भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों और रबर स्टांप की धारणा का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

 Q. भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों और रबर स्टांप की धारणा का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

Ans - 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 के तहत भारत के राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च गरिमा, राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुदृढ़ता का प्रतीक है। संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) के अंतर्गत, राष्ट्रपति राज्य का 'नाममात्र' या 'संवैधानिक' प्रमुख (De Jure Head) होता है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद (De Facto Head) में निहित होती है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति और बिहार के गौरव डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने कार्यकाल के दौरान इस पद को केवल एक प्रतीकात्मक संस्था के बजाय एक स्वतंत्र और गरिमापूर्ण मार्गदर्शक के रूप में स्थापित किया था। हालांकि, संवैधानिक प्रावधानों और कार्यप्रणाली के कारण अक्सर राष्ट्रपति को 'रबर स्टांप' या 'स्वर्णिम शून्य' (Golden Zero) की संज्ञा दी जाती है।

भारत के राष्ट्रपति की बहुआयामी शक्तियां

संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। इन शक्तियों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

1. कार्यकारी और विधायी शक्तियां (Executive and Legislative Powers)

  • नियुक्तियां: राष्ट्रपति प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, महान्यायवादी (Attorney General), कैग (CAG), और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति करता है।

  • विधायी भूमिका: संसद का सत्र बुलाना, सत्रावसान करना और लोकसभा को भंग करना। अनुच्छेद 111 के तहत कोई भी विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना कानून नहीं बन सकता।

  • अध्यादेश जारी करना: अनुच्छेद 123 के तहत जब संसद सत्र में न हो, तो राष्ट्रपति अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है, जिसका बल संसदीय अधिनियम के समान होता है।

2. न्यायिक और कूटनीतिक शक्तियां (Judicial and Diplomatic Powers)

  • क्षमादान की शक्ति: अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को मृत्युदंड सहित विभिन्न दंडों को क्षमा करने, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है।

  • अंतरराष्ट्रीय कूटनीति: सभी अंतरराष्ट्रीय संधियां और समझौते राष्ट्रपति के नाम से ही किए जाते हैं।

3. आपातकालीन शक्तियां (Emergency Powers)

संविधान ने असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352), राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356), और वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) लागू करने की व्यापक शक्तियां दी हैं।

'रबर स्टांप' की धारणा के अंतर्निहित कारण

राष्ट्रपति को प्रायः 'रबर स्टांप' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसकी शक्तियां स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि वे मंत्रिपरिषद की सलाह के अधीन हैं:

  • अनुच्छेद 74(1) की बाध्यता: यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही करेगा।

  • संवैधानिक संशोधन: 42वें संविधान संशोधन (1976) ने राष्ट्रपति के लिए मंत्रिपरिषद की सलाह को पूरी तरह से बाध्यकारी बना दिया था। हालांकि, 44वें संविधान संशोधन (1978) ने राष्ट्रपति को सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए लौटाने का अधिकार दिया, परंतु पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य है।

  • ब्रिटिश राजशाही से तुलना: भारतीय राष्ट्रपति की स्थिति को अक्सर ब्रिटिश क्राउन के समकक्ष माना जाता है, जो शासन तो करता है परंतु प्रशासन नहीं।

'रबर स्टांप' की धारणा का आलोचनात्मक मूल्यांकन: वास्तविकता और स्वविवेक

राष्ट्रपति को महज 'रबर स्टांप' मानना संविधान निर्माताओं की दृष्टि और भारतीय राजव्यवस्था की वास्तविकता के साथ न्याय नहीं है। राष्ट्रपति के पास कई ऐसी परिस्थितिजन्य और विवेकाधीन शक्तियां (Situational & Discretionary Powers) हैं, जो उसे एक सजग प्रहरी बनाती हैं:

1. वीटो शक्तियों का प्रयोग (Use of Veto Powers)

राष्ट्रपति के पास पॉकेट वीटो (Pocket Veto) और निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto) की शक्ति है। 1986 में ज्ञानी जैल सिंह ने 'भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक' पर पॉकेट वीटो का प्रयोग कर यह सिद्ध किया था कि राष्ट्रपति विवादास्पद कानूनों को रोक सकता है। हाल ही में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 'लाभ के पद' (Office of Profit) से संबंधित विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाया था।

2. सूचना मांगने का अधिकार (Right to Information)

अनुच्छेद 78 के तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से प्रशासन और विधान संबंधी किसी भी मामले की जानकारी मांग सकता है। यह उसे सरकार के कार्यों पर "चेतावनी देने और प्रोत्साहित करने" (Right to warn and encourage) का अधिकार देता है।

3. परिस्थितिजन्य स्वविवेक (Situational Discretion)

  • त्रिशंकु संसद (Hung Parliament): जब लोकसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, तो प्रधानमंत्री की नियुक्ति में राष्ट्रपति का स्वविवेक सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है (जैसे 1989 से 1999 के बीच के दौर में)।

  • लोकसभा का विघटन: यदि कोई मंत्रिपरिषद लोकसभा में अपना विश्वास मत खो देती है, तो उसकी सलाह पर लोकसभा भंग करने के बजाय राष्ट्रपति वैकल्पिक सरकार के गठन की संभावनाएं तलाश सकता है।

4. संवैधानिक प्रहरी के रूप में भूमिका (Role as a Constitutional Sentinel)

राष्ट्रपति कई बार मंत्रिपरिषद के असंवैधानिक निर्णयों के विरुद्ध एक नैतिक दीवार बनकर खड़े हुए हैं। बिहार के संदर्भ में यह देखना अत्यंत प्रासंगिक है कि वर्ष 1998 और 1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने केंद्र सरकार (कैबिनेट) द्वारा बिहार तथा उत्तर प्रदेश में अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) लगाने की सिफारिशों को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया था। उनके इस निर्णय ने सहकारी संघवाद की रक्षा की और यह साबित किया कि राष्ट्रपति 'रबर स्टांप' नहीं बल्कि एक सुदृढ़ 'संवैधानिक चेक एंड बैलेंस' (Check and Balance) है।

आगे की राह

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट किया था कि, "भारतीय राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, वह राष्ट्र पर शासन नहीं करता।" अतः राष्ट्रपति की तुलना रबर स्टांप से करना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है।

भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रपति पद पर आसीन व्यक्ति दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करे। भविष्य में, एक जीवंत लोकतंत्र की मांग है कि राष्ट्रपति एक 'सक्रिय रबर स्टांप' के बजाय एक 'संवैधानिक मार्गदर्शक' (Friend, Philosopher, and Guide) की भूमिका निभाए, जो सरकार को उसके संवैधानिक दायित्वों और लोकतांत्रिक नैतिकता (Constitutional Morality) का निरंतर स्मरण कराता रहे।

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