कमजोर वर्गों (Vulnerable Sections) के प्रति करुणा (Compassion) और सहानुभूति (Empathy) सिविल सेवा का मूल है। उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
Q. कमजोर वर्गों (Vulnerable Sections) के प्रति करुणा (Compassion) और सहानुभूति (Empathy) सिविल सेवा का मूल है। उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
Ans -
सहानुभूति (Empathy) और करुणा (Compassion) केवल मानवीय भावनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) में सुशासन के अपरिहार्य स्तंभ हैं। सहानुभूति का अर्थ है स्वयं को दूसरे की स्थिति में रखकर उसकी पीड़ा को समझना, जबकि करुणा उस पीड़ा को दूर करने के लिए सक्रिय और सकारात्मक कदम उठाने की प्रेरणा है।
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि एक सिविल सेवक के लिए सत्यनिष्ठा और वस्तुनिष्ठता के साथ-साथ कमजोर वर्गों (महिलाओं, वृद्धों, दिव्यांगों, अनुसूचित जातियों/जनजातियों) के प्रति संवेदनशीलता होना अनिवार्य है। भारत जैसे विविधतापूर्ण और विकासात्मक चुनौतियों वाले राष्ट्र में, जहाँ लोक प्रशासन का अंतिम लक्ष्य संविधान के अनुच्छेद 38 (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय) को प्राप्त करना है, करुणा और सहानुभूति के बिना नीतियाँ केवल कागजी दस्तावेज़ बनकर रह जाती हैं।
मुख्य भाग
सहानुभूति और करुणा: सिविल सेवा के आधारभूत मूल्य क्यों?
एक प्रशासक को प्रतिदिन जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन मूल्यों की उपस्थिति प्रशासन को मशीनी और लालफीताशाही (Red-tapism) से निकालकर मानवीय और परिणाम-उन्मुख बनाती है:
नीति निर्माण और क्रियान्वयन में यथार्थवाद: सहानुभूति एक प्रशासक को वातानुकूलित कमरों से बाहर निकालकर जमीनी हकीकत समझने में मदद करती है। इससे नीतियाँ अधिक व्यावहारिक और लक्षित (Targeted) बनती हैं।
प्रशासनिक वस्तुनिष्ठता (Weberian Bureaucracy) की कमियों को दूर करना: मैक्स वेबर का कठोर नौकरशाही मॉडल नियमों पर अत्यधिक बल देता है। करुणा इन नियमों को कमजोर वर्गों के पक्ष में मानवीय दृष्टिकोण से लागू करने का विवेक प्रदान करती है, जिसे 'सकारात्मक कार्रवाई' (Affirmative Action) कहा जाता है।
गांधीजी का जंतर (Gandhi's Talisman): यह प्रशासक को निर्णय लेते समय समाज के सबसे अंतिम और असहाय व्यक्ति ('अंत्योदय') के चेहरे को याद करने की कसौटी प्रदान करता है।
समावेशी विकास (Inclusive Growth): सतत विकास लक्ष्य (SDG) 10 (असमानताओं में कमी) और SDG 16 (शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) को प्राप्त करने के लिए वंचित वर्गों का मुख्यधारा में आना आवश्यक है, जो करुणा-आधारित प्रशासन के बिना असंभव है।
कमजोर वर्गों के प्रति करुणा और सहानुभूति के विविध आयाम
प्रशासनिक स्तर पर इन मूल्यों का बहुआयामी प्रभाव देखने को मिलता है:
सामाजिक सशक्तिकरण (Social): एक संवेदनशील अधिकारी कन्या भ्रूण हत्या, छुआछूत या बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ केवल कानूनी कार्रवाई नहीं करता, बल्कि समाज में व्यवहारिक परिवर्तन (Behavioral Change) लाने के लिए समुदाय के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ता है।
आर्थिक न्याय (Economic): प्रवासी मजदूरों या दिहाड़ी कामगारों के लिए योजनाएं बनाते समय, एक सहानुभूतिपूर्ण प्रशासक उनके 'माइग्रेशन पैटर्न' और आजीविका के संकट को समझकर मनरेगा (MGNREGA) या जन वितरण प्रणाली (PDS) को सुचारू रूप से लागू करता है।
तकनीकी और संरचनात्मक (Technological/Infrastructural): ई-गवर्नेंस के दौर में डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) एक बड़ी चुनौती है। एक करुणावान अधिकारी यह सुनिश्चित करता है कि तकनीक से अनभिज्ञ वृद्ध या निरक्षर नागरिक सरकारी सेवाओं से वंचित न रहें (जैसे- कॉमन सर्विस सेंटर तक उनकी पहुँच सुलभ बनाना)।
प्रशासनिक करुणा और सहानुभूति के उत्कृष्ट उदाहरण
भारतीय प्रशासनिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ अधिकारियों ने नियमों की परिधि में रहते हुए करुणा के आधार पर असाधारण कार्य किए हैं:
प्रशांत नायर (IAS) - 'कंपैशनेट कोझिकोड' (Compassionate Kozhikode): उन्होंने प्रशासन और नागरिकों के बीच एक सेतु बनाते हुए 'ऑपरेशन सुलेमानी' शुरू किया, ताकि जिले में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। यह जनभागीदारी और प्रशासनिक करुणा का उत्कृष्ट मॉडल है।
आर्मस्ट्रांग पामे (IAS) - 'द मिरेकल मैन ऑफ मणिपुर': सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की पीड़ा को समझते हुए, उन्होंने बिना सरकारी फंड के, जन-सहयोग (Crowdfunding) से 100 किमी लंबी सड़क का निर्माण करवाया।
संदीप नंदूरी (IAS) - 'कैफे एबल' (Cafe Able): तूतूकुड़ी में दिव्यांग जनों (PwDs) को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने उनके द्वारा संचालित एक कैफे की स्थापना की। यह केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि उनके आर्थिक सशक्तिकरण के लिए उठाया गया करुणा आधारित कदम था।
कोविड-19 महामारी के दौरान प्रबंधन: कई जिलाधिकारियों ने प्रवासी मजदूरों के पैदल घर लौटने की पीड़ा को समझा (सहानुभूति) और उनके लिए परिवहन, भोजन तथा आश्रय की तत्काल व्यवस्था की (करुणा)।
आगे की राह (Way Forward)
प्रशासनिक तंत्र में इन मूल्यों को संस्थागत रूप देने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है:
भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) का प्रशिक्षण: LBSNAA और अन्य राज्य प्रशिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षु अधिकारियों को केस-स्टडी और 'विलेज विजिट' के माध्यम से संवेदनशीलता का व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
मिशन कर्मयोगी का प्रभावी क्रियान्वयन: 'रूल-बेस्ड' (नियम आधारित) से 'रोल-बेस्ड' (भूमिका आधारित) प्रशासन की ओर संक्रमण सुनिश्चित करना, जहाँ अधिकारी स्वयं को शासक नहीं बल्कि 'लोक सेवक' मानें।
नागरिक घोषणा पत्र (Citizen Charter) और सामाजिक लेखा परीक्षा (Social Audit): प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए इन उपकरणों को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि कमजोर वर्गों की आवाज़ सुनी जा सके।
निष्कर्ष
लोक प्रशासन में नियम और कानून शरीर के कंकाल के समान हैं, जबकि सहानुभूति और करुणा उसकी आत्मा हैं। एक प्रशासक जो इन मूल्यों से ओत-प्रोत है, वह केवल एक सरकारी कर्मचारी नहीं रहता, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उत्प्रेरक (Catalyst) बन जाता है। जब लोक सेवा इन आदर्शों के साथ कार्य करती है, तभी 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' का विजन धरातल पर उतरता है और 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन के साथ एक न्यायपूर्ण, समतामूलक 'नव भारत 2047' (New India 2047) का निर्माण संभव हो पाता है।