भारतीय समाज में विविधता (Diversity) और बहुलवाद (Pluralism) के सामने वर्तमान चुनौतियां क्या हैं?

 Q. भारतीय समाज में विविधता (Diversity) और बहुलवाद (Pluralism) के सामने वर्तमान चुनौतियां क्या हैं?

Ans - 

भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से एक 'सलाद के प्याले' (Salad Bowl) की भांति रहा है, जहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातियों और निर्जातीय समूहों (Ethnic groups) ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए एक साझा राष्ट्रीय अस्मिता का निर्माण किया है। संविधान के अनुच्छेद 25-28 (धार्मिक स्वतंत्रता), 29-30 (सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार) और अनुसूची 5 तथा 6 इसी बहुलवादी (Pluralistic) और विविधतापूर्ण (Diverse) ढांचे को संस्थागत संरक्षण प्रदान करते हैं। एस. आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि बहुलवाद और पंथनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग हैं।

हालांकि, समकालीन सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण भारत की इस विविधतापूर्ण संरचना के समक्ष कई जटिल और बहुआयामी चुनौतियां उत्पन्न हो गई हैं।

विविधता और बहुलवाद के समक्ष वर्तमान चुनौतियां

बहुलवाद के समक्ष मौजूद इन चुनौतियों का बहुआयामी (PESTLE) विश्लेषण निम्नलिखित है:

1. सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियां

  • बहुसंख्यकवाद और असहिष्णुता (Majoritarianism and Intolerance): सांस्कृतिक एकरूपता (Homogenization) थोपने के प्रयास स्थानीय और अल्पसंख्यक संस्कृतियों में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहे हैं। खान-पान, वेशभूषा और आस्था के आधार पर होने वाली हिंसक घटनाएं (जैसे- मॉब लिंचिंग) बहुलवादी ताने-बाने को कमजोर करती हैं।

  • भाषाई अस्मिता का संकट: वैश्वीकरण के प्रभाव और अंग्रेजी/हिंदी के बढ़ते वर्चस्व के कारण क्षेत्रीय तथा जनजातीय भाषाएं विलुप्त हो रही हैं। गणेश देवी के भाषाई सर्वेक्षण के अनुसार, विगत 50 वर्षों में भारत ने अपनी 20% से अधिक भाषाएं खो दी हैं।

  • जातीय और निर्जातीय संघर्ष: मणिपुर जैसे हालिया पूर्वोत्तर के निर्जातीय संघर्ष (मैतेई बनाम कुकी) संसाधनों पर नियंत्रण और पहचान के संरक्षण के टकराव का स्पष्ट उदाहरण हैं।

2. राजनीतिक और विधिक चुनौतियां

  • पहचान की राजनीति (Identity Politics): वोट बैंक की राजनीति ने जाति और धर्म के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण किया है। संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना विविधता के लिए घातक है।

  • क्षेत्रवाद (Regionalism) और 'भूमिपुत्र' की अवधारणा: स्थानीय रोजगार में आरक्षण (जैसे हरियाणा और आंध्र प्रदेश के हालिया प्रयास) और प्रवासियों के खिलाफ हिंसा (उदा. महाराष्ट्र या असम में उत्तर भारतीयों/बंगालियों के प्रति असंतोष) अनुच्छेद 19(1)(d) और 19(1)(e) (अबाध संचरण और निवास की स्वतंत्रता) के समक्ष विधिक व राजनीतिक चुनौती प्रस्तुत करते हैं।

3. आर्थिक और विकासात्मक चुनौतियां

  • असमान विकास (Uneven Development): दक्षिण और उत्तर भारत के बीच बढ़ती आर्थिक और जनसांख्यिकीय खाई ने अंतर-राज्यीय प्रवासन (Inter-state migration) को बढ़ाया है, जिससे गंतव्य राज्यों में भाषाई और सांस्कृतिक घर्षण उत्पन्न हो रहा है।

  • संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा: जल विवाद (जैसे कावेरी नदी विवाद) और भूमि अधिग्रहण के मुद्दे दो अलग-अलग भाषाई या सांस्कृतिक राज्यों के बीच कटुता पैदा कर रहे हैं।

4. तकनीकी और साइबर चुनौतियां (Technological Challenges)

  • इको-चेम्बर्स (Echo-chambers) और एल्गोरिथम पूर्वाग्रह: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उपयोगकर्ताओं को केवल उनकी ही विचारधारा से अवगत कराते हैं, जिससे संवाद (Dialogue) कम होता है और कट्टरपंथ (Radicalization) बढ़ता है।

  • हेट स्पीच और फेक न्यूज़: डीपफेक और भ्रामक सूचनाओं (Misinformation) का त्वरित प्रसार सांप्रदायिक दंगों और सामाजिक अविश्वास का एक प्रमुख आधुनिक हथियार बन गया है।

आगे की राह

विविधता का प्रबंधन केवल सहिष्णुता नहीं, बल्कि विभिन्न समूहों के बीच सक्रिय और सकारात्मक संवाद है। इसे सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं:

  • संस्थागत क्षमता निर्माण: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की 7वीं रिपोर्ट 'क्षमता निर्माण और संघर्ष समाधान' की सिफारिशों के अनुरूप, स्थानीय स्तर पर शांति समितियों और अंतर-सामुदायिक संवाद तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

  • विधिक ढांचा और पुलिस सुधार: नफरत भरे भाषणों (Hate Speech) को रोकने के लिए विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करना तथा तहसीन पूनावाला वाद (2018) में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप भीड़ की हिंसा पर सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना।

  • सांस्कृतिक एकीकरण: 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' (Ek Bharat Shreshtha Bharat) जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत त्रि-भाषा सूत्र (Three-language formula) के माध्यम से भाषाई बहुलवाद को बढ़ावा देना।

  • समावेशी विकास: नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम (ADP) के माध्यम से पिछड़े क्षेत्रों का आर्थिक सशक्तिकरण, ताकि असमान विकास से उत्पन्न होने वाले क्षेत्रीय तनावों को कम किया जा सके।

बहुलवाद भारतीय सभ्यता की वह अंतर्निहित शक्ति है, जिसने इसे हजारों वर्षों तक जीवंत रखा है। वर्तमान चुनौतियों का समाधान एकरूपता (Uniformity) में नहीं, बल्कि 'विविधता में एकता' के संवैधानिक आदर्शों को जमीनी स्तर पर उतारने में है। सतत विकास लक्ष्य-16 (SDG-16: शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) की प्राप्ति के साथ, हम 'अमृत काल 2047' में एक ऐसे नव-भारत का निर्माण कर सकते हैं, जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' के वैश्विक दर्शन को स्वयं अपने समाज में चरितार्थ करता हो।

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