भारत में क्षेत्रवाद (Regionalism) के बढ़ते मामलों के कारण क्या हैं? क्या यह राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है?
Q. भारत में क्षेत्रवाद (Regionalism) के बढ़ते मामलों के कारण क्या हैं? क्या यह राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है?
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भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रवाद (Regionalism) एक बहुआयामी विचारधारा है, जिसमें किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र, भाषा या संस्कृति के प्रति अपनत्व और निष्ठा, समग्र राष्ट्रीय पहचान पर हावी होने लगती है। राष्ट्रीय एकता परिषद (NIC) और विभिन्न समाजशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार, भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में क्षेत्रवाद केवल एक विघटनकारी बल नहीं है, बल्कि यह स्थानीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम भी है।
भारत में क्षेत्रवाद के बढ़ते मामलों के कारण (PESTLE दृष्टिकोण)
क्षेत्रवाद के उद्भव और विकास के पीछे निम्नलिखित संरचनात्मक और नीतिगत कारक उत्तरदायी हैं:
1. आर्थिक और विकासात्मक कारक (Economic)
असमान विकास (Uneven Development): उदारीकरण के पश्चात निवेश कुछ चुनिंदा राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, गुजरात) तक सीमित रहा। नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक से स्पष्ट है कि विकासात्मक अंतराल ने क्षेत्रीय असंतोष को जन्म दिया है।
प्रवासन और संसाधनों पर दबाव: आर्थिक विषमता के कारण जब रोजगार की तलाश में बिहार (विशेष रूप से पटना और राज्य के अन्य सभी जिलों) जैसे राज्यों से मानव संसाधन का बड़े पैमाने पर पलायन अन्य राज्यों की ओर होता है, तो गंतव्य राज्यों में स्थानीय संसाधनों और रोजगार पर दबाव बढ़ता है। इससे 'भूमिपुत्र' (Son of the Soil) जैसी आक्रामक प्रवृत्तियां (जैसे महाराष्ट्र में प्रवासियों का विरोध) उत्पन्न होती हैं।
2. राजनीतिक और प्रशासनिक कारक (Political)
पहचान की राजनीति (Identity Politics): वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा स्थानीय भावनाओं, भाषाई गौरव और क्षेत्रीय अस्मिता का राजनीतिकरण किया जाता है।
स्वायत्तता की मांग: संसाधनों पर अधिक नियंत्रण के लिए विशेष राज्य के दर्जे (Special Category Status) की निरंतर मांग या संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची के तहत प्रशासनिक स्वायत्तता (जैसे लद्दाख या बोडोलैंड की मांग) क्षेत्रवाद को प्रेरित करती है।
3. सामाजिक और सांस्कृतिक कारक (Socio-Cultural)
भाषाई अस्मिता: राज्य पुनर्गठन आयोग (1956) ने भाषाई आधार पर राज्यों का निर्माण कर भाषाई पहचान को संस्थागत रूप दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में थोपे जाने की आशंका (जैसे दक्षिणी राज्यों में विरोध) भाषाई क्षेत्रवाद को गहरा करती है।
निर्जातीय (Ethnic) विविधता: पूर्वोत्तर भारत में नागा, कुकी और मैतेई जैसे निर्जातीय समूहों के बीच अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और भूमि अधिकारों को संरक्षित करने की होड़ ने भी उग्र क्षेत्रवाद को जन्म दिया है।
क्या क्षेत्रवाद राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है? एक समालोचनात्मक विश्लेषण
क्षेत्रवाद को पूर्णतः नकारात्मक दृष्टि से देखना एकांगी दृष्टिकोण होगा। इसके प्रभाव द्वैत प्रकृति के हैं:
राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती (नकारात्मक प्रभाव)
अलगाववाद और उग्रवाद: जब क्षेत्रवाद चरम पर पहुंचता है, तो यह संप्रभुता के लिए खतरा बन जाता है। (उदाहरण: 1980 के दशक का खालिस्तान आंदोलन या पूर्वोत्तर में उल्फा का सशस्त्र विद्रोह)।
अंतर-राज्यीय विवाद: जल संसाधनों (जैसे कावेरी नदी जल विवाद) और सीमांकन (जैसे महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच बेलगावी विवाद) को लेकर राज्यों के बीच कटुता सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को कमजोर करती है।
आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था: क्षेत्रीय संकीर्णता के कारण होने वाली हिंसक घटनाएं अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त अबाध संचरण और निवास की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का हनन करती हैं।
लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण (सकारात्मक प्रभाव)
संतुलित विकास की उत्प्रेरक: क्षेत्रवाद ने नीति-निर्माताओं का ध्यान पिछड़े क्षेत्रों की ओर आकृष्ट किया है, जिसके परिणामस्वरूप उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे नए राज्यों का शांतिपूर्ण निर्माण हुआ और वहां प्रशासनिक दक्षता बढ़ी।
सांस्कृतिक संरक्षण: यह स्थानीय कला, भाषा और परंपराओं को वैश्वीकरण की एकरूपता (Homogenization) से बचाता है, जो अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण) की भावना के अनुरूप है।
सहयोगी संघवाद का सुदृढ़ीकरण: क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय राजनीति में उदय ने केंद्र सरकार की मनमानी पर रोक लगाई है और नीति-निर्माण को अधिक विकेंद्रीकृत व समावेशी बनाया है।
आगे की राह
क्षेत्रवाद की नकारात्मक प्रवृत्तियों को रोकने और सकारात्मक ऊर्जा को चैनलाइज़ करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
संस्थागत तंत्र का उपयोग: अनुच्छेद 263 के तहत 'अंतर-राज्यीय परिषद' (Inter-State Council) और 'क्षेत्रीय परिषदों' (Zonal Councils) को अधिक सक्रिय और परिणामोन्मुखी बनाया जाना चाहिए (जैसा कि सरकारिया और पुंछी आयोग ने अनुशंसित किया था)।
समावेशी विकास: आकांक्षी जिला कार्यक्रम (ADP) जैसे मॉडलों का विस्तार करना और वित्त आयोग द्वारा संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना ताकि 'विकास के द्वीपों' के बजाय सर्वव्यापी विकास हो सके।
सांस्कृतिक एकीकरण: शिक्षा और पर्यटन के माध्यम से 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' पहल को जमीनी स्तर पर लागू करना।
क्षेत्रवाद स्वाभाविक रूप से विविधता का एक उत्पाद है। जब तक यह संविधान के दायरे में और राष्ट्रीय अखंडता के अधीन रहता है, यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का सूचक है। सतत विकास लक्ष्यों (विशेषकर SDG 10: असमानताओं में कमी) को प्राप्त करके और 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र को अपनाकर, हम क्षेत्रवाद को 'अमृत काल 2047' के एक सशक्त, एकजुट और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के मूल्यों को चरितार्थ करने वाले नव-भारत की नींव में बदल सकते हैं।