शॉर्ट नोट्स: नीली क्रांति (मत्स्य पालन) और बिहार।

 Q. शॉर्ट नोट्स: नीली क्रांति (मत्स्य पालन) और बिहार।

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'नीली क्रांति' (Blue Revolution) का तात्पर्य देश में मत्स्य पालन (Fisheries) और एक्वाकल्चर (Aquaculture) के क्षेत्र में तीव्र, बहुआयामी और वैज्ञानिक विकास से है। भारत सरकार द्वारा 'प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना' (PMMSY) के माध्यम से इस क्रांति को एक नया संस्थागत ढांचा प्रदान किया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य मत्स्य उत्पादन, उत्पादकता, गुणवत्ता और निर्यात में अभूतपूर्व वृद्धि करना है। भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, और इस वृद्धि में अंतर्देशीय (Inland) मत्स्य पालन की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

बिहार में मत्स्य पालन की अपार संभावनाएं

भौगोलिक दृष्टि से एक भू-आबद्ध (Landlocked) राज्य होने के बावजूद, बिहार में अंतर्देशीय मत्स्य पालन की विपुल प्राकृतिक संपदा मौजूद है। राज्य के मध्य से बहने वाली गंगा नदी प्रणाली तथा उत्तर बिहार में कोसी, गंडक और बागमती जैसी सदानीरा नदियों का जाल एक समृद्ध जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त, राज्य में लगभग 1 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले 'चौर' (Chaurs), 'मन' (Ox-bow lakes), और तालाब मत्स्य पालन के लिए आदर्श प्राकृतिक अवसंरचना प्रदान करते हैं।

नीली क्रांति के अंतर्गत बिहार की उपलब्धियां

नवीनतम बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, राज्य ने अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है। उत्पादन लगभग 8.46 लाख मीट्रिक टन के ऐतिहासिक स्तर को पार कर गया है, जिससे बिहार अब मछली उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भरता के करीब है और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों पर इसकी निर्भरता में भारी कमी आई है।

इस सफलता के पीछे राज्य सरकार की निम्नलिखित प्रमुख रणनीतियां रही हैं:

  • चतुर्थ कृषि रोडमैप (2023-28): इसमें मत्स्य पालन को एक प्रमुख विकास इंजन माना गया है। इसके तहत उच्च मूल्य वाली मछलियों (जैसे- पंगेशियस) के वैज्ञानिक पालन और बायोफ्लॉक (Biofloc) तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है।

  • मुख्यमंत्री समेकित चौर विकास योजना: जलजमाव वाले बेकार पड़े चौर क्षेत्रों को मत्स्य पालन के साथ-साथ कृषि और बागवानी के समेकित मॉडल (Integrated Farming) में परिवर्तित किया जा रहा है।

  • बीज और फीड अनुदान: उच्च गुणवत्ता वाले मछली बीज (Fish Seed) के उत्पादन के लिए हैचरी निर्माण और मत्स्य आहार (Fish Feed) मिलों की स्थापना पर भारी सब्सिडी (अनुदान) प्रदान की जा रही है।

विद्यमान चुनौतियाँ

  • आपूर्ति श्रृंखला और शीत-भंडारण (Cold Storage): पकड़ी गई मछलियों को बाजार तक सुरक्षित पहुँचाने के लिए आधुनिक कोल्ड चेन और रेफ्रिजरेटेड वैन की भारी कमी है, जिससे पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान (Post-harvest loss) होता है।

  • पारंपरिक पद्धतियाँ: राज्य के अधिकांश मछुआरे (विशेषकर मल्लाह समुदाय) अभी भी पारंपरिक और निर्वाह-आधारित मछली पकड़ने के तरीकों पर निर्भर हैं, जिनमें उत्पादकता कम होती है।

  • जल प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन: नदियों में बढ़ता प्रदूषण स्तर और अनिश्चित मानसून के कारण तालाबों का सूखना मत्स्य संपदा के लिए एक गंभीर खतरा है।

  • संस्थागत ऋण तक पहुँच: छोटे स्तर के मत्स्य पालकों को बैंकों से संपार्श्विक-मुक्त (Collateral-free) ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का लाभ प्राप्त करने में ढांचागत बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

आगे की राह

बिहार में नीली क्रांति को इसके तार्किक अंजाम तक पहुँचाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए मूल्यवर्धन (Value Addition) पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि आधुनिक मत्स्य अवसंरचना—जैसे कि एक्वा-पार्क, रोग निदान प्रयोगशालाएं (Disease diagnostic labs), और उन्नत हैचरी—का निर्माण केवल कुछ गिने-चुने जल-बहुल क्षेत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि इनका विस्तार पटना और सभी बिहार के जिलों में एक समेकित आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के तहत किया जाए।

मत्स्य उत्पादक संघों (FPOs) और सहकारी समितियों का सशक्तिकरण कर बिचौलियों की भूमिका को समाप्त किया जा सकता है। 'नीली क्रांति' का यह सफल कार्यान्वयन न केवल राज्य में पोषण सुरक्षा (Nutritional Security) सुनिश्चित करेगा, बल्कि यह सतत विकास लक्ष्यों (SDG-1: गरीबी समाप्ति और SDG-2: शून्य भुखमरी) को प्राप्त करने की दिशा में बिहार का एक निर्णायक कदम सिद्ध होगा।

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