शॉर्ट नोट्सः लोकपाल और लोकायुक्त की प्रभावशीलता।
Q. शॉर्ट नोट्सः लोकपाल और लोकायुक्त की प्रभावशीलता।
Ans -
भारतीय लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था में सुचिता (Probity), पारदर्शिता (Transparency) और जवाबदेही (Accountability) सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 'लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013' को अधिनियमित किया गया था। यह संस्था मूलतः स्कैंडिनेवियाई 'ओम्बड्समैन' (Ombudsman) की अवधारणा पर आधारित है, जिसकी अनुशंसा भारत में सर्वप्रथम प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य उच्च राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच करना है।
लोकपाल और लोकायुक्त की प्रभावशीलता का विश्लेषण
प्रभावशीलता के सकारात्मक पक्ष एवं अधिकार
व्यापक क्षेत्राधिकार: लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री (अंतर्राष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा आदि से जुड़े कुछ अपवादों के साथ), केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्य और केंद्र सरकार के ग्रुप ए, बी, सी और डी के अधिकारी शामिल हैं। यह शीर्ष स्तर पर नीतिगत और प्रशासनिक जवाबदेही तय करता है।
जांच एजेंसियों पर अधीक्षण: लोकपाल को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वह केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) सहित किसी भी जांच एजेंसी को निर्देश दे सकता है और उसकी निगरानी कर सकता है।
संपत्ति की कुर्की: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) के तहत भ्रष्ट आचरण से अर्जित संपत्ति को जांच के दौरान ही कुर्क (Attach) करने की शक्ति इसकी निवारक (Deterrent) प्रभावशीलता को बढ़ाती है।
अभियोजन की स्वीकृति: लोकपाल के पास मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का अधिकार है, जिसने पहले की उस व्यवस्था को प्रतिस्थापित कर दिया जहाँ कार्यपालिका स्वयं अपने अधिकारियों पर मुकदमा चलाने का निर्णय लेती थी।
बिहार के विशेष संदर्भ में लोकायुक्त का ढांचा
बिहार राज्य में भ्रष्टाचार के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति को संस्थागत रूप देने के लिए 'बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011' लागू किया गया, जो भारत के सबसे सशक्त राज्य-स्तरीय भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों में से एक है।
दायरा: इसके अधिकार क्षेत्र में मुख्यमंत्री, मंत्रीमंडल और सभी स्तर के लोक सेवक आते हैं।
न्यायिक और पुलिस शक्तियाँ: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC, 1973) के तहत बिहार लोकायुक्त की जांच इकाई को पुलिस के समान तलाशी और जब्ती (Search and Seizure) की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
संशोधन (2021): फर्जी और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को रोकने तथा संस्थागत समय की बर्बादी से बचने के लिए 2021 में अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, जिससे लोकायुक्त की कार्यकुशलता और अधिक प्रासंगिक हुई है।
प्रभावशीलता में बाधक प्रमुख चुनौतियाँ
नियुक्ति और कार्यप्रणाली में विलंब: यद्यपि अधिनियम 2013 में पारित हुआ, परंतु पहले लोकपाल (न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष) की नियुक्ति 2019 में हुई।
कई राज्यों में आज भी लोकायुक्त के पद रिक्त हैं या संस्थाएं संसाधन विहीन हैं। स्वयं संज्ञान (Suo Motu) शक्ति का अभाव: लोकपाल किसी भी भ्रष्टाचार के मामले में बिना लिखित शिकायत के स्वतः संज्ञान नहीं ले सकता है, जो इसके क्षेत्राधिकार को अत्यंत सीमित कर देता है।
जांच के लिए बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता: लोकपाल के पास अपनी पूर्ण स्वतंत्र जांच मशीनरी का अभाव है। वह जांच के लिए CBI (जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय में "पिंजरे में बंद तोता" कहा था) और राज्य पुलिस पर निर्भर है, जिन पर कार्यपालिका के प्रभाव की संभावना बनी रहती है।
सात वर्ष की वैधानिक सीमा: अधिनियम के तहत अपराध घटित होने के 7 वर्ष बाद कोई शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती।
बड़े भ्रष्टाचार घोटालों (White-collar crimes) के उजागर होने में अक्सर लंबा समय लगता है, जिससे कई गंभीर मामले इसके दायरे से बाहर हो जाते हैं। निराशाजनक सांख्यिकीय परिणाम: स्थापित होने के बाद से लोकपाल को हजारों शिकायतें प्राप्त हुईं, परंतु बहुत कम मामलों में प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) हो सकी और अभियोजन (Prosecution) तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या नगण्य रही है, जो इसकी प्रतीकात्मक उपस्थिति को दर्शाता है।
आगे की राह (Way Forward)
वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) की सिफारिशों के अनुरूप लोकपाल और लोकायुक्त को अपने संसाधनों, धन और स्टाफ के लिए पूर्ण स्वायत्तता मिलनी चाहिए।
स्वतः संज्ञान की शक्ति: मीडिया रिपोर्ट्स या स्पष्ट साक्ष्यों के आधार पर भ्रष्टाचार के मामलों में संस्था को 'सुओ मोटो' (Suo Motu) अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए।
स्वतंत्र जांच विंग की स्थापना: लोकपाल की अपनी एक स्वतंत्र और स्थायी जांच इकाई होनी चाहिए, ताकि बाहरी एजेंसियों पर संस्था की निर्भरता समाप्त हो सके।
संरक्षण तंत्र: व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 (Whistle Blowers Protection Act, 2014) को पूर्णतः लागू किया जाना चाहिए ताकि व्यवस्था के भीतर से भ्रष्टाचार उजागर करने वाले नागरिकों और अधिकारियों को कानूनी व भौतिक सुरक्षा मिल सके।
भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38 (कल्याणकारी राज्य) और 'सुशासन' (Good Governance) की आधारशिला है। यद्यपि लोकपाल और लोकायुक्त का संस्थागत ढांचा वैधानिक रूप से अत्यंत महत्वाकांक्षी है, परंतु इसकी वास्तविक प्रभावशीलता राजनीतिक इच्छाशक्ति, त्वरित नियुक्तियों और इसे एक स्वतंत्र जांच तंत्र सौंपने पर निर्भर करती है। केवल संरचनात्मक खामियों को दूर करके ही इन संस्थाओं को एक प्रतीकात्मक वैधानिक निकाय से एक वास्तविक और सशक्त भ्रष्टाचार निरोधक हथियार में परिवर्तित किया जा सकता है।