'ऑपरेशन गंगा', 'ऑपरेशन कावेरी' और 'ऑपरेशन अजय' के संदर्भ में संकटग्रस्त क्षेत्रों से भारतीयों की निकासी नीति की समीक्षा करें।

 Q. 'ऑपरेशन गंगा', 'ऑपरेशन कावेरी' और 'ऑपरेशन अजय' के संदर्भ में संकटग्रस्त क्षेत्रों से भारतीयों की निकासी नीति की समीक्षा करें।

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संकटग्रस्त क्षेत्रों से भारतीयों की निकासी: 'ऑपरेशन गंगा', 'कावेरी' और 'अजय' के संदर्भ में नीतिगत समीक्षा

संयुक्त राष्ट्र की 'विश्व प्रवासन रिपोर्ट 2022' के अनुसार, भारत का प्रवासी समुदाय (Diaspora) विश्व में सबसे बड़ा (लगभग 3.2 करोड़) है। संघर्ष, युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं के समय इन नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत सरकार का सर्वोच्च कूटनीतिक और संवैधानिक दायित्व है, जो अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) के विदेश तक वैचारिक विस्तार को रेखांकित करता है। हाल के वर्षों में, भारत ने अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के लिए जटिल 'गैर-लड़ाकू निकासी अभियानों' (Non-Combatant Evacuation Operations - NEOs) का सफल संचालन किया है, जिसने विश्व पटल पर भारत को एक 'उत्तरदायी शक्ति' के रूप में स्थापित किया है।

निकासी अभियानों का सामरिक और कूटनीतिक मूल्यांकन

भारत की निकासी कूटनीति अब 'प्रतिक्रियाशील' (Reactive) से 'सक्रिय और बहुआयामी' (Proactive and Multi-dimensional) हो गई है। हालिया अभियानों की समीक्षा निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है:

1. ऑपरेशन गंगा (यूक्रेन संकट - 2022)

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान शुरू किए गए इस ऑपरेशन के तहत लगभग 22,500 भारतीय छात्रों और नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया।

  • कूटनीतिक तटस्थता का लाभ: भारत ने अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) का प्रयोग करते हुए रूस और यूक्रेन, दोनों के शीर्ष नेतृत्व से सुरक्षित गलियारे (Safe Corridors) के लिए वार्ता की।

  • बहु-मंत्रालयी समन्वय: निकासी को सुगम बनाने के लिए रोमानिया, पोलैंड, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे सीमावर्ती देशों में चार केंद्रीय मंत्रियों को विशेष दूत के रूप में भेजा गया, जिसने जमीनी स्तर पर प्रशासनिक बाधाओं को दूर किया।

2. ऑपरेशन कावेरी (सूडान संकट - 2023)

सूडान में सेना और अर्धसैनिक बलों (RSF) के बीच भड़के गृहयुद्ध में फंसे भारतीयों को निकालने के लिए यह अभियान चलाया गया।

  • सामरिक और सैन्य कौशल: यह एक जटिल त्रि-आयामी (जल, थल, नभ) बचाव अभियान था। भारतीय नौसेना (INS तेग और सुमेधा) और वायु सेना (C-130J हरक्यूलिस) का सऊदी अरब के जेद्दाह बंदरगाह के माध्यम से सफल समन्वय भारतीय सैन्य कूटनीति की रसद (Logistics) क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

3. ऑपरेशन अजय (इज़राइल-हमास संघर्ष - 2023)

अक्टूबर 2023 में इज़राइल पर हमास के हमलों के बाद, वहां से स्वदेश लौटने के इच्छुक भारतीयों के लिए यह त्वरित अभियान शुरू किया गया।

  • सक्रियता और तत्परता: संघर्ष की शुरुआत के कुछ ही दिनों के भीतर चार्टर्ड उड़ानों का संचालन यह दर्शाता है कि भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) का संकट प्रबंधन तंत्र (Crisis Management Mechanism) अब 'रियल-टाइम' प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।

भारत की निकासी नीति की प्रमुख चुनौतियां (Policy Constraints)

इन सफलताओं के बावजूद, भारत की वर्तमान निकासी नीति में कई संस्थागत और संरचनात्मक सीमाएं विद्यमान हैं:

  • लिखित 'राष्ट्रीय निकासी नीति' (National Evacuation Policy) का अभाव: भारत अभी भी 'तदर्थवाद' (Ad-hocism) पर निर्भर है। कोई मानकीकृत संचालन प्रक्रिया (SOP) या स्पष्ट विधायी ढांचा नहीं है जो निकासी के दौरान मंत्रालयों, राज्य सरकारों और सैन्य बलों की भूमिकाओं को स्थायी रूप से परिभाषित करे।

  • डेटा और पंजीकरण की समस्या: विदेशों में रहने वाले कई नागरिक (विशेषकर अकुशल कामगार और छात्र) दूतावासों के ई-माइग्रेट (e-Migrate) या MADAD पोर्टल पर अपना पंजीकरण नहीं कराते हैं। इससे संकट के समय उनकी सटीक भौगोलिक स्थिति का पता लगाना अत्यंत कठिन हो जाता है।

  • वित्तीय भार का वहन: निकासी का पूरा वित्तीय बोझ अमूमन सरकार वहन करती है। इसके लिए किसी विशेष 'आकस्मिक कोष' (Contingency Fund) का स्थायी प्रावधान नहीं है।

बिहार के परिप्रेक्ष्य में निकासी अभियानों की प्रासंगिकता

बिहार एक श्रम और कौशल-निर्यातक राज्य है। राज्य की एक बड़ी आबादी खाड़ी देशों, इज़राइल, सूडान जैसे अफ़्रीकी राष्ट्रों में कामगारों के रूप में तथा यूक्रेन/रूस में चिकित्सा छात्रों के रूप में निवास करती है। जब भी कोई विदेशी संकट उत्पन्न होता है, तो उसका सीधा सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पटना और बिहार के सभी जिलों पर पड़ता है।

  • 'ऑपरेशन गंगा' के दौरान यूक्रेन से लौटे सैकड़ों बिहारी छात्रों का भविष्य दांव पर था, जिसके बाद राज्य सरकार और केंद्र के समन्वय से उन्हें भारतीय चिकित्सा संस्थानों में इंटर्नशिप की सुविधा दी गई।

  • इज़राइल और सूडान में निर्माण कार्यों में लगे पटना और बिहार के सभी जिलों के प्रवासियों की सुरक्षित वापसी राज्य और विदेश मंत्रालय के बीच 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) की आवश्यकता को रेखांकित करती है। संकट के समय राज्य के 'प्रवासी भारतीय प्रकोष्ठ' का सक्रिय होना आवश्यक है।

आगे की राह (Way Forward)

बदलती वैश्विक भू-राजनीति और संघर्षों की बढ़ती आवृत्ति को देखते हुए, भारत को 'एड-हॉक' (Ad-hoc) व्यवस्था से आगे बढ़कर एक संस्थागत ढांचे की ओर बढ़ना होगा:

  • निकासी सिद्धांत (Evacuation Doctrine) का निर्माण: रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए एक स्पष्ट और संहिताबद्ध 'मानक संचालन प्रक्रिया' (SOP) तैयार की जानी चाहिए।

  • प्रवासी पंजीकरण की अनिवार्यता: दूतावासों के साथ नागरिकों के पंजीकरण को अनिवार्य और अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल (User-friendly) बनाया जाना चाहिए, ताकि 'रियल-टाइम डेटाबेस' उपलब्ध रहे।

  • कूटनीतिक साझेदारी: 'क्वाड' (QUAD) या खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) जैसे मंचों के माध्यम से बहुपक्षीय 'संकट प्रतिक्रिया तंत्र' विकसित किया जाना चाहिए, ताकि लॉजिस्टिक समर्थन साझा किया जा सके।

संकटग्रस्त क्षेत्रों से नागरिकों की सुरक्षित वापसी केवल एक बचाव कार्य नहीं है, बल्कि यह भारत के 'सॉफ्ट पावर' और एक 'विश्वमित्र' के रूप में उसकी बढ़ती साख का प्रतीक है। एक संस्थागत राष्ट्रीय निकासी नीति का निर्माण इस दिशा में भारत की कूटनीतिक परिपक्वता को पूर्णता प्रदान करेगा।

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