शॉर्ट नोट्सः शून्यकाल और प्रश्नकाल ।
Q. शॉर्ट नोट्सः शून्यकाल और प्रश्नकाल ।
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संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही (Executive Accountability) सुनिश्चित करना एक संवैधानिक अनिवार्यता है, जिसका आधारभूत दर्शन अनुच्छेद 75(3) (केंद्र में) और अनुच्छेद 164(2) (राज्यों में) में निहित है। इस सामूहिक उत्तरदायित्व को व्यावहारिक रूप देने के लिए संसदीय प्रक्रिया में 'प्रश्नकाल' (Question Hour) और 'शून्यकाल' (Zero Hour) जैसे उपकरणों का विकास किया गया है। ये दोनों तंत्र न केवल सरकार की नीतियों की समीक्षा करते हैं, बल्कि जनता की समस्याओं को सर्वोच्च नीति-निर्माण मंच तक पहुंचाते हैं।
प्रश्नकाल और शून्यकाल: विश्लेषणात्मक ढांचा
प्रश्नकाल (Question Hour): अर्थ एवं कार्यप्रणाली
संसदीय कार्यदिवस का पहला घंटा सामान्यतः प्रश्नकाल के लिए निर्धारित होता है। इसका उल्लेख संसदीय प्रक्रिया के नियमों (Rules of Procedure) में स्पष्ट रूप से किया गया है। सरकार की प्रशासनिक और नीतिगत जवाबदेही तय करने के लिए इसमें तीन प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं:
तारांकित प्रश्न (Starred Questions): इनका उत्तर मंत्री द्वारा सदन में मौखिक रूप से दिया जाता है। इसके पश्चात सदस्य पूरक प्रश्न (Supplementary Questions) पूछ सकते हैं, जो कार्यपालिका की नीतिगत सूक्ष्मताओं और कमियों को उजागर करने में अत्यंत प्रभावी होते हैं।
अतारांकित प्रश्न (Unstarred Questions): इनका लिखित उत्तर दिया जाता है तथा इनमें पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं होती। यह मुख्य रूप से सांख्यिकीय, बजटीय या तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करने के लिए उपयोग किया जाता है।
अल्प सूचना प्रश्न (Short Notice Questions): लोक महत्व के अत्यावश्यक मामलों पर 10 दिन से कम की पूर्व सूचना देकर पूछे जाने वाले प्रश्न।
शून्यकाल (Zero Hour): भारतीय संसदीय नवाचार
प्रश्नकाल के तुरंत बाद का समय (प्रायः दोपहर 12 बजे) शून्यकाल कहलाता है।
उत्पत्ति एवं प्रकृति: यह किसी भी संसदीय नियमावली में उल्लिखित नहीं है, बल्कि वर्ष 1962 से यह भारतीय संसदीय नवाचार (Indian Parliamentary Innovation) के रूप में विकसित हुआ है।
तात्कालिक सार्वजनिक महत्व: यह एक अनौपचारिक उपकरण है, जिसमें संसद या विधानमंडल के सदस्य पूर्व निर्धारित सूचना के बिना (पीठासीन अधिकारी को उसी दिन प्रातः सूचना देकर) राष्ट्रीय या क्षेत्रीय महत्व के अति-संवेदनशील और तात्कालिक मुद्दे उठाते हैं, जिनकी प्रतीक्षा सामान्य प्रक्रिया के तहत नहीं की जा सकती।
बिहार के विशेष संदर्भ में प्रासंगिकता (Relevance in Bihar Context)
बिहार विधानमंडल (विधानसभा एवं विधान परिषद) में राज्य के समावेशी विकास और जन-मुद्दों को स्वर देने में इन उपकरणों की रणनीतिक भूमिका है।
जनप्रतिनिधित्व की मुखरता: पटना और बिहार के सभी जिलों से चुनकर आए विधायक अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं—जैसे उत्तरी बिहार में कोसी बेसिन की बाढ़, दक्षिणी बिहार का सुखाड़, कृषि संकट, और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं (जैसे- 'सात निश्चय योजना') के क्रियान्वयन—से जुड़े जमीनी मुद्दों को प्रश्नकाल और शून्यकाल के माध्यम से पटल पर रखते हैं।
प्रशासनिक जवाबदेही: राज्य सचिवालय और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करने तथा लालफीताशाही (Red-tapism) पर नियंत्रण रखने में बिहार विधानसभा का प्रश्नकाल एक सशक्त सामाजिक ऑडिट तंत्र (Social Audit Mechanism) के रूप में कार्य करता है।
वर्तमान चुनौतियाँ
संसदीय व्यवधान (Parliamentary Disruptions): हाल के वर्षों में शोरगुल और राजनीतिक गतिरोध के कारण प्रश्नकाल और शून्यकाल का लगातार बाधित होना एक गंभीर चिंता का विषय है, जिससे रचनात्मक बहस (Constructive Debate) का बहुमूल्य समय नष्ट होता है।
अपूर्ण या भ्रामक उत्तर: कई बार कार्यपालिका द्वारा सीधे उत्तर देने से बचना या अत्यधिक तकनीकी आंकड़ों में जवाब को उलझा देना, जिससे प्रश्न का मूल उद्देश्य विफल हो जाता है।
आगे की राह (Way Forward)
विधायिका की जीवंतता और 'सुशासन' (Good Governance) इस बात पर निर्भर करता है कि सदन में संवाद का स्तर कैसा है। कार्यपालिका की जवाबदेही को और धारदार बनाने के लिए पीठासीन अधिकारियों को संसदीय व्यवधानों पर 'शून्य सहिष्णुता' (Zero Tolerance) की नीति अपनानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, 'शैडो कैबिनेट' (Shadow Cabinet) जैसी परिपाटियों का विकास किया जाना चाहिए ताकि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच प्रश्न और उत्तर की गुणवत्ता उच्च स्तरीय और तथ्यपरक हो सके। अंततः, एक पारदर्शी और उत्तरदायी लोकतांत्रिक प्रशासन के लिए प्रश्नकाल और शून्यकाल की पवित्रता को बनाए रखना अपरिहार्य है।