केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED) की स्वायत्तता और उनके राजनीतिक दुरुपयोग के आरोपों का आलोचनात्मक परीक्षण करें।
Q. केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED) की स्वायत्तता और उनके राजनीतिक दुरुपयोग के आरोपों का आलोचनात्मक परीक्षण करें।
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जांच एजेंसियों की स्वायत्तता और राजनीतिक दुरुपयोग: एक आलोचनात्मक मूल्यांकन
विधि के शासन (Rule of Law) और आर्थिक शुचिता (Economic Probity) की स्थापना में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी जांच एजेंसियों की भूमिका अपरिहार्य है। यद्यपि, हालिया वर्षों में इनकी कार्यप्रणाली, स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर निरंतर गंभीर प्रश्नचिह्न लगे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला आवंटन घोटाले (Coalgate Scam) की सुनवाई के दौरान CBI को "पिंजरे में बंद तोता" (Caged Parrot) की संज्ञा दी थी, जो कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप और इन संस्थाओं के राजनीतिकरण की ओर एक स्पष्ट संकेत है।
केंद्रीय जांच एजेंसियों का वैधानिक और प्रशासनिक ढांचा
केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI): यह गृह मंत्रालय के प्रस्ताव द्वारा स्थापित एक संस्था है, जो अपनी शक्तियां दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम, 1946 से प्राप्त करती है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED): यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन कार्य करता है। इसका मुख्य कार्य धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 एवं विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 को लागू करना है।
स्वायत्तता का ह्रास और राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप (बहुआयामी विश्लेषण)
इन एजेंसियों के दुरुपयोग और स्वायत्तता की कमी के पीछे कई संरचनात्मक और व्यावहारिक कारण उत्तरदायी हैं:
राजनीतिक (Political): कार्यपालिका द्वारा इन एजेंसियों को 'राजनीतिक अस्त्र' के रूप में प्रयोग करने का आरोप है। विपक्ष का तर्क है कि चुनाव से पूर्व या राजनीतिक संकट के समय सत्ताधारी दल द्वारा असंतुष्ट आवाज़ों और विपक्षी नेताओं को लक्षित किया जाता है।
विधिक एवं संरचनात्मक (Legal & Structural):
CBI के पास अपना कोई स्वतंत्र वैधानिक (Statutory) कानून नहीं है, जिससे इसके अस्तित्व और कार्यप्रणाली में अस्पष्टता रहती है।
ED के पास PMLA के तहत असीमित शक्तियां हैं, जिसमें धारा 45 के अंतर्गत ज़मानत की शर्तें अत्यंत कठोर हैं। कनविक्शन रेट (Conviction Rate) अत्यंत कम होने के बावजूद लंबी न्यायिक हिरासत चिंता का विषय है।
संघीय ढांचा (Federal Setup): पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं। CBI जांच के लिए राज्यों द्वारा दी जाने वाली 'सामान्य सहमति' (General Consent) का कई राज्यों द्वारा वापस लिया जाना, सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) और अनुच्छेद 256 के समक्ष प्रत्यक्ष चुनौती है।
प्रशासनिक और वित्तीय (Administrative & Economic): आधारभूत ढांचे, बजट आवंटन और अधिकारियों के कैडर के लिए ये एजेंसियां गृह मंत्रालय एवं कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) पर पूर्णतः निर्भर हैं, जो इनकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को बाधित करता है।
दुरुपयोग के आरोपों के बहुआयामी प्रभाव
नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis): जांच एजेंसियों के अनावश्यक भय (3C: CBI, CVC, CAG) के कारण ईमानदार नौकरशाह जोखिम भरे प्रशासनिक निर्णय लेने से बचते हैं, जिससे विकास कार्य और 'ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस' प्रभावित होता है।
संस्थागत साख में गिरावट: जनमानस में इन प्रतिष्ठित संस्थाओं की निष्पक्षता के प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है, जो SDG 16 (शांति, न्याय और सुदृढ़ संस्थाएं) के वैश्विक लक्ष्यों के पूर्णतः प्रतिकूल है।
लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण: राजनीतिक प्रतिशोध की भावना स्वस्थ लोकतंत्र और स्वतंत्र न्याय प्रशासन के लिए घातक है।
स्वायत्तता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपाय (सुधार की रूपरेखा)
जांच एजेंसियों को स्वतंत्र और जवाबदेह बनाने हेतु द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) तथा सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों का संज्ञान लिया जाना आवश्यक है:
विनीत नारायण वाद (1997) का कठोर अनुपालन: सर्वोच्च न्यायालय ने CBI की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को पर्यवेक्षण (Supervision) का अधिकार दिया था। इसके मूल विजन को धरातल पर उतारना आवश्यक है।
वैधानिक समर्थन (Statutory Backing): 2nd ARC की अनुशंसाओं के अनुरूप, CBI को DSPE अधिनियम से मुक्त कर एक पृथक, स्वतंत्र और व्यापक संसदीय कानून (Comprehensive Act) के तहत लाया जाना चाहिए।
संसदीय निगरानी तंत्र (Legislative Oversight): कार्यपालिका के एकाधिकार को कम करने हेतु, अमेरिका की FBI (Federal Bureau of Investigation) या ब्रिटेन की NCA (National Crime Agency) की तर्ज पर एक स्वतंत्र 'संसदीय ओवरसाइट कमेटी' का गठन किया जाना चाहिए, जो इन एजेंसियों के कामकाज का आवधिक मूल्यांकन करे।
कार्यकाल और वित्तीय स्वायत्तता: लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत निदेशकों की नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाना तथा इन्हें सीएजी (CAG) या चुनाव आयोग (ECI) के समान बजटीय स्वायत्तता प्रदान करना।
आगे की राह (Way Forward)
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संस्था की पूर्ण स्वायत्तता जहां निरंकुशता को जन्म दे सकती है, वहीं अत्यधिक कार्यकारी नियंत्रण उसे 'राजनीतिक उपकरण' बना देता है। अतः, एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी संस्थागत संतुलन (Institutional Balance) की स्थापना समय की मांग है।
भारत के 'न्यू इंडिया 2047' और 'विकसित भारत' के संकल्प को पूर्ण करने के लिए 'संविधानवाद' और सुशासन आधारित प्रशासनिक तंत्र अपरिहार्य है। केंद्रीय जांच एजेंसियों को राजनीतिक आकाओं के प्रति नहीं, बल्कि भारत के संविधान और विधि के शासन के प्रति अपनी निष्ठा सुनिश्चित करनी होगी। ऐसा सशक्त और पारदर्शी तंत्र ही भ्रष्टाचार मुक्त और न्यायपूर्ण राष्ट्र के विजन को साकार कर सकता है।