भारतीय संघवाद (Federalism) की प्रकृति का वर्णन करें। इसे 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) क्यों कहा जाता है?

 Q. भारतीय संघवाद (Federalism) की प्रकृति का वर्णन करें। इसे 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) क्यों कहा जाता है?

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भारतीय संविधान न तो विशुद्ध रूप से संघीय (Federal) है और न ही एकात्मक (Unitary), बल्कि यह देश की ऐतिहासिक, भौगोलिक और सामाजिक विविधता को ध्यान में रखते हुए गढ़ा गया एक अनूठा सम्मिश्रण (Sui Generis) है। संविधान के अनुच्छेद 1(1) में भारत को स्पष्ट रूप से "राज्यों का संघ" (Union of States) घोषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह संघ किसी समझौते का परिणाम नहीं है और राज्यों को इससे अलग होने का अधिकार नहीं है। इसी विशिष्ट प्रकृति के कारण प्रसिद्ध ब्रिटिश संविधानविद् के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare) ने भारतीय राजव्यवस्था को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया है—अर्थात एक ऐसी प्रणाली जो स्वरूप में संघीय है, परंतु जिसकी आत्मा एकात्मक है।

भारतीय संघवाद की प्रकृति: मूलभूत संघीय विशेषताएं

संविधान में संघीय व्यवस्था के सभी पारंपरिक और आवश्यक तत्व विद्यमान हैं, जो केंद्र और राज्यों के मध्य शक्तियों के संतुलन को स्थापित करते हैं:

  • शक्तियों का स्पष्ट विभाजन: संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच विधायी और कार्यकारी शक्तियों का सुस्पष्ट विभाजन किया गया है।

  • संविधान की सर्वोच्चता और कठोरता: भारत में संविधान सर्वोच्च है। केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित करने वाले प्रावधानों में संशोधन के लिए अनुच्छेद 368 के तहत संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।

  • स्वतंत्र न्यायपालिका: शक्तियों के विभाजन को बनाए रखने और केंद्र-राज्य विवादों के समाधान के लिए अनुच्छेद 131 (मूल क्षेत्राधिकार) के तहत सर्वोच्च न्यायालय को एक स्वतंत्र मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया गया है।

  • द्विसदनीय व्यवस्था: संसद का उच्च सदन (राज्यसभा) राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है, जो संघीय स्तर पर क्षेत्रीय हितों की रक्षा सुनिश्चित करता है।

भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' (Quasi-Federal) क्यों कहा जाता है?

संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र की एकता, अखंडता और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए केंद्र को जानबूझकर अधिक शक्तिशाली बनाया। निम्नलिखित एकात्मक (Unitary) या केंद्रीकृत प्रवृत्तियों के कारण ही इसे 'अर्ध-संघीय' कहा जाता है:

1. एक मजबूत केंद्र (Strong Centre) का निर्माण

  • समवर्ती सूची के विषयों पर विवाद की स्थिति में केंद्रीय कानून को प्राथमिकता दी जाती है।

  • अनुच्छेद 248 के अनुसार, अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) राज्यों के बजाय संसद में निहित की गई हैं (अमेरिकी संघवाद के विपरीत)।

2. राज्यों का अविनाशी न होना

अनुच्छेद 3 संसद को यह असीमित शक्ति प्रदान करता है कि वह साधारण बहुमत से किसी भी राज्य के नाम, क्षेत्र या सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है। अतः भारत को "विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ" कहा जाता है।

3. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)

राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352), राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356), या वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) के उद्घोषणा के समय, भारतीय राजव्यवस्था बिना किसी औपचारिक संविधान संशोधन के स्वतः ही पूर्णतः एकात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेती है।

4. प्रशासनिक और संस्थागत एकात्मकता

  • राज्यपाल की नियुक्ति: केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति की जाती है, जो अक्सर राज्यों में 'केंद्र के प्रतिनिधि' के रूप में कार्य करते हैं।

  • एकल नागरिकता और एकीकृत न्यायपालिका: पूरे देश के लिए एक ही नागरिकता और न्याय प्रणाली (Supreme Court से लेकर High Courts तक) का प्रावधान है।

  • अखिल भारतीय सेवाएं: आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) आदि अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की नियुक्ति और प्रशिक्षण केंद्र द्वारा होता है, जबकि वे राज्यों में शीर्ष प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हैं।

बिहार के विशेष संदर्भ में संघवाद का व्यावहारिक मूल्यांकन

संघीय ढांचे की यह 'अर्ध-संघीय' प्रकृति व्यावहारिक स्तर पर कई बार केंद्र-राज्य विवादों का कारण बनती है, जिसे बिहार के आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:

  • वित्तीय संघवाद और संसाधनों की निर्भरता: बिहार की अर्थव्यवस्था काफी हद तक केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और अनुदान पर निर्भर है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes) के तहत 'वन साइज़ फिट्स ऑल' (One Size Fits All) दृष्टिकोण अक्सर राज्य की विशिष्ट भौगोलिक और जनांकिकीय आवश्यकताओं की अनदेखी करता है। पटना और बिहार के सभी जिलों के समान एवं समावेशी विकास के लिए—विशेषकर उत्तरी जिलों में बाढ़ और दक्षिणी जिलों में सूखे के स्थायी समाधान हेतु—अधिक वित्तीय स्वायत्तता और मजबूत 'वित्तीय संघवाद' अपरिहार्य है।

  • विशेष राज्य के दर्जे की मांग: गाडगिल-मुखर्जी फॉर्मूले या रघुराम राजन समिति की रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में, बुनियादी ढांचे के विकास और ऐतिहासिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए बिहार द्वारा निरंतर की जाने वाली विशेष राज्य के दर्जे की मांग, केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों के तनाव को रेखांकित करती है।

  • अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग: ऐतिहासिक रूप से, बिहार ने कई बार राजनीतिक अस्थिरता के नाम पर केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन थोपे जाने का दंश झेला है, जो सीधे तौर पर संघीय भावना के प्रतिकूल रहा है।

आगे की राह

एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि "संघवाद (Federalism) भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) का एक अभिन्न अंग है।"

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र के लिए 'अर्ध-संघीय' मॉडल एक आवश्यकता थी। 21वीं सदी के सुशासन और विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इसे महज एक प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रखा जा सकता। प्रख्यात विद्वान ग्रानविले ऑस्टिन (Granville Austin) ने इसे 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) का उत्कृष्ट उदाहरण माना है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, नीति आयोग (NITI Aayog) की गवर्निंग काउंसिल और 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) जैसी संस्थाओं को अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है। केंद्र और राज्यों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर 'प्रतिस्पर्धी-सहकारी संघवाद' (Competitive-Cooperative Federalism) की दिशा में कार्य करना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ राज्यों की क्षेत्रीय स्वायत्तता और विकास सुनिश्चित हो सके।

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