शॉर्ट नोट्सः मानवाधिकार आयोग।

 Q. शॉर्ट नोट्सः मानवाधिकार आयोग।

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मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र (UDHR, 1948) के आदर्शों और संयुक्त राष्ट्र के 'पेरिस सिद्धांतों' (Paris Principles, 1991) को भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में संस्थागत रूप देने के लिए संसद द्वारा 'मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993' (PHRA, 1993) अधिनियमित किया गया। इसी वैधानिक ढांचे के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोगों (SHRCs) का गठन किया गया है। इसका मूल उद्देश्य जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा (संविधान के अनुच्छेद 21 और 14) से संबंधित अधिकारों का प्रहरी (Watchdog) बनना है।

मानवाधिकार आयोग: संरचना एवं व्यापक भूमिका

शक्तियां और कार्यप्रणाली

  • दीवानी न्यायालय की शक्तियां: जांच के दौरान आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के तहत एक दीवानी न्यायालय की शक्तियां प्राप्त हैं। यह समन जारी कर सकता है और शपथ पत्र पर साक्ष्य मांग सकता है।

  • स्वतः संज्ञान (Suo Motu) का अधिकार: आयोग केवल प्राप्त शिकायतों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि वह समाचार पत्रों, रिपोर्टों या अन्य माध्यमों से मानवाधिकार उल्लंघन (जैसे- फर्जी मुठभेड़, हिरासत में यातना) की जानकारी मिलने पर स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरू कर सकता है।

  • जेलों और बंदीगृहों का निरीक्षण: कैदियों के रहने की स्थिति, स्वास्थ्य और उनके बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन का मूल्यांकन करने के लिए आयोग राज्य की जेलों और सुधार गृहों का औचक निरीक्षण कर सकता है।

  • कानूनी और नीतिगत समीक्षा: यह आतंकवाद निरोधी कानूनों, जेल नियमावली और अन्य वैधानिक प्रावधानों की समीक्षा करता है ताकि वे मानवाधिकारों के अनुरूप हों।

बिहार के विशेष संदर्भ में कार्यप्रणाली

राज्य में प्रशासनिक जवाबदेही और पुलिस-प्रशासन के मानवीय चेहरे को सुनिश्चित करने के लिए 'बिहार मानवाधिकार आयोग' (BHRC) का गठन किया गया है।

  • राज्य में विशेषकर समाज के कमजोर वर्गों, महादलितों और महिलाओं के मानवाधिकारों की रक्षा में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • पटना और बिहार के सभी जिलों में पुलिस ज्यादती, हिरासत में मौत (Custodial Death), डायन प्रथा (Witch-hunting) जैसी सामाजिक कुरीतियों और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव जैसे गंभीर मामलों में आयोग ने संज्ञान लेकर पीड़ित पक्ष को वित्तीय मुआवजा और त्वरित विधिक सहायता सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य किया है।

  • सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में मानवाधिकार साक्षरता (Human Rights Literacy) का प्रसार कर यह राज्य के नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक कर रहा है।

प्रभावशीलता में बाधक प्रमुख चुनौतियाँ

  • सलाहकारी प्रकृति (Advisory Nature): सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी में NHRC को "दंतविहीन बाघ" (Toothless Tiger) कहा था। आयोग की सिफारिशें सरकार या संबंधित प्राधिकारी पर बाध्यकारी नहीं होती हैं, जिससे इसकी प्रभावशीलता एक 'सुझाव देने वाले निकाय' तक सीमित रह जाती है।

  • स्वतंत्र जांच तंत्र का अभाव: आयोग के पास अपनी कोई विशेष और पूर्ण स्वतंत्र जांच मशीनरी नहीं है। मामलों की जांच के लिए इसे अंततः उसी पुलिस तंत्र या सरकारी एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिन पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगे होते हैं।

  • सशस्त्र बलों के मामलों में सीमित अधिकार: PHRA, 1993 के तहत सशस्त्र बलों (Armed Forces) द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में आयोग सीधे जांच नहीं कर सकता। वह केवल केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांग सकता है।

  • समय-सीमा की बाधा: अधिनियम के अनुसार, आयोग किसी ऐसे मामले की जांच नहीं कर सकता, जिसके घटित हुए एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका हो। इससे कई गंभीर, परंतु देर से सामने आने वाले मामले अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

मानवाधिकार आयोग को केवल एक 'पोस्ट-ऑफिस' या शिकायत दर्ज करने वाले निकाय से एक सशक्त न्याय-प्रदाता संस्था में बदलने के लिए वैधानिक सुधार अनिवार्य हैं।

  • सिफारिशों को बाध्यकारी बनाना: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) और विधि आयोग की भावना के अनुरूप, यदि सरकार आयोग की सिफारिशों को खारिज करती है, तो उसे संसद/विधानमंडल के पटल पर इसका स्पष्ट और ठोस कारण प्रस्तुत करने के लिए विधिक रूप से बाध्य किया जाना चाहिए।

  • स्वतंत्र संवर्ग का निर्माण: आयोग को जांच के लिए राज्य पुलिस या CBI पर निर्भर रहने के बजाय अपना एक पूर्णतः स्वतंत्र जांच संवर्ग (Independent Investigative Cadre) विकसित करने की वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति मिलनी चाहिए।

'सुशासन' (Good Governance) का प्राथमिक मापदंड राज्य द्वारा अपने नागरिकों की गरिमा की रक्षा करना है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में, जहाँ सत्ता के दुरुपयोग की संभावनाएं सदैव बनी रहती हैं, मानवाधिकार आयोगों को वैधानिक, ढांचागत और वित्तीय रूप से स्वायत्त बनाकर ही संवैधानिक न्याय की वास्तविक परिकल्पना को साकार किया जा सकता है।

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