केस स्टडी थीमः विकास परियोजनाएं बनाम पर्यावरण संरक्षण (Tribal Displacement)।
Q. केस स्टडी थीमः विकास परियोजनाएं बनाम पर्यावरण संरक्षण (Tribal Displacement)।
Ans -
किसी भी विकासशील राष्ट्र के समक्ष 'आर्थिक संवृद्धि' (Economic Growth) और 'पारिस्थितिक संरक्षण' (Ecological Conservation) के मध्य संतुलन स्थापित करना एक अत्यंत जटिल प्रशासनिक चुनौती है। भारत के संदर्भ में, यह द्वंद्व तब और भी संवेदनशील हो जाता है जब विकास परियोजनाओं (जैसे- बड़े बांध, खनन, और अवसंरचना निर्माण) के कारण मूल निवासियों एवं जनजातीय समुदायों का विस्थापन (Tribal Displacement) होता है। वर्जिनियस खाखा समिति (Xaxa Committee, 2014) की रिपोर्ट के अनुसार, यद्यपि भारत की कुल जनसंख्या में जनजातियों का हिस्सा लगभग 8.6% है, किंतु विकासात्मक परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले कुल लोगों में उनकी हिस्सेदारी 40% से अधिक रही है। यह स्थिति न केवल संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची की भावना को चुनौती देती है, बल्कि समावेशी विकास के मूल सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
विकास बनाम विस्थापन: बहुआयामी प्रभाव (PESTLE विश्लेषण)
जनजातीय विस्थापन केवल एक भौगोलिक स्थानांतरण नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था का विघटन है। इसके प्रभावों को निम्नलिखित आयामों में समझा जा सकता है:
राजनीतिक एवं विधिक प्रभाव (Political & Legal)
संवैधानिक अधिकारों का हनन: ग्राम सभा की पूर्व सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण करना पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
लोकतांत्रिक वंचना: विस्थापन के बाद नए स्थानों पर जनजातीय समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्षीण हो जाता है, जिससे निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में उनकी भागीदारी समाप्त हो जाती है।
आर्थिक प्रभाव (Economic)
आजीविका का संकट: वनों पर आधारित पारंपरिक आजीविका (लघु वनोपज - MFP) छिन जाने से वे भूमिहीन खेतिहर या असंगठित दिहाड़ी मजदूर बनने को विवश हो जाते हैं।
मुआवजे की अपर्याप्तता: 'भूमि के बदले नकद' (Cash-for-Land) मॉडल अक्सर विफल रहा है, क्योंकि वित्तीय साक्षरता के अभाव में नकद राशि शीघ्र समाप्त हो जाती है, जो उन्हें स्थायी गरीबी के दुष्चक्र में धकेल देती है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव (Social & Cultural)
अस्तित्वगत संकट: जनजातीय समाज का अस्तित्व उनके प्राकृतिक आवास ('जल, जंगल और जमीन') से गहराई से जुड़ा होता है। विस्थापन से उनकी विशिष्ट भाषा, परंपराओं, और सामुदायिक बंधनों (Community Kinship) का विघटन होता है।
स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच बाधित होने से महिलाओं और बच्चों में कुपोषण एवं मानव तस्करी (Human Trafficking) जैसी गंभीर सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental)
जनजातीय समुदाय सदियों से प्रकृति के 'स्वाभाविक रक्षक' (Natural Custodians) रहे हैं। उन्हें वनों से बेदखल करने से न केवल पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान (Traditional Ecological Knowledge) का ह्रास होता है, बल्कि बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और जैव-विविधता का नुकसान भी होता है।
प्रशासनिक विफलताएं और विद्यमान चुनौतियाँ
LARR अधिनियम, 2013 का लचर क्रियान्वयन: 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013' में 'सामाजिक प्रभाव आकलन' (Social Impact Assessment - SIA) को अनिवार्य किया गया है, किंतु अक्सर इसे केवल एक औपचारिक प्रक्रिया मानकर दरकिनार कर दिया जाता है।
कॉर्पोरेट-राज्य गठजोड़ बनाम ग्राम सभा: सर्वोच्च न्यायालय ने वेदांता (नियमगिरी) वाद (2013) में स्पष्ट किया था कि खनन परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है। इसके बावजूद, कई बार प्रशासनिक दबाव में इस सहमति को प्राप्त करने की औपचारिकता पूरी की जाती है।
समता वाद (Samatha Judgment, 1997) की अनदेखी: इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने 5वीं अनुसूची के क्षेत्रों में निजी कंपनियों को आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाई थी, किंतु विकास के नाम पर इस सुरक्षा कवच को अक्सर कमजोर किया जाता है।
समावेशी विकास एवं द्वंद्व समाधान हेतु रणनीतिक उपाय
एक प्रशासक के रूप में, विकास और संरक्षण के इस द्वंद्व को सुलझाने हेतु निम्नलिखित बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है:
'पुनर्वास प्रथम' (Rehabilitation First) का सिद्धांत: किसी भी परियोजना की शुरुआत से पूर्व, विस्थापितों का पूर्ण और गरिमापूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित किया जाना चाहिए। भूमि के बदले भूमि (Land for Land) और रोजगार सुनिश्चित करने वाले मॉडलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सशक्त सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA): SIA प्रक्रिया को स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा पूर्ण निष्पक्षता और वैज्ञानिक आधार पर संपन्न किया जाना चाहिए, जिसमें स्थानीय भाषा में जन-सुनवाई (Public Hearing) अनिवार्य हो।
लाभ साझाकरण (Benefit Sharing): खान और खनिज (विकास और नियमन) अधिनियम के तहत स्थापित जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) के फंड का उपयोग सीधे प्रभावित समुदायों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका संवर्द्धन के लिए किया जाना चाहिए।
स्वतंत्र पूर्व सूचित सहमति (FPIC): संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र (UNDRIP) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप, किसी भी भूमि अधिग्रहण से पूर्व जनजातीय समुदायों की 'Free, Prior and Informed Consent' सुनिश्चित करना प्रशासनिक सत्यनिष्ठा का मानक होना चाहिए।
आगे की राह
कोई भी विकास परियोजना तब तक राष्ट्र-निर्माण का हिस्सा नहीं बन सकती, जब तक कि उसकी नींव में समाज के सबसे वंचित वर्ग के आंसू शामिल हों। भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश और आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षा को जनजातीय अधिकारों की कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता।
हमें एक ऐसे 'हरित और समावेशी विकास' (Green and Inclusive Development) मॉडल की ओर बढ़ना होगा जो सतत विकास लक्ष्य 10 (असमानता में कमी) और सतत विकास लक्ष्य 15 (भूमि पर जीवन) के अनुरूप हो। प्रशासन, कॉर्पोरेट और नागरिक समाज के सहयोगात्मक प्रयासों से ही हम जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकते हैं। यह संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण ही 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र को यथार्थ में बदलेगा और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन पर आधारित 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को एक ठोस एवं न्यायपूर्ण आधार प्रदान करेगा।