भारत में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें। क्या इसमें संशोधन की आवश्यकता है?

 Q, भारत में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें। क्या इसमें संशोधन की आवश्यकता है?

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भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में 'आया राम, गया राम' की अवसरवादी संस्कृति पर अंकुश लगाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) को शामिल कर दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लागू किया गया था। इसका मूल उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थों या पद की लालसा के लिए पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकना और 'जनादेश' (Public Mandate) की पवित्रता का सम्मान करना था।

दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता का मूल्यांकन

पिछले लगभग चार दशकों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि यह कानून कुछ मोर्चों पर सफल रहा है, परंतु कई स्तरों पर इसकी प्रभावशीलता संदिग्ध प्रतीत होती है।

1. सकारात्मक प्रभाव (उपलब्धियां)

  • राजनीतिक स्थिरता: 1985 के बाद से व्यक्तिगत दल-बदल की घटनाओं में भारी कमी आई है, जिससे सरकारों को अस्थिर करने की प्रवृत्ति पर कुछ हद तक रोक लगी है।

  • जनादेश की रक्षा: चुनाव प्रणाली में नागरिक जिस राजनीतिक विचारधारा और घोषणापत्र के लिए वोट देते हैं, यह कानून उस वैचारिक प्रतिबद्धता को एक वैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।

  • भ्रष्टाचार पर अंकुश: 'हॉर्स ट्रेडिंग' (Horse Trading) और विधायकों/सांसदों की धन-बल से खरीद-फरोख्त की 'खुदरा राजनीति' को हतोत्साहित करने में यह कानून एक मनोवैज्ञानिक बाधा के रूप में कार्य करता है।

2. विफलताएं और विद्यमान चुनौतियां

  • सामूहिक दल-बदल (Wholesale Defection) को वैधानिकता: 91वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा 1/3 सदस्यों के विभाजन (Split) की छूट को समाप्त कर दिया गया था, परंतु यह अभी भी किसी दल के 2/3 सदस्यों के विलय (Merger) को वैध मानता है। इससे थोक में विधायकों को तोड़ने और 'रिजॉर्ट पॉलिटिक्स' (Resort Politics) की एक नई अलोकतांत्रिक परिपाटी का जन्म हुआ है।

  • पीठासीन अधिकारी (Speaker) की पक्षपातपूर्ण भूमिका: दसवीं अनुसूची के तहत पीठासीन अधिकारी का निर्णय अंतिम होता है। कई बार सत्ता पक्ष के दबाव में स्पीकर दल-बदल की शिकायतों पर वर्षों तक कोई निर्णय नहीं लेते। किहोतो होलोहान वाद (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय 'न्यायिक समीक्षा' (Judicial Review) के अधीन है, परंतु निर्णय लेने की कोई निश्चित समय-सीमा तय न होने के कारण इसका दुरुपयोग निरंतर जारी है।

  • आंतरिक लोकतंत्र (Intra-Party Democracy) का हनन: यह कानून विधायकों और सांसदों को पार्टी 'व्हिप' (Whip) के अधीन कर देता है। इसके परिणामस्वरूप, जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों या अपनी अंतरात्मा के आधार पर स्वतंत्र रूप से मतदान नहीं कर पाते।

  • इस्तीफे का नया हथकंडा: विधायकों द्वारा सदन की सदस्यता से इस्तीफा देकर सरकार गिराने और तत्पश्चात सत्तारूढ़ दल के टिकट पर उपचुनाव लड़ने की नव-विकसित प्रवृत्ति ने इस कानून की मूल भावना को ही छलावा बना दिया है।

बिहार के विशेष संदर्भ में राजनीतिक स्थिरता की आवश्यकता

बिहार के राजनीतिक इतिहास में गठबंधन की राजनीति (Coalition Politics) और चुनाव पूर्व एवं चुनाव पश्चात गठबंधनों का टूटना या नए सिरे से बनना एक निरंतर परिघटना रही है। हालांकि पूरे राजनीतिक दल या गठबंधन के स्वरूप बदलने पर दल-बदल कानून सीधे तौर पर लागू नहीं होता, परंतु यह लोकतांत्रिक नैतिकता के समक्ष गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

राज्य के तीव्र, संतुलित और समावेशी विकास—जो केवल पटना तक सीमित न होकर सभी बिहार के जिलों के सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचे—के लिए एक वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और स्थिर सरकार अत्यंत आवश्यक है। जब राजनीतिक दल सत्ता के समीकरणों को प्राथमिकता देते हैं, तो इससे न केवल सुशासन (Good Governance) और नीतिगत निरंतरता बाधित होती है, बल्कि राज्य में औद्योगीकरण, निवेश और आधारभूत संरचना के दीर्घकालिक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

क्या इसमें संशोधन की आवश्यकता है?

कानून की वर्तमान खामियों और प्रतिनिधिक लोकतंत्र में उत्पन्न हो रहे नए संकटों को देखते हुए इसमें निम्नलिखित संरचनात्मक संशोधनों की तत्काल आवश्यकता है:

  • निर्णय लेने की शक्ति का हस्तांतरण: दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और चुनाव आयोग की सिफारिशों के अनुसार, दल-बदल के मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार पीठासीन अधिकारी के बजाय चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल को दिया जाना चाहिए। हाल ही में, कीशम मेघचंद्र सिंह वाद (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने दल-बदल से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान के लिए एक स्वतंत्र 'स्थायी न्यायाधिकरण' (Permanent Tribunal) के गठन का सुझाव दिया है।

  • समय-सीमा का निर्धारण: पीठासीन अधिकारी द्वारा अधिकतम 3 महीने के भीतर दल-बदल से संबंधित याचिकाओं का निपटारा करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

  • व्हिप (Whip) का तार्किक उपयोग: विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी व्हिप को केवल अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion), धन विधेयक (Money Bill) या सरकार के अस्तित्व को खतरे में डालने वाले महत्वपूर्ण मतदान तक ही सीमित रखा जाना चाहिए, ताकि जन-प्रतिनिधियों की संसदीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बची रहे।

  • इस्तीफे पर दंडात्मक प्रावधान: राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग (NCRWC) की सिफारिश के अनुरूप, इस्तीफा देकर दल-बदल करने वाले सदस्यों को उस विधानसभा या लोकसभा के शेष कार्यकाल तक कोई भी मंत्री पद धारण करने तथा लाभ का पद लेने से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।

आगे की राह

दसवीं अनुसूची अपने वर्तमान स्वरूप में राजनीतिक शुचिता बनाए रखने में आंशिक रूप से ही सफल रही है। इसने खुदरा दल-बदल को रोकने में सफलता पाई है, परंतु संस्थागत या सामूहिक दल-बदल के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं।

लोकतंत्र की परिपक्वता केवल कानूनों की कठोरता में नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों और जन-प्रतिनिधियों की 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) में निहित है। दल-बदल विरोधी कानून को एक मजबूत निवारक (Deterrent) बनाने के लिए उपरोक्त संशोधनों को लागू करना समय की मांग है। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि निर्वाचित प्रतिनिधि सत्ता और पद के प्रति नहीं, बल्कि अपनी जनता, अपने निर्वाचन क्षेत्र और संविधान के प्रति जवाबदेह बने रहें।

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