शॉर्ट नोट्सः परिसीमन आयोग (Delimitation Commission)।
Q. शॉर्ट नोट्सः परिसीमन आयोग (Delimitation Commission)।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'समान प्रतिनिधित्व' (Equal Representation) और 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को धरातल पर उतारने के लिए 'परिसीमन आयोग' (Delimitation Commission) एक अत्यंत महत्वपूर्ण सांविधिक और अर्द्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) निकाय है। इसका मुख्य कार्य नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है।
परिसीमन आयोग: संवैधानिक ढांचा एवं संरचना
भारतीय संविधान में परिसीमन की स्पष्ट और अनिवार्य व्यवस्था की गई है:
अनुच्छेद 82: इसके तहत प्रत्येक जनगणना के पश्चात् संसद द्वारा एक 'परिसीमन अधिनियम' (Delimitation Act) पारित किया जाता है।
अनुच्छेद 170: इसके तहत राज्यों को भी परिसीमन अधिनियम के अनुसार प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
आयोग की संरचना: यह एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इसमें मुख्य रूप से तीन सदस्य होते हैं:
अध्यक्ष: सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश।
पदेन सदस्य: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) या उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त।
संबंधित राज्य के सदस्य: संबंधित राज्य के राज्य चुनाव आयुक्त। (इसके अतिरिक्त संबंधित राज्य के सांसद और विधायक सहयोगी सदस्य (Associate Members) के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता।)
कार्यप्रणाली, शक्तियां और ऐतिहासिक विकास
प्रमुख शक्तियां एवं कार्य
भौगोलिक और जनसांख्यिकीय समता: आयोग का मुख्य कार्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं इस प्रकार निर्धारित करना है कि सभी क्षेत्रों में जनसंख्या का वितरण लगभग समान हो।
SC/ST सीटों का आरक्षण: अनुच्छेद 330 और 332 के तहत आयोग अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर उनके लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करता है।
न्यायिक उन्मुक्ति (Judicial Immunity): परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान शक्ति प्राप्त होती है और अनुच्छेद 329 के तहत इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। जब इसके आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
ऐतिहासिक विकास और संशोधनों का प्रभाव
अब तक भारत में चार बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया है: 1952, 1963, 1973 और 2002।
42वां संविधान संशोधन (1976): परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या को वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर (Freeze) कर दिया गया था।
84वां और 87वां संशोधन अधिनियम: इसके द्वारा लोकसभा और विधानसभा सीटों की कुल संख्या को वर्ष 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया। हालांकि, 2001 की जनगणना के आधार पर राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की आंतरिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण की अनुमति दी गई।
बिहार के विशेष संदर्भ में परिसीमन का प्रभाव
परिसीमन आयोग आदेश, 2008 (2001 की जनगणना पर आधारित) ने बिहार के राजनीतिक और चुनावी भूगोल को व्यापक रूप से पुनर्गठित किया।
समान प्रतिनिधित्व की स्थापना: नए परिसीमन ने शहरी और ग्रामीण जनसंख्या के बदलते घनत्व को संतुलित किया, जिससे पटना, मुजफ्फरपुर और गया जैसे तेजी से शहरीकृत हो रहे क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व मिला।
वंचित वर्गों का सशक्तिकरण: आयोग ने बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से 38 सीटें अनुसूचित जाति (SC) और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित कीं।
लोकसभा में आरक्षण: बिहार की 40 लोकसभा सीटों में जनसांख्यिकीय अनुपात के अनुसार 6 सीटें (गोपालगंज, हाजीपुर, समस्तीपुर, जमुई, गया और सासाराम) अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित की गईं, जिसने राज्य के हाशिए के समुदायों को मुख्यधारा की नीति-निर्माण प्रक्रिया में मजबूत आवाज प्रदान की।
वर्तमान चुनौतियाँ
उत्तर-दक्षिण जनसांख्यिकीय विभाजन: दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। वर्ष 2026 के बाद यदि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है, तो दक्षिणी राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटों में भारी वृद्धि होगी।
संघवाद (Federalism) बनाम लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व: यह स्थिति भारत के संघीय ढांचे के लिए एक चुनौती उत्पन्न करती है, जहां जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने वाले राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित महसूस होने की आशंका है।
क्षेत्रीय असंतुलन: एक ही राज्य के भीतर भी कुछ क्षेत्रों में प्रवास और शहरीकरण के कारण जनसंख्या का भारी दबाव है, जिससे निर्वाचन क्षेत्रों के आकार में विसंगतियां उत्पन्न हो गई हैं।
आगे की राह (Way Forward)
वर्ष 2026 के पश्चात प्रस्तावित परिसीमन की जटिलताओं को सुलझाने के लिए 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) के सिद्धांतों को अपनाना आवश्यक है।
संसद को एक व्यापक सर्वदलीय समिति या एक विशेष 'राष्ट्रीय परिसीमन परिषद' का गठन करना चाहिए, जो जनसंख्या के साथ-साथ राज्यों के भौगोलिक क्षेत्रफल, आर्थिक योगदान और जनसंख्या नियंत्रण में उनके प्रदर्शन को एक समग्र 'वेटेज फॉर्मूला' (Weightage Formula) के तहत संतुलित करे।
सीटों के आवंटन में दक्षिणी और उत्तर-पूर्वी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए वित्त आयोग की तर्ज पर जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को भी एक मानदंड बनाया जा सकता है।
एक निष्पक्ष और पारदर्शी परिसीमन प्रक्रिया न केवल चुनावी राजनीति का आधार है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत वैधता और "सुशासन" (Good Governance) के लिए एक अपरिहार्य आवश्यकता है।