शॉर्ट नोट्सः राष्ट्रीय महिला आयोग।

 Q. शॉर्ट नोट्सः राष्ट्रीय महिला आयोग।

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15(3) (महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान), 21 (गरिमापूर्ण जीवन) और 39 में अंतर्निहित लैंगिक समानता एवं न्याय के दर्शन को संस्थागत रूप देने के लिए 'राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990' के तहत जनवरी 1992 में एक सांविधिक (Statutory) निकाय के रूप में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) का गठन किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं के संवैधानिक और विधिक अधिकारों की रक्षा करना, उनके लिए बने कानूनों की समीक्षा करना तथा नीति-निर्माण में उनके हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व करना है।

राष्ट्रीय महिला आयोग: अधिकार, कार्यप्रणाली एवं प्रभावशीलता

प्रमुख शक्तियां और कार्य

  • दीवानी न्यायालय की शक्तियां: जांच के दौरान आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के तहत एक सिविल न्यायालय की शक्तियां प्राप्त हैं। यह देश के किसी भी हिस्से से किसी व्यक्ति को समन जारी कर सकता है और शपथ पत्र पर साक्ष्य मांग सकता है।

  • स्वतः संज्ञान (Suo Motu) का अधिकार: मीडिया या अन्य स्रोतों से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने, पुलिस की निष्क्रियता या उत्पीड़न की घटनाओं की जानकारी मिलने पर आयोग बिना किसी औपचारिक शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर जांच प्रारंभ कर सकता है।

  • वैधानिक समीक्षा (Statutory Review): यह 'दहेज निषेध अधिनियम, 1961', 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013' (POSH Act) जैसे कानूनों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करता है और सरकार को आवश्यक संशोधनों की सिफारिश करता है।

  • नीतिगत परामर्श और अनुसंधान: महिला सशक्तिकरण की दिशा में सामाजिक-आर्थिक नीतियों के नियोजन में केंद्र और राज्य सरकारों को परामर्श देना तथा विशेष अध्ययन एवं अनुसंधान को प्रायोजित करना इसका एक प्रमुख कार्य है।

बिहार के विशेष संदर्भ में आयोग की भूमिका

बिहार में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग (SCW) की संयुक्त भूमिका अत्यंत निर्णायक है।

  • समग्र क्षेत्राधिकार: आयोग का प्रयास केवल राजधानी तक सीमित न होकर, पटना और बिहार के सभी जिलों में महिला अधिकारों के संरक्षण और विधिक जागरूकता को सुनिश्चित करना है।

  • सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: राज्य के सुदूर अंचलों में बाल विवाह, डायन प्रथा (Witch-hunting), घरेलू हिंसा और सीमावर्ती जिलों (जैसे- अररिया, किशनगंज) से होने वाली मानव तस्करी (Human Trafficking) जैसे गंभीर अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए आयोग पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय करता है।

  • कल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकन: राज्य सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं, जैसे- 'मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना' और 'जीविका' (JEEViKA) स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से हो रहे सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के धरातलीय प्रभाव का मूल्यांकन कर आयोग प्रशासनिक सुधारात्मक कदम सुझाता है।

प्रभावशीलता के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • सलाहकारी प्रकृति (Advisory Entity): आयोग द्वारा की गई सिफारिशें सरकार या संबंधित विभागों पर विधिक रूप से बाध्यकारी (Binding) नहीं होती हैं। कई बार इसकी रिपोर्टें केवल कागजी अनुशंसाओं तक सीमित रह जाती हैं।

  • स्वतंत्र जांच तंत्र का अभाव: NHRC की भांति ही, राष्ट्रीय महिला आयोग के पास अपनी कोई स्वतंत्र जांच मशीनरी नहीं है। मामलों की जांच और प्रवर्तन (Enforcement) के लिए इसे अंततः पुलिस और राज्य प्रशासन पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

  • वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता की कमी: आयोग को अपने बजट और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए संबंधित मंत्रालय (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय) पर निर्भर रहना पड़ता है, जो इसकी पूर्ण स्वतंत्रता को बाधित करता है।

  • राजनीतिक नियुक्तियां: आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में अक्सर राजनीतिक प्रभाव देखा जाता है, जिससे संस्था की निष्पक्षता और आक्रामकता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

  • विधिक सशक्तिकरण: आयोग को केवल एक 'दंतविहीन संस्था' (Toothless Tiger) से एक सशक्त निकाय में बदलने के लिए इसकी सिफारिशों को लागू करना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, अथवा अस्वीकार करने की स्थिति में सरकार को संसद/विधानमंडल में 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' (ATR) प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।

  • संवैधानिक दर्जे की मांग: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338) की तर्ज पर राष्ट्रीय महिला आयोग को भी संवैधानिक दर्जा प्रदान करने पर विचार किया जाना चाहिए ताकि इसकी संस्थागत स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके।

  • त्वरित न्याय प्रणाली से एकीकरण: आयोग के कार्यों को 'फास्ट-ट्रैक अदालतों' और 'नारी अदालतों' के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए।

'सुशासन' (Good Governance) का लक्ष्य तब तक अधूरा है जब तक कि आधी आबादी सुरक्षित और सशक्त न हो। 'महिला-विकास' (Women Development) के प्रतिमान से 'महिला-नेतृत्व वाले विकास' (Women-Led Development) की ओर भारत के संक्रमण को गति देने के लिए, राष्ट्रीय महिला आयोग को संरचनात्मक, वित्तीय और वैधानिक रूप से अधिक स्वायत्त एवं शक्तिशाली बनाना वर्तमान समय की सबसे बड़ी प्रशासनिक आवश्यकता है।

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