (Good Governance) की वैचारिक आधारशिला है। इस सिद्धांत का मूल भाव 'शिव भाव से जीव सेवा' (ईश्वर मानकर मनुष्य की सेवा) में निहित है, जो यह स्थापित करता है कि समाज के सबसे शोषित, वंचित और गरीब व्यक्ति की सेवा ही सच्ची ईश्वर-उपासना है।

भारतीय संविधान के भाग-IV में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP), विशेषकर अनुच्छेद 38 (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय) का अंतिम लक्ष्य इसी 'दरिद्र नारायण' के उत्थान को सुनिश्चित करना है, जहाँ राज्य दान (Charity) के रूप में नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों (Rights) के रूप में कल्याणकारी नीतियां लागू करता है।

'दरिद्र नारायण' के सिद्धांत का दार्शनिक आधार

यह सिद्धांत शासन व्यवस्था को मशीनी दृष्टिकोण से निकालकर एक मानवीय और संवेदनशील स्वरूप प्रदान करता है:

  • करुणा और सहानुभूति (Compassion and Empathy): यह सिविल सेवकों और नीति-निर्माताओं को समाज के अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) के प्रति संवेदनशील बनाता है।

  • समानता और गरिमा (Equality and Dignity): यह सिद्धांत प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय अंश देखता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) को एक गहरा नैतिक आधार प्रदान करता है।

  • कर्तव्य आधारित दृष्टिकोण: सेवा को अहसान के रूप में नहीं, बल्कि एक परम कर्तव्य (Categorical duty) के रूप में स्थापित करता है।

वर्तमान कल्याणकारी राज्य में बहुआयामी प्रासंगिकता (PESTLE दृष्टिकोण)

आधुनिक प्रशासनिक और नीतिगत परिदृश्य में इस सिद्धांत की प्रासंगिकता निम्नलिखित आयामों में स्पष्ट होती है:

  • सामाजिक आयाम (Social):

    • समाज में व्याप्त छुआछूत, जातिवाद और लैंगिक असमानता को समाप्त करने में यह विचार एक उत्प्रेरक है।

    • सतत विकास लक्ष्य-1 (शून्य गरीबी) और SDG-2 (भुखमरी समाप्ति) की प्राप्ति के लिए नीतियां (जैसे- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013) इसी दर्शन का संस्थागत रूप हैं।

  • आर्थिक आयाम (Economic):

    • संसाधनों के न्यायसंगत वितरण (अनुच्छेद 39 b & c) और वित्तीय समावेशन पर बल।

    • प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY), मनरेगा (MGNREGA) और आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं 'दरिद्र नारायण' के आर्थिक सशक्तिकरण के व्यावहारिक उपकरण हैं।

  • राजनीतिक एवं प्रशासनिक आयाम (Political/Administrative):

    • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि सिविल सेवा का मुख्य उद्देश्य कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता होना चाहिए। यह सिद्धांत प्रशासकों को 'शासक' के अहंकार से मुक्त कर 'लोक सेवक' बनाता है।

  • तकनीकी आयाम (Technological):

    • ई-गवर्नेंस और डिजिटल इंडिया के युग में JAM ट्रिनिटी (Jan Dhan, Aadhaar, Mobile) और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि तकनीक का लाभ सीधे पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे (Digital Antyodaya), जिससे बिचौलियों की भूमिका और भ्रष्टाचार समाप्त हो।

सिद्धांत को धरातल पर उतारने में विद्यमान चुनौतियाँ

  • संरचनात्मक असमानता: ऑक्सफैम (Oxfam) की असमानता रिपोर्ट दर्शाती है कि संपत्ति का संकेंद्रण कुछ ही हाथों में है, जो 'दरिद्र नारायण' के उत्थान में सबसे बड़ी आर्थिक बाधा है।

  • प्रशासनिक उदासीनता (Bureaucratic Apathy): नौकरशाही में लालफीताशाही (Red-tapism) और संवेदना का अभाव नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन को रोकता है।

  • क्षमता निर्माण का अभाव: अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के 'क्षमता उपागम' (Capability Approach) के अनुसार, केवल सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से गरीबों की क्षमता का विकास करना आवश्यक है, जिसमें अभी भी सुधार की आवश्यकता है।

आगे की राह (Way Forward)

विवेकानंद के इस सिद्धांत को पूर्णतः चरितार्थ करने के लिए बहुआयामी सुधारों की आवश्यकता है:

  1. नैतिक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास: 'मिशन कर्मयोगी' के तहत सिविल सेवकों को जमीनी वास्तविकताओं (Village visits) और केस-स्टडीज के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि वे समाज के सबसे कमजोर वर्ग से भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर सकें।

  2. सशक्तिकरण बनाम संरक्षण (Empowerment vs Protection): कल्याणकारी योजनाओं का स्वरूप केवल 'राहत' देने वाला न होकर 'कौशल विकास' और 'आत्मनिर्भरता' उत्पन्न करने वाला होना चाहिए (जैसे- स्टैंड-अप इंडिया, पीएम स्वनिधि)।

  3. पारदर्शिता और जन-भागीदारी: नीतियों के निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक में सामाजिक लेखा परीक्षा (Social Audit) और स्थानीय स्वशासन (73वें और 74वें संशोधन) को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

स्वामी विवेकानंद का 'दरिद्र नारायण' का आदर्श भारतीय राज्य-व्यवस्था के लिए केवल एक नैतिक दिशा-सूचक (Moral Compass) नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक प्रशासनिक आवश्यकता है। जब नीति-निर्माण और प्रशासन में संवेदना और सत्यनिष्ठा का समावेश होता है, तभी वास्तविक अर्थों में समावेशी विकास (Inclusive Growth) संभव हो पाता है। इस सिद्धांत को अपनी कार्यप्रणाली का केंद्र बनाकर ही भारतीय प्रशासन 'सबका साथ, सबका विकास' के विजन को धरातल पर उतार सकता है और 'वसुधैव कुटुंबकम' के वैश्विक दर्शन के साथ एक न्यायपूर्ण, समतामूलक एवं सशक्त 'नव भारत 2047' (New India 2047) के निर्माण का स्वप्न साकार कर सकता है।

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