'वैश्वीकरण ने भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार किया है, लेकिन साथ ही नई चुनौतियां भी पैदा की हैं।' विश्लेषण करें।
Q. 'वैश्वीकरण ने भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार किया है, लेकिन साथ ही नई चुनौतियां भी पैदा की हैं।' विश्लेषण करें।
Ans -
वैश्वीकरण (Globalization) केवल आर्थिक सीमाओं का एकीकरण नहीं है, बल्कि यह विचारों, संस्कृति और तकनीक का निर्बाध प्रवाह है। 1991 के आर्थिक सुधारों (LPG) के उपरांत, वैश्वीकरण ने भारतीय समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे में गहरे संरचनात्मक परिवर्तन किए हैं। हालिया आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS 2022-23) के अनुसार, महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) बढ़कर 37% हो गई है, जो महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता में वैश्वीकरण के सकारात्मक योगदान का एक प्रमुख संकेतक है।
भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार: सकारात्मक प्रभाव
वैश्वीकरण ने महिलाओं के जीवन में बहुआयामी (PESTLE) अवसर उत्पन्न किए हैं:
आर्थिक सशक्तीकरण: बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के आगमन और सेवा क्षेत्र (आईटी, बीपीओ) के विस्तार ने महिलाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोले हैं। 'गिग इकॉनमी' (Gig Economy) और 'वर्क फ्रॉम होम' मॉडल ने उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है।
सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना: वैश्विक विचारों के संपर्क ने शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाई है। विवाह की आयु में वृद्धि, प्रजनन दर में कमी और एकल परिवारों का चलन महिलाओं को निर्णय लेने की स्वायत्तता प्रदान कर रहा है।
तकनीकी समावेश: ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (जैसे- अमेज़न सहेली) ने ग्रामीण और शहरी स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को वैश्विक बाजार तक पहुंच प्रदान की है।
वैश्विक आंदोलनों से जुड़ाव: #MeToo जैसे वैश्विक आंदोलनों ने कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक मजबूत विमर्श खड़ा किया है, जिससे विशाखा दिशा-निर्देशों और बाद में POSH अधिनियम, 2013 को जमीनी स्तर पर लागू करने में बल मिला है।
नई और उभरती हुई चुनौतियां
स्थिति में सुधार के बावजूद, वैश्वीकरण ने एक 'कांच की छत' (Glass Ceiling) और कई अदृश्य बाधाओं को जन्म दिया है:
दोहरी जिम्मेदारी (Double Burden of Work): पेशेवर जीवन और घरेलू देखभाल (Care Economy) के बीच संतुलन बनाने के दबाव ने महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य (तनाव, अवसाद) पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
श्रम बाजार का अनौपचारीकरण (Informalization): वैश्वीकरण ने सस्ते श्रम की मांग बढ़ाई है। अधिकांश महिलाएं आज भी असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रही हैं, जहाँ उन्हें सामाजिक सुरक्षा (मातृत्व लाभ) प्राप्त नहीं है।
महिलाओं का 'वस्तुकरण' (Commodification): उपभोक्तावादी संस्कृति ने सौंदर्य प्रसाधन और विज्ञापन उद्योगों में महिलाओं को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है, जो पारंपरिक और पश्चिमी मूल्यों के बीच सांस्कृतिक द्वंद्व पैदा करता है।
डिजिटल और साइबर खतरे: साइबर बुलिंग, डीपफेक (Deepfake) और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसे नए तकनीकी अपराध सामने आए हैं, जो महिलाओं की निजता और गरिमा के लिए गंभीर चुनौती हैं।
पिंक कॉलर जॉब्स (Pink-collar Jobs): महिलाओं को प्रायः रिसेप्शनिस्ट, एचआर या नर्सिंग जैसे विशिष्ट रूढ़िवादी पेशों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि STEM (Science, Technology, Engineering, and Mathematics) क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी कम है।
आगे की राह
वैश्वीकरण के लाभों को सर्वसमावेशी बनाने के लिए नीतिगत और सामाजिक स्तर पर लक्षित हस्तक्षेप की आवश्यकता है:
नीतिगत सुधार: समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए और कार्यस्थलों पर 'क्रेच' (Creche) तथा लचीले कामकाजी घंटों (Flexible hours) की व्यवस्था को अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए।
STEM शिक्षा को बढ़ावा: नवोन्मेष (Innovation) और तकनीकी शिक्षा में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए NITI Aayog के 'अटल टिंकरिंग लैब्स' जैसी पहलों का विस्तार होना चाहिए।
डिजिटल सुरक्षा तंत्र: महिलाओं को लक्षित करने वाले साइबर अपराधों से निपटने के लिए मजबूत डेटा संरक्षण और साइबर सुरक्षा कानून आवश्यक हैं।
वैश्वीकरण एक दोधारी तलवार है। इसने भारतीय महिलाओं को 'ग्लोबल विलेज' का सक्रिय नागरिक बनाया है, लेकिन साथ ही नई सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को भी जन्म दिया है। भारत के 'अमृत काल 2047' के विजन और सतत विकास लक्ष्य-5 (SDG-5: लैंगिक समानता) को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि महिलाओं के विकास (Development of Women) के बजाय 'महिलाओं के नेतृत्व में विकास' (Women-led Development) के प्रतिमान को अपनाया जाए।