नीति आयोग और अंतर-राज्य परिषद की केंद्र-राज्य संबंधों (सहकारी संघवाद) को मजबूत करने में भूमिका की विवेचना करें।

 Q. नीति आयोग और अंतर-राज्य परिषद की केंद्र-राज्य संबंधों (सहकारी संघवाद) को मजबूत करने में भूमिका की विवेचना करें।

Ans - 

भारतीय राजव्यवस्था में 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) वह धुरी है जिस पर राष्ट्र की एकता और राज्यों का सर्वांगीण विकास निर्भर करता है। प्रसिद्ध विद्वान ग्रानविले ऑस्टिन (Granville Austin) ने भारतीय संविधान को सहकारी संघवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना है। 21वीं सदी की बदलती आर्थिक-सामाजिक आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में, योजना आयोग के केंद्रीकृत मॉडल से आगे बढ़कर केंद्र-राज्य संबंधों को अधिक सुदृढ़, पारदर्शी और सहभागी बनाने के लिए नीति आयोग (NITI Aayog) और अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) दो अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थागत स्तंभ के रूप में उभरे हैं।

सहकारी संघवाद को मजबूत करने में नीति आयोग की भूमिका

1 जनवरी 2015 को स्थापित नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) ने भारत के विकासात्मक प्रतिमान में 'टॉप-डाउन' (Top-Down) दृष्टिकोण को त्यागकर 'बॉटम-अप' (Bottom-Up) अप्रोच अपनाया है। केंद्र-राज्य संबंधों को नई दिशा देने में इसके प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं:

  • गवर्निंग काउंसिल और 'टीम इंडिया' (Team India): नीति आयोग की शासी परिषद (Governing Council) में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होते हैं। यह राज्यों को राष्ट्रीय विकास एजेंडा तैयार करने में मात्र अनुपालनकर्ता से 'समान भागीदार' (Equal Partner) बनाता है।

  • प्रतिस्पर्धी-सहकारी संघवाद (Competitive-Cooperative Federalism): नीति आयोग विभिन्न सूचकांकों—जैसे स्वास्थ्य सूचकांक (Health Index), समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI), और SDG इंडिया इंडेक्स—के माध्यम से राज्यों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है, जिससे वे एक-दूसरे के 'बेस्ट प्रैक्टिसेज' (Best Practices) से सीख सकें।

  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme): वर्ष 2018 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम देश के सबसे पिछड़े जिलों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान पर केंद्रित है, जो क्षेत्रीय असमानताओं को कम कर संघीय ढांचे को मजबूत करता है।

अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) की संवैधानिक भूमिका

सरकारिया आयोग की सिफारिश पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा स्थापित अंतर-राज्य परिषद, अनुच्छेद 263 के तहत एक संवैधानिक निकाय है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली यह परिषद केंद्र-राज्य संवाद का सर्वोच्च वैधानिक मंच है:

  • विवादों का समाधान और जांच: यह राज्यों के बीच या केंद्र-राज्यों के मध्य उत्पन्न होने वाले कानूनी और प्रशासनिक विवादों की जांच करता है और उनके समाधान हेतु सलाह देता है।

  • नीतिगत समन्वय (Policy Coordination): साझा हितों के विषयों (जैसे आंतरिक सुरक्षा, पुलिस सुधार, और आपदा प्रबंधन) पर केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए यह एक व्यापक मंच प्रदान करता है।

  • राजनीतिक और प्रशासनिक संवाद: यह कार्यपालिका के शीर्ष नेतृत्व के मध्य प्रत्यक्ष संवाद स्थापित कर गतिरोधों को दूर करता है, जो अक्सर दलगत राजनीति के कारण उत्पन्न होते हैं।

चुनौतियां और बिहार के विशेष संदर्भ में मूल्यांकन

यद्यपि इन दोनों संस्थाओं ने संघीय ढांचे को मजबूत किया है, परंतु जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां विद्यमान हैं, जिन्हें बिहार के विकास और केंद्र-राज्य संबंधों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:

1. नीति आयोग की वित्तीय सीमाएं और बिहार

नीति आयोग के पास पूर्ववर्ती योजना आयोग की भांति वित्तीय आवंटन (Financial Allocation) का अधिकार नहीं है। बिहार ऐतिहासिक रूप से बुनियादी ढांचे की कमी, प्रति व्यक्ति निम्न आय और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता रहा है। राज्य द्वारा निरंतर की जाने वाली 'विशेष राज्य के दर्जे' (Special Category Status) की मांग अक्सर नीति आयोग के बजटीय अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण अनसुलझी रह जाती है।

2. समावेशी विकास की आवश्यकता

नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम के अंतर्गत बिहार के कुछ जिलों ने स्वास्थ्य और पोषण में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। परंतु, राज्य के समग्र और संतुलित विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि विकास की ये नीतियां और आधारभूत संरचना का सुदृढ़ीकरण केवल कुछ विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि पटना और सभी बिहार के डिस्ट्रिक्ट (Patna and all districts in Bihar) में समान और समावेशी रूप से लागू किया जाए।

3. अंतर-राज्य परिषद की निष्क्रियता

संविधान के प्रावधानों के अनुसार परिषद की बैठकें नियमित होनी चाहिए, परंतु पिछले तीन दशकों में इसकी बैठकें अत्यंत अनियमित रही हैं। बैठकों के अभाव में बिहार-झारखंड के मध्य संपत्ति और पेंशन बंटवारे के विवाद, या नेपाल से आने वाली नदियों (कोसी, गंडक) के जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण अंतर-राज्यीय एवं राष्ट्रीय विषयों पर ठोस और त्वरित आम सहमति नहीं बन पाती है।

आगे की राह

भारत के विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में सहकारी संघवाद को एक 'संस्थागत वास्तविकता' बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  • पुंछी आयोग (Punchhi Commission) की सिफारिशों के अनुरूप, अंतर-राज्य परिषद को मात्र एक सलाहकार निकाय से आगे बढ़ाकर एक स्थायी और सशक्त सचिवालय प्रदान किया जाना चाहिए तथा इसकी वर्ष में कम से कम तीन बैठकें अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।

  • नीति आयोग को वित्त आयोग (Finance Commission) के साथ मिलकर राज्यों की विशिष्ट भौगोलिक और जनांकिकीय आवश्यकताओं (जैसे बिहार का उच्च जनसंख्या घनत्व और औद्योगिक पिछड़ापन) को ध्यान में रखते हुए 'लक्षित अनुदान' (Targeted Grants) का तंत्र विकसित करना चाहिए।

  • संस्थागत संवाद को दलगत राजनीति से ऊपर रखना होगा।

जब केंद्र और राज्य—विशेषकर बिहार जैसे विकासशील राज्य—एक वास्तविक 'टीम इंडिया' के रूप में कार्य करेंगे, तभी 'सबका साथ, सबका विकास' का लक्ष्य धरातल पर उतरेगा और भारत 2047 तक एक सशक्त और विकसित राष्ट्र की परिकल्पना को पूर्ण कर सकेगा।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1