शॉर्ट नोट्सः निवारक निरोध (Preventive Detention)।
Q. शॉर्ट नोट्सः निवारक निरोध (Preventive Detention)।
Ans -
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) सर्वोपरि है, परंतु राज्य की सुरक्षा और लोक व्यवस्था (Public Order) को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संविधान में 'निवारक निरोध' (Preventive Detention) का एक असाधारण प्रावधान किया गया है। इसका मूल अर्थ किसी व्यक्ति को अपराध करने के पश्चात् दंडित करने (Punitive Detention) के लिए नहीं, बल्कि उसे भविष्य में कोई संभावित अपराध या समाज विरोधी कार्य करने से रोकने के लिए अग्रिम हिरासत में लेना है। भारत विश्व के उन गिने-चुने लोकतांत्रिक देशों में से है, जिसने शांति काल में भी इसे संवैधानिक मान्यता प्रदान की है।
संवैधानिक प्रावधान और वैधानिक ढांचा
संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत निवारक निरोध को विधिक संरक्षण प्राप्त है:
अनुच्छेद 22(3): यह स्पष्ट करता है कि गिरफ्तारी और हिरासत के विरुद्ध सामान्य सुरक्षा (जैसे- वकील से परामर्श, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुति) उन व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी, जिन्हें निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है।
अनुच्छेद 22(4): किसी भी व्यक्ति को 'सलाहकार बोर्ड' (Advisory Board - उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीशों की अध्यक्षता में) की रिपोर्ट के बिना 3 महीने से अधिक समय तक निवारक निरोध में नहीं रखा जा सकता।
विधायी शक्तियां: संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत संसद (रक्षा, विदेशी मामलों और भारत की सुरक्षा) तथा राज्य विधानमंडल (लोक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति) दोनों को निवारक निरोध कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। इसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA, 1980) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) जैसे कड़े कानून अस्तित्व में आए हैं।
प्रशासनिक औचित्य और मानवाधिकार संबंधी चिंताएं
निवारक निरोध के व्यावहारिक अनुप्रयोग में राज्य की आवश्यकता और मानवाधिकारों के मध्य निरंतर संघर्ष दृष्टिगोचर होता है:
राज्य सुरक्षा और त्वरित कार्रवाई: उग्रवाद, आतंकवाद और संगठित अपराधों को त्वरित रूप से निष्क्रिय करने के लिए यह प्रशासन का सबसे धारदार अस्त्र है। सामान्य आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) की लंबी प्रक्रिया के कारण राष्ट्र-विरोधी तत्वों को जमानत मिलने से रोकने के लिए इसका प्रयोग आवश्यक हो जाता है।
दुरुपयोग और विवेकाधीन शक्तियां: सर्वोच्च न्यायालय ने ए. के. गोपालन वाद (1950) से लेकर रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य (2011) तक बार-बार चेतावनी दी है कि पुलिस और प्रशासन इसका उपयोग सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्याओं से निपटने के लिए 'शॉर्टकट' के रूप में करते हैं। बिना ठोस साक्ष्य के इसका मनमाना प्रयोग विधि के शासन (Rule of Law) और अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है।
बिहार के विशेष संदर्भ में प्रशासनिक उपयोग
बिहार की विशिष्ट कानून-व्यवस्था संबंधी चुनौतियों और जनसांख्यिकीय जटिलताओं से निपटने में निवारक निरोध एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपकरण रहा है:
बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम (CCA), 1981: राज्य में लोक व्यवस्था को बाधित करने वाले आदतन अपराधियों (Habitual offenders) पर नकेल कसने के लिए यह मुख्य विधिक हथियार है।
वर्तमान प्रशासनिक चुनौतियां: वर्तमान परिदृश्य में, पटना और बिहार के सभी जिलों में जिलाधिकारियों (District Magistrates) द्वारा अवैध बालू खनन माफिया, संगठित शराब माफिया और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले असामाजिक तत्वों पर CCA के तहत निवारक निरोध की सख्त कार्रवाई की जाती है। यह राज्य में सुशासन (Good Governance) स्थापित करने में एक शक्तिशाली निवारक ढाल (Deterrent Shield) का कार्य करता है।
आगे की राह
निवारक निरोध राज्य के हाथों में एक 'आवश्यक बुराई' (Necessary Evil) है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह 'पुलिस राज्य' का पर्याय न बन जाए, इसका उपयोग केवल राष्ट्र की सुरक्षा और अत्यंत गंभीर लोक व्यवस्था के मामलों में (अंतिम और दुर्लभतम विकल्प के रूप में) किया जाना चाहिए, न कि साधारण आपराधिक मामलों के लिए।
भविष्य में सलाहकार बोर्ड की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाना और बंदियों को उचित कानूनी एवं तथ्यात्मक आधार समय पर उपलब्ध कराना अनिवार्य है। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है, राज्य की सुरक्षा और नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक अत्यंत नाजुक और उचित संतुलन बनाए रखना ही एक परिपक्व और जीवंत लोकतंत्र की पहचान है।