शॉर्ट नोट्सः ग्राम न्यायालय।
Q. शॉर्ट नोट्सः ग्राम न्यायालय।
Ans -
भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता) के नीति निदेशक तत्व को जमीनी स्तर पर साकार करने के लिए संसद द्वारा 'ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008' पारित किया गया था। इसका मूल दर्शन "न्याय आपके द्वार" (Justice at Doorstep) है। भारत के विधि आयोग की 114वीं रिपोर्ट की सिफारिशों पर आधारित इन न्यायालयों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नागरिक सामाजिक, आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय प्राप्त करने के अवसरों से वंचित न रहे।
ग्राम न्यायालय: संरचना एवं कार्यप्रणाली
अधिकार और कार्यप्रणाली
न्यायाधिकारी की नियुक्ति: ग्राम न्यायालय की अध्यक्षता 'न्यायाधिकारी' (Nyayadhikari) द्वारा की जाती है, जो प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (First Class Judicial Magistrate) के स्तर का अधिकारी होता है। इनकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।
व्यापक क्षेत्राधिकार: इन न्यायालयों को दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) दोनों प्रकार के मामलों की सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, जिससे ग्रामीण विवादों का त्वरित निपटारा संभव हो पाता है।
प्रक्रियात्मक लचीलापन: ये न्यायालय भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के कठोर प्रक्रियात्मक नियमों से बंधे नहीं होते, बल्कि प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों के आधार पर कार्य करते हैं।
मोबाइल कोर्ट की अवधारणा: ग्राम न्यायालय एक चलित न्यायालय (Mobile Court) के रूप में कार्य कर सकते हैं। ये सीधे विवाद स्थल पर जाकर सुलह (Conciliation) और मध्यस्थता (Mediation) के माध्यम से मामलों को सुलझाने को प्राथमिकता देते हैं।
बिहार के विशेष संदर्भ में प्रासंगिकता
बिहार में ग्रामीण न्याय प्रणाली के विकेंद्रीकरण का एक समृद्ध इतिहास रहा है।
वर्तमान में 'बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006' के तहत राज्य में 'ग्राम कचहरी' (Gram Katchahry) का एक मजबूत ढांचा कार्य कर रहा है, जिसका नेतृत्व सीधे निर्वाचित सरपंच द्वारा किया जाता है।
ग्राम कचहरियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की कुछ विशिष्ट धाराओं और छोटे दीवानी विवादों के निपटारे का अधिकार है।
बिहार में ग्राम कचहरियों के वर्तमान मॉडल को यदि ग्राम न्यायालय अधिनियम के साथ एकीकृत कर आवश्यक विधिक और ढांचागत समर्थन (Legal & Infrastructural Support) प्रदान किया जाए, तो राज्य के जिला न्यायालयों में लंबित मुकदमों के बोझ को बड़े पैमाने पर कम किया जा सकता है।
ग्राम न्यायालयों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
राज्यों की उदासीनता और इच्छाशक्ति का अभाव: पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य सूची का विषय होने के कारण, कई राज्य सरकारों ने वित्तीय और प्रशासनिक बाधाओं का हवाला देकर इन न्यायालयों को अधिसूचित ही नहीं किया है।
अधिकार क्षेत्र का टकराव: ग्रामीण स्तर पर ग्राम न्यायालयों, पुलिस प्रशासन, नियमित अधीनस्थ न्यायालयों और वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों के बीच क्षेत्राधिकार को लेकर प्रायः अस्पष्टता बनी रहती है।
बुनियादी ढाँचे की कमी: ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित न्यायालय भवनों, स्टाफ, सुरक्षा कर्मियों, नोटरी और स्टाम्प वेंडर्स की भारी कमी है, जिससे न्यायाधिकारियों का कार्य करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
वित्तीय बाधाएँ: इन न्यायालयों के संचालन का वित्तीय भार मुख्य रूप से राज्य सरकारों पर पड़ता है। केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभिक सहायता के बाद निरंतर वित्तपोषण के अभाव में यह योजना शिथिल पड़ जाती है।
आगे की राह (Way Forward)
वित्तीय सुदृढ़ीकरण: केंद्र सरकार को केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के तहत ग्राम न्यायालयों की स्थापना और संचालन के लिए राज्यों को दी जाने वाली बजटीय सहायता का दायरा बढ़ाना चाहिए।
तकनीकी एकीकरण: ई-कोर्ट्स (e-Courts) मिशन मोड प्रोजेक्ट के तीसरे चरण में ग्राम न्यायालयों को डिजिटल बुनियादी ढांचे से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि मुकदमों की ई-फाइलिंग (e-Filing) और वर्चुअल सुनवाई संभव हो सके।
जागरूकता और प्रशिक्षण: ग्रामीण स्तर पर विधिक साक्षरता शिविरों (Legal Literacy Camps) का आयोजन किया जाना चाहिए। साथ ही, न्यायाधिकारियों को ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक परिवेश और मध्यस्थता तकनीकों में विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
भारतीय न्यायपालिका के समक्ष 'नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड' (NJDG) के आंकड़े करोड़ों लंबित मामलों की गवाही देते हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण विवादों का है। समावेशी और सुलभ न्याय (Inclusive Justice) की लोकतांत्रिक परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए ग्राम न्यायालयों को मात्र वैधानिक प्रावधानों से निकालकर एक जीवंत, सशक्त और सुसज्जित न्यायिक संस्था के रूप में विकसित करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी प्रशासनिक आवश्यकता है।