राज्यपाल की भूमिका और शक्तियों का विश्लेषण करें। बिहार के विशेष संदर्भ में केंद्र-राज्य संबंधों में राज्यपाल की भूमिका अक्सर विवादित क्यों रहती है?
Q. राज्यपाल की भूमिका और शक्तियों का विश्लेषण करें। बिहार के विशेष संदर्भ में केंद्र-राज्य संबंधों में राज्यपाल की भूमिका अक्सर विवादित क्यों रहती है?
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल का प्रावधान है। संसदीय शासन प्रणाली के अंतर्गत राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्वितीय है, क्योंकि वह एक साथ दोहरी भूमिका (Dual Role) का निर्वहन करता है—पहला, राज्य के 'संवैधानिक प्रमुख' (Constitutional Head) के रूप में और दूसरा, केंद्र सरकार के 'प्रतिनिधि या योजक कड़ी' (Link between Centre and State) के रूप में। संविधान निर्माताओं ने यह परिकल्पना की थी कि राज्यपाल राज्यों के प्रशासन में एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और गैर-पक्षपाती मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा। परंतु, व्यावहारिक राजनीति में यह पद अक्सर केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव और विवाद का मुख्य केंद्र बन जाता है।
राज्यपाल की भूमिका और शक्तियां
संविधान के अनुच्छेद 154 के तहत राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। राज्यपाल की शक्तियों को निम्नलिखित शीर्षकों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. कार्यकारी शक्तियां (Executive Powers)
नियुक्तियां: राज्यपाल मुख्यमंत्री और उसकी सलाह पर अन्य मंत्रियों (अनुच्छेद 164), राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General), और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति करता है।
प्रशासनिक संचालन: राज्य सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम पर ही किए जाते हैं (अनुच्छेद 166)।
2. विधायी शक्तियां (Legislative Powers)
सत्र आहूत करना: राज्यपाल राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाता है, सत्रावसान करता है और विधानसभा को भंग कर सकता है (अनुच्छेद 174)।
विधेयकों पर स्वीकृति: विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही अधिनियम बनते हैं (अनुच्छेद 200)। वह विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित भी कर सकता है (अनुच्छेद 201)।
अध्यादेश जारी करना: जब विधानमंडल सत्र में न हो, तो त्वरित आवश्यकता पड़ने पर वह अनुच्छेद 213 के तहत अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है।
3. विवेकाधीन शक्तियां (Discretionary Powers)
अनुच्छेद 163(1) और (2) राज्यपाल को कुछ मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार देते हैं।
त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) की स्थिति में मुख्यमंत्री की नियुक्ति और बहुमत सिद्ध करने के लिए समय-सीमा का निर्धारण।
राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) लगाने की राष्ट्रपति से सिफारिश करना।
केंद्र-राज्य संबंधों में राज्यपाल की विवादित भूमिका (बिहार के विशेष संदर्भ में)
यद्यपि राज्यपाल का पद एक संवैधानिक मर्यादा का पद है, तथापि केंद्र और राज्य में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने पर यह पद अत्यधिक विवादित हो जाता है। बिहार का राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास इस विवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है:
1. अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का दुरुपयोग
राज्यपाल द्वारा केंद्र के 'एजेंट' के रूप में कार्य करते हुए चुनी हुई राज्य सरकारों को अस्थिर करने का आरोप सबसे आम है।
बिहार का संदर्भ: बिहार के राजनीतिक इतिहास में अब तक 8 बार राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है। 1999 में तत्कालीन राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार ने राबड़ी देवी सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की थी, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। यह दर्शाता है कि राज्यपाल की रिपोर्ट अक्सर राजनीतिक रूप से प्रेरित मानी जाती है।
2. त्रिशंकु विधानसभा और सरकार गठन में पक्षपात
जब चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो सबसे बड़े दल या गठबंधन को आमंत्रित करने में राज्यपाल का स्वविवेक अक्सर विवादों के घेरे में रहता है।
बिहार का संदर्भ: वर्ष 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता में तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर दी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) ऐतिहासिक फैसले में राज्यपाल की इस कार्रवाई को 'असंवैधानिक और दुर्भावनापूर्ण' (Unconstitutional and Mala fide) करार दिया था।
3. विधेयकों को रोकना या लंबित रखना (Pocket Veto at State Level)
राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 200 के तहत राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को बिना कोई कारण बताए अनिश्चित काल तक लंबित रखना निर्वाचित सरकार की विधायी संप्रभुता को चुनौती देता है। अक्सर केंद्र के इशारे पर राज्य के महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों में बाधा उत्पन्न की जाती है।
4. राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलाधिपति (Chancellor) की भूमिका
राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति होता है। कुलपतियों (Vice-Chancellors) की नियुक्ति और विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर राज्य सरकार और राजभवन के बीच लगातार टकराव देखने को मिलता है।
बिहार का संदर्भ: हाल के वर्षों में, पटना और बिहार के सभी जिलों में स्थित विभिन्न राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया, ऑडिटिंग और वित्तीय अधिकारों को लेकर शिक्षा विभाग (राज्य सरकार) और राजभवन के बीच खुले तौर पर अधिकार क्षेत्र का विवाद (Jurisdictional Conflict) उत्पन्न हुआ है, जिससे राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
आगे की राह
राज्यपाल के पद की गरिमा और संघीय ढांचे (Federal Structure) की सुदृढ़ता के लिए यह आवश्यक है कि यह संस्था दलगत राजनीति से मुक्त हो। इस दिशा में विभिन्न आयोगों और न्यायालयों के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन होना चाहिए:
सरकारिया आयोग (1983) और पुंछी आयोग (2007) की सिफारिशें: राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श किया जाना चाहिए। राज्यपाल ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो राज्य के बाहर का हो और सक्रिय राजनीति से दूर हो।
एस.आर. बोम्मई वाद (1994): सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकार के बहुमत का परीक्षण राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि 'विधानसभा के पटल' (Floor of the House) पर होना चाहिए।
अनुच्छेद 356 का अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग: डॉ. बी.आर. अंबेडकर की चेतावनी के अनुरूप, राष्ट्रपति शासन का उपयोग एक 'मृत पत्र' (Dead Letter) के रूप में अत्यंत दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष के तौर पर, राज्यपाल को 'केंद्र के अधीनस्थ कर्मचारी' के रूप में नहीं, बल्कि 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में कार्य करना चाहिए। बिहार जैसे विकासशील राज्य में, जहां सुशासन और नीतिगत स्थिरता अत्यंत आवश्यक है, राजभवन और निर्वाचित राज्य सरकार के बीच एक सकारात्मक और सहयोगात्मक संबंध ही राज्य को समग्र विकास के मार्ग पर आगे ले जा सकता है।