'मेक इन इंडिया' के एक दशकः इसकी उपलब्धियों और विनिर्माण क्षेत्र में आने वाली बाधाओं का मूल्यांकन करें।

 Q.  'मेक इन इंडिया' के एक दशकः इसकी उपलब्धियों और विनिर्माण क्षेत्र में आने वाली बाधाओं का मूल्यांकन करें।

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'मेक इन इंडिया' के एक दशक: उपलब्धियां एवं विनिर्माण क्षेत्र की संरचनात्मक बाधाओं का मूल्यांकन

सितंबर 2014 में भारत सरकार द्वारा प्रारंभ की गई 'मेक इन इंडिया' (Make in India) पहल ने एक दशक की यात्रा पूरी कर ली है। इस महत्वाकांक्षी योजना का मूल उद्देश्य भारत को एक वैश्विक डिजाइन और विनिर्माण हब (Global Manufacturing Hub) के रूप में स्थापित करना, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 16% से बढ़ाकर 25% करना और 10 करोड़ नए रोजगार का सृजन करना था। आर्थिक समीक्षा (Economic Survey) और नीति आयोग के हालिया प्रतिवेदनों के आलोक में, इस पहल की उपलब्धियों और इसमें निहित संरचनात्मक चुनौतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन राष्ट्र के आर्थिक भविष्य के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

'मेक इन इंडिया' की प्रमुख उपलब्धियां

विगत एक दशक में, इस पहल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न आधारभूत क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन किए हैं:

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में अभूतपूर्व वृद्धि: नीतियों के उदारीकरण और स्वचालित मार्ग (Automatic Route) के विस्तार के परिणामस्वरूप, भारत ने वित्तीय वर्ष 2021-22 में $84.8 बिलियन का अब तक का सर्वाधिक वार्षिक FDI प्रवाह दर्ज किया।

  • उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना की सफलता: 14 प्रमुख क्षेत्रों (जैसे- इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल) में लागू की गई PLI योजना ने घरेलू विनिर्माण को अत्यधिक गति प्रदान की है। इसके परिणामस्वरूप, भारत आज विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन गया है और रक्षा निर्यात (Defense Exports) अपने ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है।

  • कारोबार सुगमता (Ease of Doing Business): व्यापारिक नियमों के सरलीकरण, अनुपालन बोझ (Compliance Burden) को कम करने और कंपनी अधिनियम के तहत छोटे आर्थिक अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने (Decriminalization) से भारत के कारोबारी माहौल में संस्थागत सुधार हुआ है।

  • अवसंरचनात्मक और लॉजिस्टिक सुदृढ़ीकरण: 'पीएम गति शक्ति' (PM Gati Shakti) और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक नीति (NLP) के क्रियान्वयन से परिवहन और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं कम हुई हैं, जिससे माल ढुलाई का समय और लागत सुव्यवस्थित हो रही है।

विनिर्माण क्षेत्र में आने वाली प्रमुख बाधाएं (Bottlenecks)

उपर्युक्त उपलब्धियों के बावजूद, 'मेक इन इंडिया' अपने कुछ मूलभूत लक्ष्यों, विशेषकर GDP में 25% विनिर्माण हिस्सेदारी और रोजगार सृजन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में संघर्ष कर रहा है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • भूमि अधिग्रहण और श्रम कानूनों की जटिलताएं: भूमि अधिग्रहण एक अत्यंत जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया बनी हुई है। यद्यपि संसद ने चार नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) को पारित कर दिया है, परंतु राज्यों द्वारा इनके क्रियान्वयन में देरी से औद्योगिक विस्तार बाधित हो रहा है।

  • वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chains - GVCs) में कम भागीदारी: भारतीय विनिर्माण अभी भी आयातित कच्चे माल पर अत्यधिक निर्भर है। 'असेंबल इन इंडिया' (Assemble in India) से 'मेक इन इंडिया' की ओर पूर्ण परिवर्तन के लिए उन्नत अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश की कमी एक बड़ी बाधा है।

  • लॉजिस्टिक लागत (Logistics Cost): यद्यपि सुधार हुए हैं, फिर भी भारत में लॉजिस्टिक लागत GDP का लगभग 13-14% है, जो विकसित देशों (8-10%) की तुलना में काफी अधिक है। इससे भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य-प्रतिस्पर्धा (Cost-competitiveness) में पिछड़ जाते हैं।

  • कौशल बेमेल (Skill Mismatch): 'इंडिया स्किल्स रिपोर्ट' के अनुसार, भारतीय कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा Industry 4.0 की आवश्यकताओं (यथा- ऑटोमेशन, AI, रोबोटिक्स) के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं है।

बिहार के संदर्भ में औद्योगिक चुनौतियां और संभावनाएं

राष्ट्रीय स्तर पर 'मेक इन इंडिया' के वास्तविक लक्ष्यों की प्राप्ति तब तक संभव नहीं है, जब तक कि पटना और बिहार के सभी जिलों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा कृषि-आधारित उद्योगों का समतामूलक और सघन विकास न हो। वर्तमान में राज्य में वृहद उद्योगों के अभाव और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों के कारण प्रतिभाओं का पलायन होता है। हालांकि, बिहार सरकार की नई औद्योगिक प्रोत्साहन नीति और 'प्लग-एंड-प्ले' (Plug and Play) इंफ्रास्ट्रक्चर की पहल इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जिसे केंद्र की नीतियों के साथ मजबूती से जोड़ना आवश्यक है।

आगे की राह (Way Forward)

विनिर्माण क्षेत्र की क्षमता के पूर्ण दोहन के लिए नीतिगत स्तर पर निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए:

  • सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism): श्रम और भूमि जैसे समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्यों को मिलकर काम करना चाहिए, ताकि श्रम संहिताओं को त्वरित रूप से लागू किया जा सके।

  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) को प्रोत्साहन: पेटेंट प्रक्रियाओं को तेज करना और कॉर्पोरेट क्षेत्र को R&D में निवेश के लिए कर प्रोत्साहन देना अनिवार्य है। नवाचार के बिना 'मेक इन इंडिया', 'इन्वेंट इन इंडिया' में परिवर्तित नहीं हो सकता।

  • कौशल विकास का विकेंद्रीकरण: औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) का आधुनिकीकरण कर उन्हें स्थानीय उद्योगों की मांग के अनुरूप 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' (Centre of Excellence) में बदला जाना चाहिए।

'मेक इन इंडिया' भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को आर्थिक शक्ति में बदलने का एक महत्वपूर्ण साधन है। अगले दशक की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कितनी शीघ्रता से लाल फीताशाही (Red Tapism) को समाप्त कर, 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन के साथ अपनी घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ एकीकृत करता है।

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