धर्मनिरपेक्षता (Secularism) का भारतीय मॉडल पश्चिमी मॉडल से किस प्रकार भिन्न है?

 Q. धर्मनिरपेक्षता (Secularism) का भारतीय मॉडल पश्चिमी मॉडल से किस प्रकार भिन्न है?

Ans - 

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा 'पंथनिरपेक्ष' शब्द को औपचारिक रूप से जोड़ा गया, यद्यपि इसका मूल दर्शन अनुच्छेद 25 से 28 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) में प्रारंभ से ही अंतर्निहित था। एस. आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता को संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का अभिन्न अंग घोषित किया है। धर्मनिरपेक्षता का भारतीय मॉडल पश्चिमी देशों के स्थिर और कठोर मॉडल की नकल मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत की बहुलवादी (Pluralistic) और विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना के अनुकूल विकसित एक गतिशील अवधारणा है।

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप (Western Model)

पश्चिमी मॉडल (विशेषकर अमेरिकी और फ्रांसीसी 'Laïcité' मॉडल) राज्य और धर्म के बीच पूर्ण अलगाव पर आधारित है:

  • जल-रोधी विभाजन (Water-tight Compartmentalization): राज्य और धर्म दोनों के अपने-अपने स्पष्ट कार्यक्षेत्र हैं। राज्य धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता और धर्म राज्य की नीतियों को प्रभावित नहीं करता।

  • नकारात्मक अवधारणा (Negative Concept): इसे नकारात्मक माना जाता है क्योंकि यह धर्म के प्रति राज्य की पूर्ण उदासीनता (Mutual exclusion) को दर्शाता है।

  • व्यक्तिवादी दृष्टिकोण: पश्चिमी मॉडल मुख्य रूप से नागरिक की 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' (Individual liberty) को सर्वोपरि मानता है, इसमें धार्मिक समुदायों के सामूहिक अधिकारों के लिए कोई विशेष स्थान नहीं है।

भारतीय पंथनिरपेक्षता: पश्चिमी मॉडल से भिन्नता

भारतीय मॉडल पश्चिमी मॉडल के अलगाववाद को नकारते हुए 'सर्व धर्म समभाव' (सभी धर्मों के प्रति समान आदर) के दर्शन पर आधारित है। मुख्य भिन्नताएं निम्नलिखित हैं:

1. सैद्धांतिक दूरी (Principled Distance) और सकारात्मक दृष्टिकोण

  • पश्चिमी राज्य धर्म से पूर्णतः कटा हुआ है, जबकि भारतीय राज्य सभी धर्मों के साथ सैद्धांतिक दूरी (राजनीतिक वैज्ञानिक राजीव भार्गव द्वारा प्रतिपादित) बनाए रखता है।

  • भारतीय राज्य धर्म का विरोधी या उदासीन नहीं है, बल्कि यह सकारात्मक रूप से सभी धर्मों को समान संरक्षण प्रदान करता है।

2. सुधारात्मक हस्तक्षेप (Reformative Intervention)

  • पश्चिमी मॉडल में राज्य धार्मिक कुरीतियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके विपरीत, भारतीय मॉडल राज्य को अधिकार देता है कि वह सामाजिक न्याय और समानता स्थापित करने के लिए धार्मिक मामलों में सकारात्मक हस्तक्षेप करे।

  • विधिक और सामाजिक सुधार: अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए खोलना, सती प्रथा का अंत, और हाल ही में 'तीन तलाक' (Triple Talaq) को असंवैधानिक घोषित करना इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

3. सामूहिक और अल्पसंख्यक अधिकारों का संरक्षण

  • भारतीय मॉडल केवल व्यक्ति के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक समुदायों के अधिकारों की भी रक्षा करता है।

  • अनुच्छेद 29 और 30 के माध्यम से धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति के संरक्षण और अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने तथा उनका प्रशासन करने का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है।

4. राज्य द्वारा वित्तीय समर्थन

  • जहाँ फ्रांसीसी या अमेरिकी मॉडल में राज्य किसी धार्मिक संस्थान को कोई वित्तीय सहायता नहीं दे सकता, वहीं भारतीय संविधान राज्य को यह अनुमति देता है कि वह बिना किसी भेदभाव के सभी धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों को उनके शैक्षिक और कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए वित्तीय अनुदान प्रदान करे।

आगे की राह

भारतीय पंथनिरपेक्षता कोई अंधी या स्थिर अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक जटिल, विविधतापूर्ण समाज में सामंजस्य स्थापित करने का एक परिपक्व तंत्र है। यह धर्म और राज्य की दीवार को पार कर सामाजिक सुधार का मार्ग प्रशस्त करती है। सतत विकास लक्ष्य-16 (SDG-16: शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के लिए भारतीय पंथनिरपेक्षता का यह सहिष्णु मॉडल संपूर्ण विश्व के लिए एक मार्गदर्शक (Global Best Practice) बन सकता है।

वर्तमान समय में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और पहचान की राजनीति जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की अनुशंसाओं के अनुरूप अंतर-सामुदायिक संवाद को मजबूत करने की आवश्यकता है। 'अमृत काल 2047' के विजन को साकार करने के लिए राज्य को संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का कड़ाई से पालन करना होगा, ताकि भारत सही मायने में 'वसुधैव कुटुम्बकम' (विश्व एक परिवार है) और 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' के आदर्शों को वैश्विक पटल पर स्थापित कर सके।

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