अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता (Ethics in International Relations) की क्या भूमिका है? क्या विदेश नीति केवल राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए?

 Q. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता (Ethics in International Relations) की क्या भूमिका है? क्या विदेश नीति केवल राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए?

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अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations) संप्रभु राष्ट्रों के बीच शक्ति, संसाधनों और हितों के प्रबंधन का क्षेत्र है। इस संदर्भ में नैतिकता (Ethics) वह वैचारिक ढांचा है जो राष्ट्रों के व्यवहार को विशुद्ध 'शक्ति की राजनीति' (Power Politics) और मैकियावेली के संकीर्ण यथार्थवाद (Realism) से परे जाकर न्याय, समानता और मानवाधिकारों के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर निर्देशित करता है। वर्तमान वैश्वीकृत और अन्योन्याश्रित विश्व में, जहां जलवायु परिवर्तन और महामारियों जैसी सीमाहीन चुनौतियां मौजूद हैं, विदेश नीति में इमानुएल कांट (Immanuel Kant) के आदर्शवाद और महात्मा गांधी के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के दृष्टिकोण की प्रासंगिकता अत्यधिक बढ़ गई है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता की भूमिका

वैश्विक पटल पर नैतिकता कई आयामों (राजनीतिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और विधिक) में राष्ट्रों के आचरण को आकार देती है:

  • मानवाधिकार और मानवीय हस्तक्षेप (Humanitarian Intervention): संप्रभुता के सिद्धांत के बावजूद, जब कोई राज्य अपने नागरिकों की रक्षा करने में विफल रहता है, तो वैश्विक समुदाय सुरक्षा का उत्तरदायित्व (Responsibility to Protect - R2P) सिद्धांत के तहत नैतिक हस्तक्षेप करता है (जैसे- संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन)।

  • वैश्विक संपदा (Global Commons) का न्यायसंगत प्रबंधन: पर्यावरणीय कूटनीति में "समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व" (CBDR-RC) का सिद्धांत (UNFCCC के तहत) विशुद्ध रूप से पर्यावरणीय नैतिकता और जलवायु न्याय पर आधारित है, जो विकसित देशों को उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी का एहसास कराता है।

  • अंतरराष्ट्रीय विधि और नियम-आधारित व्यवस्था: युद्ध और संघर्ष के दौरान भी जिनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions) के माध्यम से युद्ध के नैतिक नियम (Jus in bello) निर्धारित किए गए हैं, जो युद्धबंदियों और नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं।

  • वितरणात्मक न्याय (Distributive Justice) और सहायता: विकसित देशों द्वारा विकासशील और अल्पविकसित देशों को दी जाने वाली 'आधिकारिक विकास सहायता' (Official Development Assistance - ODA) वैश्विक आर्थिक असमानता को दूर करने का एक नैतिक प्रयास है, जो सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति के लिए अनिवार्य है।

  • निरस्त्रीकरण (Disarmament): परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और जैविक हथियार सम्मेलन (BWC) जैसे विधिक ढांचों का मूल आधार संपूर्ण मानवता के अस्तित्व की रक्षा से जुड़ी नैतिकता है।

क्या विदेश नीति केवल राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए?

यथार्थवादी दृष्टिकोण: राष्ट्रीय हित की सर्वोच्चता

हंस मोर्गेंथाऊ (Hans Morgenthau) जैसे विचारकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक (Anarchic) है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, राज्य का प्राथमिक और एकमात्र दायित्व अपनी उत्तरजीविता (Survival), संप्रभुता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है। इस संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि राजनेताओं के पास व्यक्तिगत नैतिकता को राज्य की सुरक्षा पर थोपने का कोई अधिकार नहीं है।

केवल राष्ट्रीय हितों पर निर्भरता की सीमाएँ और चुनौतियाँ

विदेश नीति को संकीर्ण राष्ट्रीय हितों (Narrow National Interests) तक सीमित रखने के गंभीर दुष्परिणाम होते हैं:

  • शून्य-योग का खेल (Zero-Sum Game) और संघर्ष: केवल शक्ति और स्वार्थ पर आधारित नीतियां वैश्विक अविश्वास, हथियारों की होड़ और युद्ध (जैसे- वर्तमान भू-राजनीतिक संघर्ष और आपूर्ति श्रृंखलाओं का शस्त्रीकरण) को जन्म देती हैं।

  • वैश्विक संकटों का समाधान असंभव: आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, और साइबर खतरे किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं हैं। संकीर्ण राष्ट्रीय हित के नजरिए से 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' (Vaccine Nationalism) जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं, जो संपूर्ण मानवता के लिए घातक हैं।

  • सॉफ्ट पावर (Soft Power) का क्षरण: जो राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों की अनदेखी करते हैं, वे अपनी वैश्विक साख और 'सॉफ्ट पावर' खो देते हैं, जिससे दीर्घकाल में उनका अपना ही नुकसान होता है।

समन्वयात्मक दृष्टिकोण: प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित (Enlightened National Interest)

आधुनिक विदेश नीति में राष्ट्रीय हित और नैतिकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित का अर्थ है कि एक राष्ट्र यह स्वीकार करता है कि उसके अपने दीर्घकालिक हित (शांति, आर्थिक समृद्धि और सुरक्षा) एक न्यायपूर्ण, नियम-आधारित और नैतिक विश्व व्यवस्था को बनाए रखने में ही निहित हैं।

भारत का दृष्टिकोण और प्रासंगिकता:

  • संवैधानिक आधार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत संबंधों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।

  • कूटनीतिक विरासत: पंचशील सिद्धांत (Panchsheel) और गुजराल सिद्धांत (Gujral Doctrine) (पड़ोसियों के साथ गैर-पारस्परिकता का सिद्धांत) नैतिक विदेश नीति के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

  • समकालीन उदाहरण: कोविड-19 संकट के दौरान भारत की 'वैक्सीन मैत्री' (Vaccine Maitri) पहल इसके प्रबुद्ध राष्ट्रीय हित और वैश्विक कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण थी।

आगे की राह

21वीं सदी की जटिलताओं का समाधान न तो पूर्ण यथार्थवाद में है और न ही स्वप्निल आदर्शवाद में, बल्कि दोनों के व्यावहारिक समन्वय में है। राष्ट्रों को अपनी विदेश नीति का निर्माण संकीर्ण 'अंध राष्ट्रवाद' के बजाय 'वैश्विक नागरिकता' (Global Citizenship) के मूल्यों पर करना चाहिए।

भारत द्वारा जी-20 (G20) की अध्यक्षता के दौरान दिया गया "वसुधैव कुटुंबकम" (एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य) का महावाक्य इसी नैतिक विदेश नीति का प्रतिनिधित्व करता है। यह ढांचा 'न्यू इंडिया 2047' के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप भारत को विश्व पटल पर एक जिम्मेदार 'विश्व मित्र' (Vishwa Mitra) के रूप में स्थापित करता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के निर्माण का भी मार्ग प्रशस्त करता है।

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