'इतिहास अपने आपको दोहराता है, पहले त्रासदी के रूप में, फिर प्रहसन के रूप में।'
Q. 'इतिहास अपने आपको दोहराता है, पहले त्रासदी के रूप में, फिर प्रहसन के रूप में।'
Ans -
प्रसिद्ध दार्शनिक और राजनीतिक अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स (Karl Marx) द्वारा अपनी रचना 'द एटीन्थ ब्रूमेयर ऑफ लुई बोनापार्ट' (The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte) में दिया गया यह कथन मानव सभ्यता, प्रशासन और भू-राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करता है। मार्क्स ने हीगेल के इस विचार को आगे बढ़ाया कि इतिहास में महान घटनाएं दो बार घटित होती हैं। प्रथम बार जब कोई ऐतिहासिक भूल होती है, तो वह एक विशाल विध्वंस या 'त्रासदी' (Tragedy) का कारण बनती है, क्योंकि उस समय समाज के पास पूर्व का कोई अनुभव नहीं होता। परंतु, जब वही समाज या संस्थाएं इतिहास से सबक न लेकर उसी गलती को जानबूझकर दोहराती हैं, तो यह एक हास्यास्पद 'प्रहसन' (Farce) बन जाता है। यह संस्थागत विस्मृति (Institutional Amnesia) और मानव बौद्धिकता की विफलता का प्रतीक है।
ऐतिहासिक पुनरावृत्ति का सैद्धांतिक और व्यावहारिक आधार
इतिहास के प्रहसन में बदलने का मुख्य कारण यह है कि परिस्थितियां और कालखंड बदल चुके होते हैं, परंतु नेतृत्व और संस्थाएं पुराने, विफल हो चुके दृष्टिकोण (Anachronistic Approach) को ही लागू करने का प्रयास करते हैं।
विभिन्न आयामों में ऐतिहासिक पुनरावृत्ति (PESTLE विश्लेषण)
आर्थिक आयाम (Economic):
त्रासदी: 1929 की 'महामंदी' (Great Depression) एक वैश्विक त्रासदी थी, जो अनियंत्रित पूंजीवाद और बाजार की विफलता का परिणाम थी।
प्रहसन: अर्थशास्त्रियों की स्पष्ट चेतावनियों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के बावजूद, लालच और विनियामक शिथिलता (Regulatory Laxity) के कारण 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट (Global Financial Crisis) घटित हुआ। यह एक प्रहसन था क्योंकि विश्व के पास इससे बचने के पर्याप्त बौद्धिक उपकरण मौजूद थे।
भू-राजनीतिक एवं कूटनीतिक आयाम (Geopolitical):
त्रासदी: राष्ट्र संघ (League of Nations) की विफलता के कारण द्वितीय विश्व युद्ध जैसी अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी हुई।
प्रहसन: आज संयुक्त राष्ट्र (UN) सुरक्षा परिषद की वीटो राजनीति और पंगुता, जिसके कारण मध्य-पूर्व (गाजा संकट) या रूस-यूक्रेन संघर्ष को रोकने में विफलता मिल रही है, उसी इतिहास का प्रहसन के रूप में दोहराव है।
पर्यावरणीय और पारिस्थितिक आयाम (Environmental):
त्रासदी: औद्योगिक क्रांति के आरंभिक चरण में अंधाधुंध जीवाश्म ईंधन का दोहन अज्ञानता और तात्कालिक विकास की भूख की त्रासदी थी।
प्रहसन: आज जब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के अकाट्य वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं, तब भी विकसित देशों द्वारा उत्सर्जन लक्ष्यों में टालमटोल करना और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की अवहेलना करना एक वैश्विक प्रहसन है।
प्रशासनिक एवं नीतिगत आयाम (Administrative):
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने स्पष्ट किया है कि नौकरशाही में 'संस्थागत स्मृति' (Institutional Memory) के अभाव के कारण अक्सर विफल नीतियां नए नामों से लागू की जाती हैं।
शहरी नियोजन में प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था की अनदेखी के कारण चेन्नई या बेंगलुरु में हर वर्ष आने वाली कृत्रिम बाढ़ इसी प्रशासनिक प्रहसन का उदाहरण है।
पुनरावृत्ति के मूल कारण (The 'Why')
संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह (Cognitive Bias) और अभिमान: नेतृत्व का यह भ्रम कि "इस बार सब अलग होगा" (This time is different syndrome), उन्हें ऐतिहासिक साक्ष्यों की अनदेखी करने के लिए प्रेरित करता है।
अल्पकालिक राजनीतिक दृष्टिकोण: चुनावी लोकतंत्र में राजनीतिक दल अक्सर दीर्घकालिक संस्थागत निर्माण के बजाय अल्पकालिक लोकलुभावन नीतियों को प्राथमिकता देते हैं, जो भविष्य में आर्थिक और सामाजिक प्रहसन का कारण बनती हैं।
जवाबदेही का अभाव: जब तक नीति-निर्माताओं को उनकी ऐतिहासिक भूलों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता, इतिहास का यह कुचक्र चलता रहता है।
आगे की राह (Way Forward)
इतिहास एक नियतिवादी चक्र (Deterministic Circle) नहीं है, बल्कि यदि इससे सही सबक लिए जाएं, तो यह एक प्रगतिशील सर्पिल (Ascending Spiral) बन सकता है। समाज और प्रशासन को त्रासदी से प्रहसन की ओर जाने से रोकने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:
साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-Based Policymaking): नीतियों का निर्माण भावनाओं या राजनीतिक हठ के बजाय डेटा और पूर्व के अनुभवों पर आधारित होना चाहिए। नीति आयोग का 'सहकारी संघवाद' और 'डेटा-संचालित शासन' (Data-driven Governance) का मॉडल इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
संस्थागत स्मृति का संरक्षण: ई-गवर्नेंस (e-Governance) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग सरकारी विभागों के पुराने डेटा और अनुभवों को सहेजने के लिए किया जाना चाहिए ताकि अधिकारी पुरानी गलतियों को न दोहराएं।
समावेशी और आलोचनात्मक शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप, शिक्षा प्रणाली में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) को बढ़ावा देना चाहिए ताकि नागरिक ऐतिहासिक गलतियों की पहचान कर सकें और एक जागरूक जनमत का निर्माण कर सकें।
वैश्विक संस्थागत सुधार: संयुक्त राष्ट्र (UN) और ब्रेटन वुड्स संस्थानों (Bretton Woods Institutions) का समकालीन यथार्थ के अनुसार लोकतांत्रिकरण होना चाहिए।
इतिहास तभी स्वयं को प्रहसन के रूप में दोहराता है जब वर्तमान नेतृत्व बौद्धिक रूप से निष्क्रिय हो जाता है। एक जागृत लोकतंत्र और उत्तरदायी प्रशासन निरंतर अतीत के अनुभवों से सीखकर ही भविष्य की नीतियों को आकार देता है। ऐतिहासिक भूलों के प्रति इसी सजगता और सतत सुधार की भावना के माध्यम से ही भारत अपने 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है और 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन को वैश्विक शांति और स्थिरता के यथार्थ में बदल सकता है।