स्थानीय स्वशासन (73वें और 74वें संशोधन) के लागू होने के 30 वर्षों की उपलब्धियों और चुनौतियों का मूल्यांकन करें।

 Q.  स्थानीय स्वशासन (73वें और 74वें संशोधन) के लागू होने के 30 वर्षों की उपलब्धियों और चुनौतियों का मूल्यांकन करें। 

Ans - 

भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Democratic Decentralisation) की दिशा में वर्ष 1992 में पारित 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम एक युगांतरकारी कदम थे। संविधान के भाग IX और IXA (क्रमशः 11वीं और 12वीं अनुसूची) के माध्यम से राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' (अनुच्छेद 40) के स्वप्न को संवैधानिक और वैधानिक मान्यता प्राप्त हुई। इन संशोधनों के लागू हुए तीन दशक से अधिक का समय बीत चुका है, जो इस 'तृतीय स्तर की सरकार' (Third Tier of Government) की सफलताओं और इसकी संस्थागत दुर्बलताओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने का एक उपयुक्त अवसर प्रदान करता है।

30 वर्षों की प्रमुख उपलब्धियां

इन संशोधनों ने भारत के संघीय ढांचे में एक मूक क्रांति (Silent Revolution) को जन्म दिया है, जिसकी प्रमुख उपलब्धियां निम्नलिखित हैं:

1. राजनीतिक समावेशीकरण और महिला सशक्तिकरण

  • अनुच्छेद 243D और 243T के तहत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाओं (न्यूनतम 33%) के लिए सीटों के आरक्षण ने हाशिए के वर्गों को सत्ता की मुख्यधारा में ला दिया है।

  • वर्तमान में देश भर की स्थानीय संस्थाओं में लगभग 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं, जो वैश्विक स्तर पर एक अभूतपूर्व राजनीतिक प्रयोग है।

  • बिहार का अग्रणी कदम: बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) में महिलाओं को 50% आरक्षण देने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना। इसने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का एक राष्ट्रीय प्रतिमान स्थापित किया, जिसका बाद में कई अन्य राज्यों ने अनुसरण किया।

2. सुदृढ़ संस्थागत और वैधानिक ढांचा

  • राज्य चुनाव आयोग (अनुच्छेद 243K और 243ZA): इसके गठन से हर पांच वर्ष में नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हुए हैं, जिसने राज्य सरकारों के मनमाने ढंग से स्थानीय निकायों को भंग करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई है।

  • राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243I और 243Y): इसने राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वित्तीय संसाधनों के वैज्ञानिक वितरण को एक वैधानिक आधार प्रदान किया है।

3. 'बॉटम-अप' (Bottom-Up) विकास मॉडल

मनरेगा (MGNREGA), प्रधानमंत्री आवास योजना, और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) जैसी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर होने से विकास प्रक्रियाओं में जन-भागीदारी सुनिश्चित हुई है।

विद्यमान चुनौतियां और संरचनात्मक बाधाएं

इन ऐतिहासिक उपलब्धियों के बावजूद, स्थानीय निकाय आज भी 'स्वशासन की संस्थाओं' के बजाय राज्य सरकारों की 'वितरण एजेंसियों' (Delivery Agencies) के रूप में कार्य कर रहे हैं:

1. 3Fs (Funds, Functions, Functionaries) का अपर्याप्त हस्तांतरण

संविधान की 11वीं अनुसूची के 29 और 12वीं अनुसूची के 18 विषयों का पूर्ण प्रशासनिक और वित्तीय हस्तांतरण अधिकांश राज्यों ने नहीं किया है। राज्य के विभागों और पंचायती संस्थाओं के बीच अधिकारों का स्पष्ट विभाजन (Activity Mapping) न होने से कार्यों का दोहराव होता है।

2. वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy) का अभाव

स्थानीय निकाय अपने स्वयं के राजस्व (Own Source Revenue) जैसे संपत्ति कर, जल कर आदि के सृजन में बुरी तरह विफल रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, पंचायतों का अपना राजस्व उनके कुल व्यय का बमुश्किल 5% होता है। वे अत्यधिक रूप से केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य सरकार के अनुदानों (Grants-in-aid) पर निर्भर हैं, जो अक्सर 'टाइड फंड' (Tied Funds - विशिष्ट उपयोग हेतु) होते हैं।

3. 'प्रॉक्सी' प्रतिनिधित्व (Proxy Representation)

महिला आरक्षण की सफलता को ग्रामीण स्तर पर 'मुखिया पति' या 'सरपंच पति' की पितृसत्तात्मक संस्कृति ने काफी हद तक सीमित कर दिया है, जहाँ महिला प्रतिनिधि केवल नाममात्र की होती हैं और वास्तविक सत्ता का संचालन उनके पुरुष रिश्तेदार करते हैं।

4. समानांतर संस्थाओं (Parastatal Bodies) का हस्तक्षेप

शहरी विकास के क्षेत्र में स्मार्ट सिटी SPV (Special Purpose Vehicle), जल बोर्ड, और विकास प्राधिकरणों जैसे गैर-निर्वाचित निकायों ने निर्वाचित शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की शक्तियों और कार्यों का अतिक्रमण कर लिया है।

5. जिला योजना समिति (DPC) की विफलता

अनुच्छेद 243ZD के तहत संपूर्ण जिले के लिए एक विकास योजना तैयार करने हेतु अनिवार्य DPCs का कई राज्यों में या तो गठन नहीं हुआ है, या वे महज कागजी संस्थाएं बनकर रह गई हैं।

बिहार के विकास में स्थानीय स्वशासन की अपरिहार्यता

बिहार जैसे कृषि प्रधान, उच्च जनसंख्या घनत्व और तीव्र गति से हो रहे शहरीकरण वाले राज्य में सुशासन की स्थापना केवल सचिवालय से नहीं हो सकती। पटना और सभी बिहार के डिस्ट्रिक्ट में समान, टिकाऊ और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय संस्थाओं का सशक्त होना अनिवार्य है। चाहे वह उत्तरी बिहार में बाढ़ प्रबंधन हो, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) हो, या प्राथमिक स्वास्थ्य एवं शिक्षा का सुदृढ़ीकरण हो—इन सभी जमीनी चुनौतियों का प्रभावी समाधान तभी संभव है जब PRIs और ULBs के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन और प्रशासनिक नियंत्रण हो।

आगे की राह

स्थानीय स्वशासन ने भारत में लोकतंत्र की जड़ों को गहरा किया है और करोड़ों नागरिकों को शासन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया है। इसके समक्ष मौजूद चुनौतियों के निवारण हेतु निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की सिफारिशों के अनुरूप शक्तियों, कार्यों और उत्तरदायित्वों का स्पष्ट 'एक्टिविटी मैपिंग' (Activity Mapping) किया जाना चाहिए।

  • स्थानीय संस्थाओं को कर उगाहने की शक्तियों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों को बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए।

  • स्थानीय जन-प्रतिनिधियों, विशेषकर महिलाओं का निरंतर संस्थागत क्षमता निर्माण (Capacity Building) सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि वे प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझ सकें।

भारतीय राजव्यवस्था में स्थानीय स्वशासन का भविष्य इसी बात पर निर्भर करता है कि राज्य सरकारें सत्ता के विकेंद्रीकरण के प्रति कितनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाती हैं। जब त्रिस्तरीय व्यवस्था आर्थिक और प्रशासनिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगी, तभी भारत में वास्तविक 'सुशासन' और ग्राम स्वराज का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1