शॉर्ट नोट्स: बिहार में खिलाफत आंदोलन ।

 Q. शॉर्ट नोट्स: बिहार में खिलाफत आंदोलन ।

Ans - 

बिहार में खिलाफत आंदोलन: हिंदू-मुस्लिम एकता और राजनीतिक जागरण का मील का पत्थर

खिलाफत आंदोलन (1919-1922) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसा अद्वितीय कालखंड है, जिसने धार्मिक भावनाओं को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के व्यापक लक्ष्य के साथ एकीकृत कर दिया। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा तुर्की के खलीफा (ऑटोमन साम्राज्य) के अधिकारों की कटौती और सेव्रेस की संधि (Treaty of Sèvres, 1920) के अपमानजनक प्रावधानों के विरोध में यह आंदोलन उभरा। महात्मा गांधी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता के एक ऐसे अवसर के रूप में देखा, "जो सौ वर्षों में भी नहीं आएगा"। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की इसी मुख्यधारा से जुड़कर बिहार ने इस जन-विद्रोह में एक अत्यंत सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाई।

बिहार में खिलाफत आंदोलन की पृष्ठभूमि और वैचारिक आधार

ब्रिटिश विश्वासघात के विरुद्ध भारत के अन्य हिस्सों की तरह बिहार में भी तीव्र असंतोष पनप रहा था, जिसके निम्नलिखित कारण थे:

  • धार्मिक भावनाओं पर आघात: तुर्की के सुल्तान (खलीफा) को विश्व भर के मुसलमान अपना धार्मिक सर्वोच्च नेता मानते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके साम्राज्य के विघटन से बिहार के जनमानस में गहरा रोष उत्पन्न हुआ।

  • रोलट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड: खिलाफत के प्रश्न के साथ-साथ 'बिना अपील, बिना वकील, बिना दलील' वाले रोलट एक्ट (1919) और पंजाब में हुए बर्बर जनसंहार ने बिहार में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक साझा मंच पर ला खड़ा किया।

नेतृत्व और जन-भागीदारी का भौगोलिक विस्तार

बिहार में खिलाफत आंदोलन कुलीन वर्गों के ड्राइंग रूम से निकलकर सीधे जनता के बीच पहुंचा, जिसकी सांगठनिक संरचना अत्यंत मजबूत थी:

  • संयुक्त नेतृत्व और मार्गदर्शन: बिहार में इस आंदोलन की कमान मौलाना मज़हरुल हक़, हसन इमाम, डॉ. सैयद महमूद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे दिग्गज नेताओं ने संभाली। 16 फरवरी 1919 को हसन इमाम की अध्यक्षता में पटना में पहली बड़ी खिलाफत सभा आयोजित की गई।

  • भौगोलिक प्रसार और जन-संगठन: यह आंदोलन केवल कुछ प्रमुख शहरी केंद्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका तीव्र और सुसंगठित प्रसार पटना और बिहार के सभी जिलों में हुआ। राज्य के हर कोने में खिलाफत कमेटियों का गठन किया गया, जहां गांव-गांव में जन-सभाएं कर आम जनता को ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध गोलबंद किया गया।

  • असहयोग के साथ विलय: अगस्त 1920 में भागलपुर में आयोजित बिहार प्रांतीय सम्मेलन (Bihar Provincial Conference) में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रभाव से महात्मा गांधी के असहयोग के प्रस्ताव को भारी समर्थन मिला। इसके परिणामस्वरूप बिहार में खिलाफत और असहयोग आंदोलन वस्तुतः एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए।

आंदोलन की कार्यप्रणाली और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

खिलाफत आंदोलन के दौरान बिहार में जो रणनीतियां अपनाई गईं, उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन की आर्थिक और प्रशासनिक रीढ़ पर सीधा प्रहार किया:

  • उपाधियों का त्याग और अदालतों का बहिष्कार: पटना हाईकोर्ट के कई प्रतिष्ठित वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। शाह बद्रुद्दीन ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'शम्स-उल-उलेमा' (Shams-ul-Ulema) की उपाधि वापस कर दी।

  • सदाकत आश्रम की स्थापना: मौलाना मज़हरुल हक़ ने दीघा (पटना) के निकट अपने मित्र खैरू मियां द्वारा दान की गई भूमि पर 'सदाकत आश्रम' की स्थापना की। यह आश्रम हिंदू-मुस्लिम एकता, खादी उत्पादन और रचनात्मक कार्यों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

  • पत्रकारिता के माध्यम से जनजागरण: मौलाना मज़हरुल हक़ ने 30 सितंबर 1921 को सदाकत आश्रम से 'द मदरलैंड' (The Motherland) नामक अंग्रेजी समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया। इस पत्र ने निर्भीकता के साथ ब्रिटिश दमनकारी नीतियों की आलोचना की और राष्ट्रीय भावना का प्रसार किया।

  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: राज्य भर में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और खादी को स्वावलंबन के प्रतीक के रूप में अपनाया गया।

ऐतिहासिक मूल्यांकन और आगे की राह

यद्यपि 1924 में तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा द्वारा खलीफा के पद को ही समाप्त कर दिए जाने के कारण खिलाफत आंदोलन का मूल कारण स्वतः समाप्त हो गया, परंतु भारतीय और विशेषकर बिहार के राजनीतिक इतिहास में इसके प्रभाव अत्यंत दूरगामी रहे।

इस आंदोलन ने बिहार की क्षेत्रीय राजनीति में एक अभूतपूर्व सांप्रदायिक सद्भाव की नींव रखी और स्वतंत्रता संग्राम को जन-जन का आंदोलन बना दिया। इसी राजनीतिक चेतना और संगठनात्मक ढांचे ने आगामी सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान बिहार को एक अजेय राजनीतिक दुर्ग के रूप में स्थापित किया। आधुनिक बिहार के प्रशासनिक और सामाजिक नीति-निर्माण में आज भी उसी समावेशी चेतना और सांप्रदायिक सौहार्द की आवश्यकता है, जिसे खिलाफत आंदोलन के दौरान गांधीजी और मौलाना मज़हरुल हक़ ने सींचा था।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1